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सावन भादो की वो झिंगुरों की सहनाई वाली शाम और रिमझिम बारिश में झाँपी ओढ़े हमारे मिट्टी के घर के ढाबे में गाँव के बूढ़ी फुआ के आवाज की गूँज, उस समय हमारे कानो में पड़ती है, जब माँ की मार के डर से शाम ढलते ही लालटेन जलाकर हम भाई-बहन 'ढाबे' में पढ़ाई करने बैठे होते हैं।
ये बड़को, अहो भउजी नईखs सुनइत हो....ए भऊजी तनी सुनs न, आज हमर चुल्हा में आग नईखे धरईत भऊजी, तनी सुन 'रसम' पईंचा द न हो..... हमरा लगईत बा गोसाईल ह का? रोज रोज आ जा ही ईहे से!!!..अहो भऊजी माना ना करिहा, साँचो कहईत हिओ सलाई रखले हली पटदेहर पर अँगोछा में मेढ़ के लेकिन का बतइयो बड़को मुवना उहाँउ पानी चू के सब बोथा हो गेलो, पूरा सलाइये मेहरा गेल हवs, आउ तू तो जनते ह की अब सनीचर या मंगर बाजार लगी तब ने नया लाईब। आऊ तो आऊ चूल्हो पर पानी चू-चू के सब सीड़ गेल हवs, एहि से चिपड़िये पर तनी कुना रसम दे द न हो, न तो बियारी बनावे के कोई उपाय ना हन......
ई 'इनर भगवान' में लागत बा छेद हो गईल बा, ना मनिहें हम गरीबन के जियल मुश्किल हो गईल बा, सब जलमगन कर देले हथ इनरा-पोखरा, नदी-नाला सब भर गेल बा, मालो-जाल के तनी दिक्कत ना हन, हिरवन कहऊँ चरईत-चोथईत ना हत सब झाला झमङी में भींज के ठिठुरइत हत, न जाने कब उगिहें खाली हम गरीबन के परेशान कर देले हथ। छत में भी जवन चिपरी गोइठा ,झुरी काठी आउ रहरेठ हलक सब भींज गईल बा। तभी माँ फुआ को आग दे देती है और फुआ यह बोलते हुए बाहर निकल जाती है कि मन लगा के खूब पढ़s तोहनी सुनले.......
वाकई क्या दिन थे वो जब गाँव की रोजमर्रा की ऐसी बहुत सी समस्याएँ कोई असाधारण बात नहीं थी, बल्कि हमारे गाँव समाज की एक हकीकत थी एक हिस्सा हुआ करती थी । कितना प्यार था निश्छलता थी, उस माँगने वाले भाव में, कोई प्रपंच नहीं था कोई ग्लानि नही थी, अपने आप में कोई छोटपन या हीन समझने वाला भाव दूर-दूर तक नहीं था। जिसके पास जो भी उपलब्ध हो, हम आसानी से बेझिझक माँगते थे और मिल भी जाता था, पर आज वैसा कुछ नहीं बचा है। समय ने करवट लिया और आज हम विकास की ओर उन्मुख हो गये। अब गाँव की ढिबरी लालटेन की मद्धिम रोशनी की जगह एल ई डी की दूधिया प्रकाश ने ले लिया है, मिट्टी के चूल्हों को गोइठा, झुरी-काठी को दूर भगा कर एल.पी.जी. गैस सिलिंडर और चूल्हे उनकी जगह काबिज हो चुके हैं। मैं इस विकास की तारीफ करता हूँ कि इसने हमारी समस्याओं को खत्म कर दिया है। पर वहीं दूसरी तरफ हमारे विकास के इन्हीं पंखों ने हमारे अपनत्व को भी बहुत हद तक प्रभावित किया है। आज हम मिलजुल कर रहने, अपने सुख-दुख को एक दूसरे से साझा करने के बजाय, एकाकी जीवन जीने में अपने को गौरवान्वित महशुस करते हैं और करें भी क्यों नहीं, खुद में सिमट कर जो रह गये हैं। आज भी जब गाँव जाता हूँ उन सब स्मृतियों में खो जाता हूँ पर अब 'वो' कहीं दिखाई नहीं देते, पूरा गाँव बस अपने-अपने में व्यस्त है किसी का किसी से कोई सरोकार नहीं है।
© राकेश गोस्वामी

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