Sunday, February 21, 2021

स्कूल वाला बाल दिवस




स्कूल में भोरे-भोरे जब सुंदर वाली मैडम मोर्टन देती थीं, तब याद आता था कि आज तो चिल्ड्रेन्स डे है, फिर क्या अंदर से लगता था कि आज वैल्यू मिलेगा। बदमाशी करने पर भी टीचर नहीं मारने वाले, मन में चाचा नेहरू का चेहरा याद आ जाता था, नेहरू कोट पर गुलाब लगाए नेहरू, मन-ही-मन उनको आज के दिन के लिए धन्यवाद देते थे।

स्कूल में बहुत सारी प्रतियोगिताएँ भी होती थी। हमको तो स्पेशली स्लो साइकिल रेस पसंद था, ये अलग बात है कि कभी जीते नहीं, भाषण प्रतियोगिता, डांस, दौड़ सब होता था। हम तो दर्शक दीर्घा में बैठने वालों में से थे, तो खाली अंतिम दिन मजा लेते थे। का है ना हाइट बढ़ा नहीं था, स्कूल में तो सबसे छोटे कद के थे दौड़ में लम्बा लड़का सब जीत जाता था। प्रार्थना में भी हमको हमेशा सबसे आगे खड़ा किया जाता था, लड़की लोग से भी आगे।

भाषण पतियोगिता में भाग नहीं लिए क्योंकि थोड़े शर्मीले स्वभाव के थे, डांस तो दोस्त के बियाह के लिए बचा के रखे थे, अब तक सबके बियाह में नागिन डांस ही कर रहें और सेन्स ऑफ़ ह्यूमर अच्छा था तो वो तो दर्शक दीर्घा के लिए था। बड़ा होने के बाद पता चला कि हम तो भाषण देने के लिए ही बने हैं। लेकिन तब तक ढेरे देर हो गया था। अब जो-जो भाषणबाजी करता था वो तो अपने आप को बुद्धिजीवी समझता था;जैसे आज कल रविश कुमार। जो डांस करता था या करती थी वो अपने आप को अक्षय कुमार आउ माधुरी दीक्षित बुझ के घूमते थे। एकदम अलग ही भाव था। हम तो बस गप्प मार के, मजाक उड़ा के ही काम चला लेते थे, पर सच कहे तो सबसे जादे मजाक हमरे उड़ता था।

सच बोले तो एक बाल दिवस ही है जिस दिन बच्चा लोग चैन से स्कूल जा सकता है। बैग ले जाने का झंझट नहीं, पढ़ाई का किचकिच नहीं, थोड़ा अपनापन भी लगता है। खाने के लिए भी मिल ही जाता है, मजा भी आता है प्रोग्राम का, ई सब अब कहाँ? अब समझ आता है कि असली मस्ती तो स्कूल में ही था। अब तो जिंदगी और चेहरे की मुस्कान भी झूठी है।

©Sunny Shukla
14 Nov 2018, 12:16

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