Sunday, February 21, 2021

अदौरी कढ़ौरी





एक जमाना था जब #अदौरी, #तिलौरी, कढ़ौरी(खिरौरी) और रक्सौरी का बहुत महत्व था। आज उसका उतना महत्व नहीं रहा जितना पहले कभी हुआ करता था। उसकी मूल वजह है कि उस जमाने में न तो आवागमन के इतने सुलभ साधन उपलब्ध थे, न ही खेतों में उचित सिंचाई के साधन उपलब्ध थे और न ही बेमौसमी सब्जियाँ मिलती थीं। आज तो किसी भी मौसम में सब्जी मंडी में सभी प्रकार की सब्जियों की आवक बनी रहती है। दूर-दराज की बात छोड़िए अब तो विभिन्न फल और सब्जियाँ विदेशों से सफर करते हुए हमारे घर तक आसानी से पहुँच जाती हैं।

विभिन्न सब्जियों की उपलब्धता का एक कारण यह भी है कि आज हाइब्रिड बीज, कृत्रिम खाद और कीटनाशकों की बदौलत किसी भी मौसम में सभी प्रकार की सब्जियों का प्रचुर मात्रा में उत्पादन किया जा रहा है। ऐसी सब्जियों का मूल्य सब्जी मंडी में काफी ज्यादा है फिर भी अधिकांश लोगों के पास अब पर्याप्त पैसे हैं, तो वे इन्हीं महँगी सब्जियों को खरीदने की प्राथमिकता देते हैं। जबकि सबको मालूम है कि इन बेमौसमी सब्जियों में जम कर कीटनाशकों का उपयोग होता है जो स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक हैं और वह भी खासतौर से बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए। फिर भी लोग चाव से इन बेमौसमी सब्जियों को खरीदते और खाते हैं।

अदौरी में मूंग उरद या बूट के दाल, खिरौरी में खीरा, कढ़ौरी में कद्दू, चड़ौरी में चावल, रक्सौरी में #रक्सा,(भतुआ) आदि बुनियादी जरुरतें होती हैं। वैसे विवाह और अन्य उत्सव के लग्न-मुहूर्त
अधिकांशतः गर्मियों में ही पड़ते थे और उस समय सब्जियों का घोर अभाव रहता था।बड़ी जमात को खिलाने के लिए कुछ तो ऐसा होना चाहिए था, जिसे लंबे अरसे तक सुरक्षित रखा जा सके और वह स्वास्थ्यप्रद, स्वादिष्ट और रुचिकर हो। शायद ऐसे महत्वपूर्ण समय के लिए ही अदौरी, कढ़ौरी, खिरौरी आदि बनाने की परंपरा शुरु हुई होगी।

अगर उत्सव की बात रहने दी जाए तो आज भी जब कुछ अलग, कुछ खास खाने की इच्छा हो तो हमारे घर में अदौरी-तिलौरी आदि बहुत पसंद किया जाता है।आज भी मेरे बाऊ जी (पिता जी) घर में अदौरी की सब्जी बनाने की विशेष फरमाईश करते रहते हैं- "ए दुल्हिन ऊ जे तोहर नईहर से अदौरी आईल हलो, से बचल हो का?" दुल्हिन को भी पता है कि बाऊजी को अदौरी बहुत पसंद है और देर-सबेर बनाने का आग्रह जरूर करेंगें, सो वह बहुत किफायत से इसका उपयोग करती है और #बाऊजी को आश्वस्त करते हुए कहती है कि- "हाँ बाऊजी, हई न अभी तो चलतई, भर बोयाम आईल हलई, अभी तो आधो नखई खलिआईल।"

ऐतना सुनते बाऊजी के चेहरे पर बच्चों जैसी खुशी साफ झलकने लगती है। फिर तो उधर अदौरी बनती रहेगी और दुल्हिन घूम-फिर कर बाऊजी के इर्द-गिर्द बिना बात के अनेक बहानों से मंडराती रहेगी। आखिर नईहर का यशोगान कौन नहीं सुनना चाहता है? हालांकि हर बार नई बात कहाँ से आएगी, लेकिन हर बार वही बात अनेक प्रकार के स्वरुप बदल जाने से प्रीतिकर लगने लगती हैं। इसीलिए कहा भी गया है न कि "भात से कभी मन उमठता है।" जब तक भोजन चलता रहेगा बाऊजी का प्रशंसात्मक संस्मरण चलता रहेगा। वह दुल्हिन के हाथों से बने स्वादिष्ट अदौरी की सब्जी खाते हुए बोलते रहेंगे- "तोरा घर के जईसन अदौरी के बाते अलग बा। अजय के माई के छोड़ के आऊर केकरो हाथ में ऊ स्वाद नई मिलला हो।

बाऊजी और कुछ #परसन माँगें न माँगें लेकिन अदौरी परसन में जरुर माँगेगें। हमने उनसे कहा कि तुम जान-बूझकर बाऊजी को अदौरी सब्जी कम देती हो तभी तो वो परसन माँगते हैं। उनको बड़का #कटोरा में दिया करो। ठीक .. आज रऊए बात। बोल उसने दे भी दिया, लेकिन पहले तो बाऊजी सब्जी कम कराएँ और फिर परसन माँगने लगे। तब से हम बोलना ही छोड़ दिए। यही नहीं दूसरे दिन भी बासी अदौरी खाए बगैर वह अध्याय संपूर्ण नहीं होता। यह सब दुल्हिन को पता है। आखिर एकतालीस वर्षों से यही तो क्रम बदस्तूर चल रहा है।इसीलिए कहता हूँ कि आप भी आज अपने घर के बुढ़-पुरनिया लोगों को अदौरी-कढ़ौरी आदि की सब्जी बनाकर जरुर खिलाएँ और उनके चेहरे पर स्वाद की संतुष्टि को और उनकी बहुमूल्य मुस्कुराहट को महसूस करें। वैसे उम्मीद तो यही है कि इस पोस्ट को पढ़कर आज आपको भी अदौरी खाने की इच्छा उत्पन्न हो जाएगी।

©Ajoy Singh
4 Jan 2019, 06:20

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