Wednesday, November 30, 2022

कूल फैशन

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जाड़ा आ गया है, हाथ से बीनल ऊन का नया स्वेटर पहनने के लिए कितना उत्साहित रहता था लइकन सब बचपन में। माई तो बनाती ही थी, मौसी और फुआ लोग भी भेज देती थी, आपन हाथ से स्वेटर बुन के। स्वेटर में नेह सान के जैसे अपनापन के गर्माहट में लपेट देता था। अनकहा नियम था कि बनाने में भूल चूक से छोट बड़ हो जाए, तो जेकर फिटिंग के बन जायेगा, ओकरे गिफ्ट् मिल जायेगा। अब ओतना मेहनत से सुन्दर डिजाइन बनावल तनी बेसाइजो हो जाने पर अफसोस तो लगता ही होगा, लेकिन रिश्ता में मिठास बनल रह जाता था।
पलामू में दिवाली बाद, मने छठ आवत आवत तक ला तो जाड़ा लगहीं लगता है। सब के अलमारी आऊ ट्रँक से कम्बल, रजाई, सूटर निकल के छत पे पसारल मिलता है, लेकिन ई जाड़ा के जुगाड़ तुरंते नही, कुछ महीना पहिलहीं से ईस्टाट हो जाता है। गांव में फेरी वाला साइकल पर रंगबिरंगा ऊन के लच्छा लेके सप्ताह में तीन चार बार घुमत दिख जाता था। अब न लेदर के जैकेट आऊ डिजाइन वाला हुडी आ गया है, पहले ऊन का अलग ही डिमांड चलता था, गांव के महिला समाज एकदम लुझल रहती ऊन लेने के लिए। केकरो एक किलो तो केकरों डेढ़ किलो। ऊन आऊ कांटा लेने के बाद तो मने हर घरी हाथ में उहे नज़र आता। ऊ लोग के खाना बनईते केकराे से बतीयईते उंगली तेज़ी से दौड़ते रहता था।
मल्टीकलर डिजाइन के आलावा गर्म भी रखता था सूटर, आऊ चलता भी बहुत था। बाप रे बाप इगो सूटर याद है, पांचवा कलास में मम्मी बना के दी थी दसवां कलास तक चला था। ऊन के बुनावट शरीर के हिसाब से फ़ैलियो जाता है, साइज एडजस्ट हो जाता था। वैसे तो माई लोग के आदते है, तनी बढ़न बनाना लेकिन उसका साइज भी खतरनाके एडजस्ट करता था, एक एक साल बाद एक एक इंच बढ़ जाता था जइसे। कोई कोई चाचा लोग का सूटर तो दसों साल पुराना होता है और बड़ा शौख से पहिनते हैं।
बड़का भाई के कपड़ा छोट हो जाने पर छोटका भाई को गिफ्ट वाउचर मिलता है, ई तो सब घर के कहानी है लेकिन मज़ा तब आता था, जब बड़का भाई ला नया सूटर बिनाता था और गलती से तनी छोट बन जाता था। मने एक साथ दू गो सूटर! अइसन खुशी लगता था जैसे जाड़ा में छठी मईया छोटके पे मेहरबान हो। क्लास के लाइकन में कंपटीशन भी रहता था कि केकर सूटर जादे बढ़िया है। स्कूल यूनिफार्म का मशीन से बिनाया स्वेटर ज्यादा से ज्यादा तीन चार साल चलता, वही घर में बिनाया स्वेटर ज्यादे गब्स भी रहता था और कभी भी कन्धा, गर्दन के पास से उसका रंग भी उड़ जाता था।
अब तो खैर लेदर जैकेट, ब्लेजर, कोट के भीड़ में बड़ी मुश्किल से देखेला मिलता है ऊन के बिनल सूटर। पहले के महिलाओं का हस्तकला का जरूरी मापदंड सिलाई और बुनाई ही होता था, इसीलिये ये आम बात थी। 1962 के युद्ध काल में बर्फीले बॉर्डर पर तैनात ऊँचे कद-काठी के जवान सिपाहियों को हाथ से बिनल स्वेटर भेजने के लिए हमारे माँ, मौसी, चाचीयों के स्कूल टाइम में होड़ मची रहती थी, इसीलिये सब के सब दक्ष होती थी। बुतरू लोग को नानुकुर करने पर इ सब कहानी डेढ़ पसली छाती चौड़ी करने हेतु सुनाई जाती थी।
जैसे जैसे लोहे कि सलाईयों पर जादुयी उंगलियां चलने लगती, प्रेम की परिभाषा और सुदृढ़ होती जाती। विदेशों में सूटर बुनना किसी जेंडर विशेष की बपौती नहीं होती, बल्कि एक कला है, कौशल है। अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में हाथ से बुने स्वेटर की अपनी विशिष्ट जगह है जो अलग अलग रूप, रंग और डिज़ाइन में साल दर साल वापस आते रहता है।
चलिए अब अस्कताइये मत, अपने बचपन के एकदम पसंदीदा सूटर के कलर और डिजाइन माने फूल था की हॉफ, कॉलर वाला की 'भी' गला वाला था, कॉमेंट कर के बताइए और नॉस्टलजिया में डुबकी लगा आईये एहई बहाने|
© बालेन्दु शेखर एवं शिवांगी शैली
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Sunday, November 27, 2022

लकड़ी का चूल्हा

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आज हर शहर, हर गांव और हर घर मे गैस का इस्तेमाल होता है। पर हमारे घर की छत पर चूल्हा भी बना हुआ था। हर सर्दी हम बहन भाई दोपहर को चूल्हे पास माँ के हाथों की बनी रोटी खाते थे। गर्मा गरम रोटियां खाने मेँ बड़ा मजा आता था। अब ना माँ है ना वो चूल्हा। हमारा बचपन अनमोल था।
हम ही नहीं इस पीढ़ी के बहुत से लोगों ने उस दौर को देखा होगा जब लकड़ी के चूल्हे का प्रचलन था, मांएं खाना बनाती थीं और बच्चे वहीं बैठकर आग की गर्माहट और माँ का सानिध्य पाते थे। तब की माएं सबकुछ हाथ से करने के बावजूद बहुत फुर्सत में होती थीं, हो भी क्यों न तब मोबाइल का दौर जो नहीं था! फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम का बुखार नहीं था! सिलबट्टे पर मसाला पिसना, खुद बर्तन धोना, बिना कूकर के सब्जी, दाल बनाना, यहाँ तक की गेहूं, चावल वगैरह भी जांते में पिसने का चलन था तब जाकर गृहणियां खाना बनाती थीं, वो भी लकड़ी या गोएंठे पर। कुछ महिलाएं बाद में भूसी चूल्हे और मिट्टी तेल वाले स्टोव का प्रयोग करने लगीं जिसे जलाना भी सबके वश की बात नहीं थी। पिन मारकर, माचिस लगाकर तब पंप मारने के बाद स्टोव जलता था, घर्र घर्र की आवाज के साथ। इंतज़ार रहता कि कब ये बंद होगा और शांति होगी। अगर आपने मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना बनाने या माताओं को बनाते हुए देखा होगा तो जरूर ही उस आग में कभी आलू, शकरकंद और बादाम भी पकाया होगा। उस स्वाद के आगे सारे स्वाद फीके हैं। खासकर आग में भूनकर पकाए हुए आलू का स्वाद काफी बेजोड़ हुआ करता था, हो भी क्यों न तब बिना खाद वाले आलू मिलते थे जो स्वाद से भरपूर होते थे। उसी चूल्हे पर हमारी माताएं हमें पढ़ाई के साथ साथ पाककला में दक्ष बनाने की ट्रेनिंग भी देती थीं!
रोटी बनाते समय अंत में आटे की एक लोई यह कहकर छोड़ दी जाती थी कि इसे टेढ़ा मेढ़ा, कच्चा पक्का कैसे भी बनाओ, इसे तुम्हें ही खाना है! तब तो मन में चाइलेंज की भावना आ जाती थी और हम अपनी पूरी मेहनत झोंक दिया करते थे कि कैसे भी रोटी अच्छी ही बनाना है। उस दौर में अपने घर में ही आग जलाना कोई जरूरी नहीं था अगल बगल से भी रसम मांगने की परंपरा थी और इसी बहाने पड़ोसियों के हालचाल, सुख दुःख भी हम पता कर लिया करते थे। अभी जैसा अपार्टमेंट कल्चर नहीं था कि बगल में कौन रहता है मालूम ही नहीं, सुख दुःख में शामिल होना तो दूर की बात है। मतलब आपसी सौहार्द बनाये रखने में भी लकड़ी के चूल्हे ने अहम भूमिका निभाई! बस धूएं से महिलाओं की आंखों पर असर, आंखों से पानी आना, सांस की दिक्कत, सिरदर्द वगैरह की समस्या होना मात्र ही उस चूल्हे का माइनस प्वाइंट था ।
लकड़ी के चूल्हे के खात्मे के साथ ही खत्म हो गया बर्तन में ’ लेवकन ' (बर्तन को काला होने से बचाने के लिए मिट्टी और राख का लेप ) लगाने का रिवाज । ' लेवकन ' लगाने की कला भी सबके वश की बात नहीं थी, हमने भी महीनों बाद इसमें निपुणता पाई थी । अच्छे से अगर बर्तन में लेवकन न लगा हो तो उस बर्तन को धोते समय नानी याद आती थी। कालिख से हाथ काले पड़ जाते और बर्तन की चमक भी फीकी पड़ जाती। उस दौर में महिलाओं के पास धैर्य भी बहुत था! अभी तो जल्दी से तीन चार सिटी लगाए और दाल तैयार! तब ऐसा नहीं था। धीमी आंच पर धीरे धीरे दाल गलती थी काफी देर में। जाड़े के मौसम में टमाटर डालकर ' कुलथी ' का दाल लगभग हर घर में बनता, घी का छौंक लगाकर। मान्यता यह थी कि कुलथी का दाल खाने से पेट कि पथरी गल जाती है और पाचन शक्ति दुरूस्त बनी रहती है। चना साग भी धीमी आंच पर धीरे धीरे पकता जिसका स्वाद ही अनूठा हुआ करता था, अब तो चने की साग भी कूकर में सीटियां लगाकर पकाई जाती हैं । लकड़ी के चूल्हे पर बनी सोंधी रोटियां आज भी मिल जाएं तो बड़े बड़े होटलों में बने नान, तंदुरी रोटी, कुलचा और पिज्जा की छुट्टी समझिए।
आप सब भी मिट्टी के चूल्हे पर बने भोजन के स्वाद और बनाने के अपने अनुभव यहां साझा करके एकबार पुराने दौर में चले जाएं। आपके अनुभव हमें काफी आनंदित करेंगे उम्मीद है।
© शर्मिला शुमि
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Friday, November 25, 2022

माटी का चूल्हा और आलू-पराठा

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जब कड़ाके की ठंड पड़ रही हो और माँ माटी के चूल्हे पर खाना पका रही हो तो मुंह से यही शब्द निकलते हैं- "गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त/ हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त" (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं)। फिर अगर तवे पे आलू-पराठा सींक रही हो, तो फिर नवाबों वाली फीलिंग्स आने लगती है।
जी हाँ, बात आजकल की ही हो रही है, जाड़े के दिनों की। इन दिनों अक्सर बाजार मे नए आलू और पुराने आलू के बीच श्रेष्टता का जंग छिड़ी होती है और इस जंग के बीच में फैसला कीमतों से तय होता है और फैसला हो जाता है, जो आलू सस्ता है, वही अच्छा है। खैर नया हो या पुराना, आलू तो आलू है, स्वाद में बेमिसाल।
आलू की बात इसलिए भी क्योंकि जाड़े के दिनों मे अक़्सर ही आलू-पराठा घर में बनता है। जाड़े के दिनों में जब खाना बनाने में ठंड लगे तो मिट्टी का चूल्हा याद आता है और फिर कहीं से लकड़ी का जुगाड़ तो हो ही जाता है। रोटी के साथ-साथ हाथ पैर सेंकने के लालच मे महिलाएं मिट्टी के चूल्हे की तरफ ज्यादा आकर्षित होती हैं।
अब सिलसिला शुरू होता है, आलू-पराठा बनाने का। मिट्टी के चूल्हे पर बने पराठे और #टमाटर की खट्टी-मीठी चटनी की तुलना अगर गैस और इंडक्शन पे बनाये गये पकवानों से करें, तो ये कलयुग का घोर पाप होगा। आलू पराठा के साथ अगर #लहसून और #धनिया की चटनी मिल जाए, तो अहाहा फिर क्या बात है। मतलब स्वाद ही अलग होता है, शब्दों में बयां करना असंभव है। चूल्हे मे जलती आग को देख कर हाथ सेंकने के बहाने ही घर के बच्चे भी काम मे हाथ बटाने लग जाते हैं। चूल्हे से कुछ दूर पे अपनी #अंगिठी के साथ बैठी दादी भी अपनी कहानियां सुनाती रहती है और इस तरह हंसते हुए गप्पे लड़ाते पराठा भी तैयार हो जाता है और जब #गरमा_गरम रोटी थाली में मिलती है, तो खुद को रोक पाना मुश्किल हो जाता है। फिर क्या पराठा के साथ-साथ हाथ, मुह, पेट सब गरम, खैर इसका ही तो स्वाद है। #दुअछिआ चूल्हा हो तो साथ में आलू गोभी की #रसदार (झोर) तरकारी बनने मे भी देर नहीं लगती और पानी भी तो गर्म करना होता है पीने के लिए, पलामू के ठंड मे कनकना पानी कौन पीता है भाई।
तो जाइए और मिट्टी के चूल्हा में आलू भरल रोटी बनाइए और अलौलिक सुख का आनंद लीजिए। और अगर मिट्टी का चूल्हा ना मिले, तो पहले चूल्हा बनवाइए लेकिन चूकिए नहीं इस बार।
आप लोगों ललचाने के लिए फोटो भी एड कर दिए हैं।
© बालेन्दु शेखर
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Thursday, November 24, 2022

डाल्टनगंज-राँची रूट में लूटपाट

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कुछेक दशक पहले की बात है, जब शाम 4 बजे के बाद राँची के लिए निकलना हम पलामुवासियों के लिए साक्षात मौत का दर्शन करना होता था। कारण, रास्ते में लातेहार पार करते ही चोर-लुटेरों-डकैतों का खुला तांडव। शाम ढली नहीं कि कोई दुस्साहसी भी हिम्मत नहीं करता था, उन रास्तों को पार करने की। भय का आलम ये था कि बस भी नहीं मिलती थी शाम 4 बजे के बाद। रांची से पूरे राज्य के लिए रात्रि बस सेवा उपलब्ध थी, सिवाय डाल्टनगंज के लिए।
वक़्त बदला, प्रशासन चुस्त हुआ, विकास के पहिये ने रफ्तार पकड़ी। कभी खून की होली खेलने वाली बदनाम सड़क ने भी शांति की चादर ओढ़ ली। अब बेपरवाह होकर किसी भी वक़्त राँची- डाल्टनगंज - राँची की यात्रा होने लगी। फलस्वरूप डाल्टनगंज में भी बड़े-बड़े डॉक्टर, व्यवसायी दिन में काम निबटा शाम को राँची लौटने लगे। डाल्टनगंज वाले भी दिन में राँची का काम निबटा, देर रात तक वापस घर लौटने लगे। पर्यटन उद्योग भी धीरे-धीरे ही सही अपना पैर पसारने लगा। सुदूर पलामू अब बाकी राज्य से अच्छे से कनेक्ट हो चुका था। पलामू पर अशांत क्षेत्र का धब्बा धीरे-धीरे धुलने लगा था। लगा अब तो लूट-मार बीते कल की बात हो चुकी है। ये सब तो बच्चों को डराने की कहानियाँ भर हैं।
लेकिन कहते हैं ना कि शांतिकाल किसी तूफान के पहले की आहट होती है। इस रूट पर भी शांति ज्यादा दिन नहीं टिक सकी। आय दिन गाड़ियों के लुटे जाने की खबर सुर्खियां बन रही हैं। पिछले दो माह में लगातार तीन चार दिल दहलाने वाली घटनाएँ घटी है लातेहार से कुड़ु के बीच में। यात्रियों को मारा पीटा गया है। महिलाओं से बदसलूकी की गयी है, उनके जेवर आबरू लुटे गए हैं। पुलिस प्रशासन सभी घटनाओं को सिर्फ एक संख्या मान रजिस्टर में नोट करता जा रहा है। मीडिया में इन घटनाओं को कभी स्थान मिला है कभी नहीं। तांडव जारी हो चुका है और भय का माहौल फिर से फ़िज़ा में घुल चुकी है। घातक रोग से मरणासन्न लोग अब पलामू में मरना पसंद कर रहे हैं बजाय कि रास्ते में लूट जाने के। आखिर कौन अपने परिवार की इज़्ज़त - संपत्ति लूटवाना चाहेगा। व्यापार निवेशकों के बीच पलामू फिर से डार्क स्पॉट बन कर उभरने लगा है। जहां एक तरफ दूसरे जिलों में बड़े बड़े संस्थान और उद्योग स्थापित हो रहे हैं, हमारे यहां पलामू वासियों के ओछी हरकत और आपराधिक छबि के कीर्तिमान गढ़े जा रहे हैं।
किसी भी विकास की पहली शर्त समाज में शांति ही होती है। उपद्रवी समाज कभी विकास नहीं कर सकता, जहाँ चोर-उचक्के अपनी लक्षणों से बाज नहीं आते, लक्ष्मी-सरस्वती को भी रूठ कर उस स्थान को त्यागने में वक़्त नहीं लगता।
इन घटनाओं के लिये भले प्रशासन को अपशब्द कह लें लेकिन हमारे हिसाब से तो सारी समस्या की जड़ पलामूवासी खुद हैं। हजार दस हजार के लिए ऐसे तुच्छ कृत्य कर के पूरे क्षेत्र की इज्जत मिट्टी में मिला रहे हैं और भविष्य के विकास समृद्धि की उम्मीद को अंधेरे में धकेल रहे हैं। हम बहुत उम्मीद के साथ आप सब से विनती कर रहे हैं - कृपया सोचिए। ऐसी घटना को अन्जाम देने वाले हमारे गाँव घर के ही लोग हैं, उन्हें समझाइए, रोकिए अन्यथा सजा दिलवाइये। अन्यथा खुद की पैर पर कुल्हाड़ी चलाते हुए भयंकर दुष्परिणाम भोगने के लिए तैयार रहिए।
लूटपाट की घटनाओं की खबरों के लिंक्स आपको नीचे कमेंट बॉक्स में मिल जाएंगे। पढ़ें और बाकियों को भी सावधान करें। अपने बहुमूल्य अनुभव, सुझाव या विचार कमेंट करना ना भूलें।
© ठेठ पलामू
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Wednesday, November 23, 2022

ओल के तरकारी

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ओल के तरकारी भात चाप के सुसुsइते जैरमवा, दूरा देन ओटा पर बइठ के घाम तापइत आपन दादा से पूछलक- ' ए हो दादा, गुलाबी बहु कहत हलथिन की दिवाली के रोज ओल के तरकारी ना खएला तो अगला जनम में छुछुंदर के घर में जनम होतवा, सचों में का हो.…! ’
‘ मर का जनि तो ‘ आपन चवन्निया मुस्कान बिखेरइत दादा कलथिन।
‘अहो दादा…! अच्छा इ बतावा कि दशहरा चाहे दिवाली में सबके घर ओले के तरकारी काहे बनहsवा’ मने ओल के तरकारी का खएलक जैरमवा, ओकर सब सेन्स ऑर्गन एक्टिवेट हो गेल।
ओकर जिज्ञाषा शांत करइत दादा अस्थिराहे कहलथिं - ‘ ए हो बाबू…, ढ़ेर तो हम ना जानsहिवा, बाकि सुख-समृद्धि आउ धन-दौलत के बरsकत घर में सदा बनल रहे एही से दिवाली मनवल जाला। अब दिवाली से ओल के जोड़ के अइसे देखल जाला कि एक बार ओल लगा देला पर, हर साल अपने आप हो जाला, एकर जड़ पूरा कहिनो ना निकले, इन साल कोड़ लेला तबो अगला साल अपने हो जातवा। येही से सबनि इहे चाह हत कि सुख-समृद्धि आउ धन-दौलत आपन घर में कहिनो ना ख़तम होखे, जैसे की ओल ’
पहिले पब्लिक घर के बगान में, चाहे पाखा तर या घोरानी में ओल लगाता था; आजकल तो एकर व्यवसायिक खेती भी होने लगा है।
बाकी एगो इहो कहावत है कि- ओल मुँह छोल, अब बढ़िया नहीं बनेगा तो इहे न कहियेगा। वैसे अगर देहाती ओल ठीक से नहीं बना न…, तो खएला के बाद आपका तुरंत माईलेज बढ़ जायेगा। इहे से तनी खटाई या सिरका डाल के अस्थिरहे बनाइये और प्रेम से भात साथे खाइये। नहीं.. नहीं.. दाल काहे बनाना है; अइसहु एकर तरकारी मीट के फेल कर देता है ।
बड़ी लोग मुँह रब-रबाने के डर से हाईब्रीड (मद्रासी) ओल ले आता है, बाकि उ आलू तरी लगता है जी, उसमे देहाती वाला मज़ा नहीं आएगा। हमनी जेकरा ओल कहते है, कई जगह पर इसको जिमीकंद या सुरन भी कहल जाता है। बड़ी पौस्टिक तरकारी है या यूँ कहे की एक बहुमूल्य जड़ी-बूटी है। इसमें घुलनशील फाइबर, विटामिन-सी, विटामिन-बी6, विटामिन-बी1 और फोलिक एसिड तो रहबे करता है साथ में पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम और फॉस्फोरस भी ठूस-ठूस के भरल रहता है। ओल एंटी-इंफ्लेमेटरी जो हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, नहीं तो बीमारी हर थोड़े समय के बाद दस्तक देते रहेगा और एंटी-ऑक्सीडेंट मने शरीर के कोशिकाओं को खराब होवे से बचाता हैं, इससे कैंसर, उम्र के बढ़ने व अन्य रोग होने से हमारा बचाव होता है जैसे गुणों से भरपूर होता है और ये कई तरह की दिक्कतों को कम करने में मदद करता है। मने इ जड़ वाला तरकारी पोषक तत्व का पावर-हाउस हैं और एक सयंमित मात्रा में ओल खाए से ढ़ेर फायदा है।
तो फिर देर कउन बात के जाड़ा के मौसम हइये है, केकरो घर के पाखा या घोरानी से एकाद किलों के ओल कोड़िये, आउ नहीं तो बाजारे से ले आइये, फिर तरकारी… चाहे चोखा… या फिर पकौड़ी ही बना के खाइये, कसम से बड़ी आनंद आएगा। एक बिनती और इससे जुड़ी यादें और बातों को साझा करना मत भूलियेगा।
© अवनीश प्रकाश
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Sunday, November 20, 2022

"सास चालीसा"

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जै जै जै सासू माई, कृपा करहूं केकरो पे नाहीं।
नाती पोता के खूब दुलारें, पूतोह में खाली नुक्स निकालें।
बेटवा के रामचंदर बुलाईं, पूतोह के हिडिम्बा बतलाईं।
सुरसा जइसन मुँह फुलाईं, झूठ साँच के बात बनाईं।
सुबह शाम बस ठांस भोजनम, हर कौर में जली कटी सुनाईं।
भर थरिया नरेटी तक ठांसी, नुक्स निकाल के बाण चलाईं।
हर बात पे समधन समधी, बिना बात के आग लगाईं।
बिना धुआं के आग उठाईं, पूतोह के दोष ढूंढ लाईं।
जै जै जै सासू माई, कृपा करहूं केकरो पे नाहीं।🙏
अब तक तो आपको समझ में आ ही गया होगा कि किसी दुखी बहू(पतोहु) ने ही इन पंक्तियों का सृजन किया है। अब करें भी तो करें क्या, जाएं भी तो जायें कहाँ, कोई तो होना ही चाहिए ना अपना दुखड़ा सुनाने के लिए।
कहने को तो सास-बहू का रिश्ता ऐसा होना चाहिए कि बिना ज्यादा मेहनत के नैसर्गिक रूप से प्रफुल्लित होता रहे। सास-बहु के सम्बन्ध अगर प्रगाढ़ रहते हैं, तो परिवार में किचिर-किचिर भी कभी नहीं होता है। लेकिन घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर लेगा तो खायेगा क्या, अगर सास की बहू से दोस्ती हो जाये तो रामराज्य ना आजाये इस धरती पर। घरेलू हिंसा, पारिवारिक कलह, रिश्तों में दरार के ज्यादातर बीज, फफूँदी लगे इन रिश्ते के कारण ही होते हैं।
लड़का-लड़की का कुंडली मिलान ना जाने क्यों शादी के पहले करते हैं, जबकि असली गृह शांति तो दूल्हे की मतारी के साथ पंचांग फिट करने पे ही आनी है। बेचारा पतिदेव तो कोने में दुबका अपनी नियति का रोना रो रहा होता है, उसके लिए एक तरफ कुंआ है, तो दूसरी तरफ खाई है।
बहू अगर हाउस वाइफ है, तो हर बात में पैसे का ताना कि माँ बाप ने तुम्हे पढ़ाया ही क्यों, अगर घर में चूल्हा ही फूंकना था। अगर नौकरीपेशा हो, तो भी परेशानी कि मुझे कौन सा गहना बनवा देती है, अपना कमाती है खुद्दे उड़ाती है। कोई काम धाम नहीं करती, बस तैयार हो बैग टांग के मैडम बन जाती है और यहां बुढापा में भी हमें ही घर संभालना पड़ रहा है।
अगर फैमिली प्लानिंग कर लिया, तो जैसे आसमान सर पे उठा लेती है, नाना प्रकार के बाबा और वैद्य का चक्कर। वारिस का तो ऐसे इंतेजार करती है, जैसे कोई सल्तनत की महारानी हो और उत्तराधिकारी का इंतजार है बस सत्ता सौंपने के लिए। अगर बच्चे जल्दी कर लिया, तो सबर नहीं था, कुछ सेटल हो जाते तो करना चाहिए था। एक बच्चा हुआ नहीं कि दूसरा का प्रेशर और कहेंगी की बड़का ही छोटका को पाल लेगा, दुनों एक साथे बड़ा हो जाएगा। बेचारी बहु को तो किसी भी परिस्थिति में चैन ही नहीं।
बेटा कैसा भी नालायक, बदतमीज और बदसूरत हो, लेकिन बहू तो सर्वगुणसम्पन्न ही चाहिए और दिखने में तो अप्सरा को भी मात देती हो। बहू के गुणों को दिन भर बैठकर तराजू में तौलना, तो जैसे मनपसंद टाइमपास हो सास नामक प्राणी का।
एक माँ के तौर पर एक नारी गेंदे के फूल सी होती है; ज्ञान, श्रद्धा, वात्सल्य, सबूरी, असीम प्यार, अपनापन से भरी हुयी, कई खुशबुओं को अपनी सत्तहों में संजोई हुयी। गृहस्थी की गाड़ी का एक चक्का नहीं अपितु पूरी की पूरी इंजन ही होती है माँ, रीढ़ की हड्डी होती है, ह्रदय होती है माँ। सालों तक पूरे परिवार के प्यार, मान सम्मान, महत्त्व की एकछत्र स्वामिनी होती है माँ। परिवार की शुरुवात नारी के घर में कदम रखने से होती है। परिवार का मतलब ही नारी होता है। हालांकि मैं ज्यादा फेमिनिस्ट विचारों की नहीं और बड़ाई तो करने की आदत बिलकुल भी नहीं, लेकिन आदर्श परिस्थितियों में ऐसा ही होना चाहिए।
© ठेठ पलामू
नोट- लेखिका के विशेष आग्रह पर हमने उनका नाम नहीं प्रकाशित किया है। इस पोस्ट के जवाब में हमने उनकी सास से सम्पर्क साधा है। सास का जवाब मिलते ही जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा।
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Thursday, November 17, 2022

मेहराईल सलाई

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सावन भादो की वो झिंगुरों की सहनाई वाली शाम और रिमझिम बारिश में झाँपी ओढ़े हमारे मिट्टी के घर के ढाबे में गाँव के बूढ़ी फुआ के आवाज की गूँज, उस समय हमारे कानो में पड़ती है, जब माँ की मार के डर से शाम ढलते ही लालटेन जलाकर हम भाई-बहन 'ढाबे' में पढ़ाई करने बैठे होते हैं।
ये बड़को, अहो भउजी नईखs सुनइत हो....ए भऊजी तनी सुनs न, आज हमर चुल्हा में आग नईखे धरईत भऊजी, तनी सुन 'रसम' पईंचा द न हो..... हमरा लगईत बा गोसाईल ह का? रोज रोज आ जा ही ईहे से!!!..अहो भऊजी माना ना करिहा, साँचो कहईत हिओ सलाई रखले हली पटदेहर पर अँगोछा में मेढ़ के लेकिन का बतइयो बड़को मुवना उहाँउ पानी चू के सब बोथा हो गेलो, पूरा सलाइये मेहरा गेल हवs, आउ तू तो जनते ह की अब सनीचर या मंगर बाजार लगी तब ने नया लाईब। आऊ तो आऊ चूल्हो पर पानी चू-चू के सब सीड़ गेल हवs, एहि से चिपड़िये पर तनी कुना रसम दे द न हो, न तो बियारी बनावे के कोई उपाय ना हन......
ई 'इनर भगवान' में लागत बा छेद हो गईल बा, ना मनिहें हम गरीबन के जियल मुश्किल हो गईल बा, सब जलमगन कर देले हथ इनरा-पोखरा, नदी-नाला सब भर गेल बा, मालो-जाल के तनी दिक्कत ना हन, हिरवन कहऊँ चरईत-चोथईत ना हत सब झाला झमङी में भींज के ठिठुरइत हत, न जाने कब उगिहें खाली हम गरीबन के परेशान कर देले हथ। छत में भी जवन चिपरी गोइठा ,झुरी काठी आउ रहरेठ हलक सब भींज गईल बा। तभी माँ फुआ को आग दे देती है और फुआ यह बोलते हुए बाहर निकल जाती है कि मन लगा के खूब पढ़s तोहनी सुनले.......
वाकई क्या दिन थे वो जब गाँव की रोजमर्रा की ऐसी बहुत सी समस्याएँ कोई असाधारण बात नहीं थी, बल्कि हमारे गाँव समाज की एक हकीकत थी एक हिस्सा हुआ करती थी । कितना प्यार था निश्छलता थी, उस माँगने वाले भाव में, कोई प्रपंच नहीं था कोई ग्लानि नही थी, अपने आप में कोई छोटपन या हीन समझने वाला भाव दूर-दूर तक नहीं था। जिसके पास जो भी उपलब्ध हो, हम आसानी से बेझिझक माँगते थे और मिल भी जाता था, पर आज वैसा कुछ नहीं बचा है। समय ने करवट लिया और आज हम विकास की ओर उन्मुख हो गये। अब गाँव की ढिबरी लालटेन की मद्धिम रोशनी की जगह एल ई डी की दूधिया प्रकाश ने ले लिया है, मिट्टी के चूल्हों को गोइठा, झुरी-काठी को दूर भगा कर एल.पी.जी. गैस सिलिंडर और चूल्हे उनकी जगह काबिज हो चुके हैं। मैं इस विकास की तारीफ करता हूँ कि इसने हमारी समस्याओं को खत्म कर दिया है। पर वहीं दूसरी तरफ हमारे विकास के इन्हीं पंखों ने हमारे अपनत्व को भी बहुत हद तक प्रभावित किया है। आज हम मिलजुल कर रहने, अपने सुख-दुख को एक दूसरे से साझा करने के बजाय, एकाकी जीवन जीने में अपने को गौरवान्वित महशुस करते हैं और करें भी क्यों नहीं, खुद में सिमट कर जो रह गये हैं। आज भी जब गाँव जाता हूँ उन सब स्मृतियों में खो जाता हूँ पर अब 'वो' कहीं दिखाई नहीं देते, पूरा गाँव बस अपने-अपने में व्यस्त है किसी का किसी से कोई सरोकार नहीं है।
© राकेश गोस्वामी
May be an image of text that says "मेहराईल सलाई रसम मांगने की एक कहानी"