‘सोलहवां साल का पहुंचना, होठ के ऊपर रोयें की गहरी रेघारी बनना शुरू हो जाना और फिर चुम्बक से भी ज्यादा मजबूत प्यार के आकर्षण बल में खुद को बहकते हुए महसूस करना, जीवविज्ञान में डोपेमाइन, ऑक्सीटोसिन, एण्ड्रोजन, एस्ट्रोजन वाले पन्ने पे कुछ ज्यादा ही ठहरना और कुछ चेहरे को देखते ही अपने दिल को इन होर्मोनो के झरने में भीगते हुए लहस जाना, किसी और के मुंह पे उसका नाम आते ही मरने-मारने पे आमदा हो जाना, किसी के जिक्र मात्र से सबकुछ अच्छा सा लगने लगना, या फिर भविष्य के सारे सपनों में किसी के सुनहरी तस्वीर को सजाने लग जाना' ये तो थी प्रेम की फिलोसोफी. अब हम आपबीती पे आते हैं.
दरअसल ये बिलकुल सच है कि आदिकवि के टाइम से ही प्रेम और वियोग रस से ही हर कवि की शुरुआत होती है. ठीक से याद किया जाए तो सबसे पहला शेर हम एक ग्रीटिंग कार्ड में पढ़े थे और पहिले-पहल लिखे भी थे तो दोस्त के लिए लव लेटर में. उधर से तारीफ क्या मिली जैसे हमको चस्का सा लग गया. फिर धीरे धीरे स्कूल कॉपी के आखिरी पन्ना में भारी-भरकम हिंदी-उर्दू शब्दों का कलेक्शन तैयार होने लगा था. सर्किल में इमेज भी भयंकर होने लगा था.
हालाँकि तबतक हम शब्दों के भाव में नहीं उतर पाए थे. मगर फिर एकजोड़ी आँखों ने मुझे शब्दों की गहराई में झांकना सिखा दिया. आह! फिर तो कागज में दो शब्द लिखते ही पूरा फ़िल्मी सिन दिमाग में घुमने लगता. ‘हमने सनम को ख़त लिखा’ गाना मन के बैकग्राउंड में बजने लगता. हम कागज को सीने से लगा चूमने लग जाते. नदीम-श्रवन और समीर के गानों से शब्द चुराने का सिलसिला गुलजार तक पहुंच गया था.
मगर कुदरत मुझे शायद मैच्यूर शायर बनाना चाहती थी. इसीलिए प्रेम के बाकी रंगों से भी जल्द ही मेरा पाला पड़ गया. दिल टूटने की कहानी बाद में. मगर बस इतना समझ लीजिये कि पहली बेवफाई या जुदाई में इंसान जितना रोता है न, माँ-कसम कौनो और गम का मजाल नहीं कि उतना आंसू निकलवा दे. साला आँख था कि मुनिसिपलिटी का फटा पाइप, धार बंद ही ना हो. सबसे बड़ा दिक्कत कि आप किसी से कह भी नहीं सकते. बाप भाई से बोलिए तो और सोंटाइए. दोस्त को क्या बोलते, एक तो खुद ही देवदास बना बैठा था और दूसरा हमारी वाली को आइसक्रीम खिला के स्लैमबुक भरवा रहा था. और ऐसे मे ही मेरी शायरी ने मेरा साथ दिया.
फिर तो दर्द की दास्ताँ लोर की लकीर पर ऐसे लहराने लगी कि महफील दर महफील हम मशहूर होने लगे. मेरे शेर पे जिधर सबसे ज्यादा ताली बजती, हम समझ जाते कि उधर अभी-अभी ही ग़मों की गंगा फूटी है. इन सब के बाद हम भी इन भावनाओं के भंवर में कई बार गोते लगा चुके, कई बार तैरकर वापस आये और कई बार डूब कर शहीद हुए. आप देख रहें हैं न मेरे लिखने में साहित्य का पुट आने लगा है. हमारे गुरूजी कहते थे परिपक्व प्रेमी ही परिपक्व कवि हो सकता है.
खैर कागजों के दौर से हम मोबाइल के दौर में जैसे आये, मेरी डिमांड और बढ़ गयी. sms लिखवाने के लिए. हालाँकि रोमन में लिखे लफ्ज़ कई बार अर्थ का अनर्थ कर जाते थे. अब एक्साम्प्ल हम यहाँ नहीं लिख सकते, आप अपनी कल्पना का सहारा लीजिये. स्टॉक रखने के लिए बस स्टैंड से दस-रुपैयवा शायरी की किताब का दामन थामना पड़ा. मगर मानना पड़ेगा कि उस सस्ते साहित्य में भी विलक्षण प्रतिभा थी. जितने भी ट्रक-बस में शेर पढ़े थे अबतक, सब के सब उसी किताब में थे. पल भर मुझे लगा कि शायद शायर भी शब्दों के सफ़र में निकला एक ड्राईवर ही होता है.
जैसे जैसे हम कॉलेज में पहुंचे, जमाना थ्रीजी फॉर जी होता हुआ तेज़ी से बदलने लगा. जवानी के दहलीज पर जकड़ी जनता बुक में कम और फेसबुक पर ज्यादा समय बिताने लगी. सोशल महफ़िलों की जगह सोशल मीडिया के ग्रुपों ने ले ली थी. फोल्लोवर बढ़ाने की रेस में सबके अन्दर का राइटर करेजा फाड़ के निकलने लगा था. आकर्षक डीपी वाले प्रोफाइल्स से रेस में हम पिछड़ने लगे. लाइक-कमेंट के पैमाने पर हारने लगे.
एक दिन ऐसे ही निराश हताश मोबाइल में डूबे हुए उनकी गली (प्रोफाइल) में दुबारा कदम नहीं रखने की कसम खाते हुए मीलों तक स्क्रॉल कर रहे थे. तभी बिजली चली गयी. चौक पर मुंह-मिजाज फ्रेश करने के उद्देश्य से लॉगिन करने वाले थे कि सड़क में ठोकर खा कर गिर गए. कसम से इतना गुस्सा आया व्यवस्था और सरकार पर! जैसे किसी ने ओझाई-मंतर कर दिया हो, टप-टप टाइप करते रह गए आधे घंटे तक. और फिर नींद की आगोश में चले गए. सुबह सुबह घर के बाहर फिर से दोस्तों की महफ़िल लग गयी थी. हम समाज के मुद्दों को आवाज़ देने वाले नए सोशल मीडिया स्टार हो गए थे. इनबॉक्स में बवाल मचा हुआ था. सब अपने अपने मुद्दे भेज रहे थे. भेजने वालों में कुछ नाम उन खुबसूरत चेहरों के भी थे जिनको देख कर हमने मुस्कुराना सिखा था.
और इस तरह ‘इश्क से शुरू हुई शायरी’ और अब ‘शायरी से इश्क’ में तब्दील हो गयी.
© Sunny Shukla
12 Feb 2021, 08:21

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