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जै जै जै सासू माई, कृपा करहूं केकरो पे नाहीं।
नाती पोता के खूब दुलारें, पूतोह में खाली नुक्स निकालें।
बेटवा के रामचंदर बुलाईं, पूतोह के हिडिम्बा बतलाईं।
सुबह शाम बस ठांस भोजनम, हर कौर में जली कटी सुनाईं।
भर थरिया नरेटी तक ठांसी, नुक्स निकाल के बाण चलाईं।
हर बात पे समधन समधी, बिना बात के आग लगाईं।
बिना धुआं के आग उठाईं, पूतोह के दोष ढूंढ लाईं।
जै जै जै सासू माई, कृपा करहूं केकरो पे नाहीं।
अब तक तो आपको समझ में आ ही गया होगा कि किसी दुखी बहू(पतोहु) ने ही इन पंक्तियों का सृजन किया है। अब करें भी तो करें क्या, जाएं भी तो जायें कहाँ, कोई तो होना ही चाहिए ना अपना दुखड़ा सुनाने के लिए।
कहने को तो सास-बहू का रिश्ता ऐसा होना चाहिए कि बिना ज्यादा मेहनत के नैसर्गिक रूप से प्रफुल्लित होता रहे। सास-बहु के सम्बन्ध अगर प्रगाढ़ रहते हैं, तो परिवार में किचिर-किचिर भी कभी नहीं होता है। लेकिन घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर लेगा तो खायेगा क्या, अगर सास की बहू से दोस्ती हो जाये तो रामराज्य ना आजाये इस धरती पर। घरेलू हिंसा, पारिवारिक कलह, रिश्तों में दरार के ज्यादातर बीज, फफूँदी लगे इन रिश्ते के कारण ही होते हैं।
लड़का-लड़की का कुंडली मिलान ना जाने क्यों शादी के पहले करते हैं, जबकि असली गृह शांति तो दूल्हे की मतारी के साथ पंचांग फिट करने पे ही आनी है। बेचारा पतिदेव तो कोने में दुबका अपनी नियति का रोना रो रहा होता है, उसके लिए एक तरफ कुंआ है, तो दूसरी तरफ खाई है।
बहू अगर हाउस वाइफ है, तो हर बात में पैसे का ताना कि माँ बाप ने तुम्हे पढ़ाया ही क्यों, अगर घर में चूल्हा ही फूंकना था। अगर नौकरीपेशा हो, तो भी परेशानी कि मुझे कौन सा गहना बनवा देती है, अपना कमाती है खुद्दे उड़ाती है। कोई काम धाम नहीं करती, बस तैयार हो बैग टांग के मैडम बन जाती है और यहां बुढापा में भी हमें ही घर संभालना पड़ रहा है।
अगर फैमिली प्लानिंग कर लिया, तो जैसे आसमान सर पे उठा लेती है, नाना प्रकार के बाबा और वैद्य का चक्कर। वारिस का तो ऐसे इंतेजार करती है, जैसे कोई सल्तनत की महारानी हो और उत्तराधिकारी का इंतजार है बस सत्ता सौंपने के लिए। अगर बच्चे जल्दी कर लिया, तो सबर नहीं था, कुछ सेटल हो जाते तो करना चाहिए था। एक बच्चा हुआ नहीं कि दूसरा का प्रेशर और कहेंगी की बड़का ही छोटका को पाल लेगा, दुनों एक साथे बड़ा हो जाएगा। बेचारी बहु को तो किसी भी परिस्थिति में चैन ही नहीं।
बेटा कैसा भी नालायक, बदतमीज और बदसूरत हो, लेकिन बहू तो सर्वगुणसम्पन्न ही चाहिए और दिखने में तो अप्सरा को भी मात देती हो। बहू के गुणों को दिन भर बैठकर तराजू में तौलना, तो जैसे मनपसंद टाइमपास हो सास नामक प्राणी का।
एक माँ के तौर पर एक नारी गेंदे के फूल सी होती है; ज्ञान, श्रद्धा, वात्सल्य, सबूरी, असीम प्यार, अपनापन से भरी हुयी, कई खुशबुओं को अपनी सत्तहों में संजोई हुयी। गृहस्थी की गाड़ी का एक चक्का नहीं अपितु पूरी की पूरी इंजन ही होती है माँ, रीढ़ की हड्डी होती है, ह्रदय होती है माँ। सालों तक पूरे परिवार के प्यार, मान सम्मान, महत्त्व की एकछत्र स्वामिनी होती है माँ। परिवार की शुरुवात नारी के घर में कदम रखने से होती है। परिवार का मतलब ही नारी होता है। हालांकि मैं ज्यादा फेमिनिस्ट विचारों की नहीं और बड़ाई तो करने की आदत बिलकुल भी नहीं, लेकिन आदर्श परिस्थितियों में ऐसा ही होना चाहिए।
© ठेठ पलामू
नोट- लेखिका के विशेष आग्रह पर हमने उनका नाम नहीं प्रकाशित किया है। इस पोस्ट के जवाब में हमने उनकी सास से सम्पर्क साधा है। सास का जवाब मिलते ही जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा।

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