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विद्यार्थियों का जीवन शुरू से ही परिश्रम और संघर्ष से घिरा होता है, होना भी चाहिए ऐसा मेरा मानना है। पर संघर्ष का मतलब सिर्फ Differentiation, Integration और Law of Motion समझने से ही नहीं है।
दसवीं तक तो विद्यार्थियों का जीवन आराम से निकल जाता है, असली संघर्ष तो दसवीं के बाद शुरू होता है, जब सब्जेक्ट-आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स मे बंट जाता है और आगे की पढ़ाई के लिए शहर गांव से दूर बुलाता है। विद्यार्थीगण अपना बोरिया-बिस्तर समेट के निकलने की तैयारी में होते हैं, साथ मे लेके निकलते हैं कुछ पैसे और बहुत सारी आशाएं, 'जिंदगी में सफलता पाने का'।
वे हो जाते हैं शहर जाने वाली सुबह की बस पर सवार,
अपने गाँव और जिले को करके पार,
अब तो सिर्फ मंजिल तक पहुचने का होता है इंतजार।
और यहां से शुरू होती है जिंदगी का टेस्ट,
कभी न कभी सबको बनना पड़ता है पेइंग गेस्ट।
नए जगह में नए लोगों के बीच रूम यानी डेरा खोजना सबसे बड़ी और पहली चुनौती होती है, जिसका सामना सभी विद्यार्थियों को करना होता है। यहाँ विद्यार्थियों को तलाश होती है दाखिला लिए गए कॉलेज के आसपास एक अच्छे से रूम की। इस कार्य की एक ही प्रक्रिया है, आसपास दिख रहे अच्छे मकान मे जाना और जितनी भोली सी सूरत आप बना सकते हैं बना कर हर मकान मे पूछना - जी अंकल किराये पर रूम मिलेगा क्या यहाँ? पर इस प्रश्न के उत्तर मे सामने से एक और प्रश्न आपकी ओर तीव्र गति से आएगा - बैचलर हो?
विद्यार्थी अपने मुख मे मिश्री घोले - जी अंकल इस साल ही कॉलेज मे दाखिला लिया है। फिर सामने से व्यक्ति इतनी क्रूरता से 'रूम नहीं है' बोलता है जैसे बेचारे लड़के ने उसकी सुपुत्री का हाथ मांग लिया हो!
ना जाने बैचलर लड़कों से शहर के लोगों को क्या परेशानी है, सोचते हुए लड़का दूसरे मकान की और जाता है और फिर वही सवाल दुहराता है, हालाकि मिठास कुछ ज्यादा रखने का प्रयास करता है। यहाँ उसकी मुलाकात होती है अलग किस्म के प्राणी से, 50-60 वर्ष का वृद्ध जो पहले लड़के से किसी प्रशासनिक अधिकारी की तरह सारा डिटेल्स ले लेते हैं। जैसे-शादी हुआ है? कितने बच्चे है? बैचलर हो कौन सी कॉलेज मे ऐडमिशन लिया है? कितना फीस लगा? दसवीं कहाँ से किया? कितने अंक आए थे? इतने सारे सवालों के जवाब देने के बाद भी बेचारे विद्यार्थी को एक ही ज़वाब सुनने को मिलता है "रूम तो नहीं है बाबू"।
लड़के के शरीर मे रक्तचाप अकस्मात बढ़ जाता है कि अगर रूम था ही नहीं, तो इतनी जानकारी इन्हे क्यों चाहिए थी? लड़का मन ही मन उस वृद्ध की अल्पायु की कामना करते हुए आगे बढ़ जाता है।
अगले ठिकाने पर फिर वही सवाल, लेकिन इस बार लगता है काम बन जाएगा, क्योंकि इस बार सामने वाले का उत्तर थोड़ा सकारात्मक होता है - रूम तो मिल जाएगा बाबू लेकिन पढ़ने लिखने वाले तो हो न?
विद्यार्थी - जी हाँ, इसीलिये तो कॉलेज में दाखिला लिया है अंकल।
"हाँ तो ठीक है, लेकिन रहना है तो हिसाब से रहना होगा, खाते-पीते हो या नहीं", व्यक्ति का मतलब रासायनिक रंगीन शरबत से था।
विद्यार्थी - अरे नहीं अंकल नहीं।
फिर से एक सवाल - हर फिक्र को धुएँ मे तो नहीं उड़ाते हो न?
विद्यार्थी - अरे अंकल ऐसी कोई आदत नहीं है।
उसके बाद कुछ कर्णप्रिय सुनने को मिलता है - तब ठीक है, यहां रह सकते हो पर कुछ शर्तें है, ज्यादा शोर शराबा नहीं, रात आठ बजे मेन गेट बंद हो जाएगा, कोई दोस्त या साथी बिना पूछे घर पर लाना सख्त मना है, पानी और बिजली का खर्च कम से कम होना चाहिए। विद्यार्थी बेचारा भोला सा चेहरा बना कर सारी शर्तों पर हामी भर देता है और नए शहर मे रहने का बंदोबस्त हो जाता है।
तो इस तरह पहला पड़ाव पार करके विद्यार्थी शहर में रहना शुरू करता है, पर अभी संघर्ष का सिलसिला समाप्त नहीं होता। आगे किस किस परेशानी का सामना करना पड़ता है विद्यार्थियों को जानेंगे अगले विद्यार्थी-जीवन के अगले भाग में।
तब तक जुड़े रहिए अपनी माटी और ठेठ पलामू पेज के साथ।
आपको अपना डेरा खोजने में किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा, कॉमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
© Balendu Sekhar

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