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हमनी घड़ी स्कूल के नाम का ज्यादे मतलब नहीं रहता था। नामी दुकान वाला कोई बाते नहीं था, बोले तो महंगा अंग्रेज़ी मीडियम या हिंदी मीडियम स्कूल, कुछ नहीं। स्कूल नज़दीक रहना चाहिए बस्स, इससे जादे कोई नाम लिफाफ नहीं। कोई गाड़ी या रिक्सा नहीं लाने ले जाने के लिए, पांव-गाड़ी जिन्दाबाद। आज कल के गार्जियन लोग तो लइका के बुढाने तक उसके आगे-पीछे नाचते रहते हैं। और एक हम लोग थे भर दुपहरिया सउँसे एरिया मखते रहते थे।
हमर मउसी, एगो बियाह में सिर्फ इसलिए नहीं गयी कि "बेटा के यूनिट टेस्ट है, पढ़ाई खराब हो जाएगा"। अब बताइये ABCD और गिनती सीखे वाला बच्चा के का पढ़ाई खराब होता एक हफ्ता में। अब लइका के खेले-खाये के उमर में एग्जाम के प्रेशर देने का क्या जरूरत है? लइका के परसेंटेज आज कल रेपुटेशन के बात हो गया है गार्जियन लोग में।(हमीन त परसेंटेज के माने भी सतवां क्लास में सीखे थे)
हमीन घड़ी मजाल था कि कोई गार्जियन दसवां बोर्ड एग्जाम के पहले ट्यूशन लगावे ला मान जाते (उहो खाली गणित ला ट्यूशन लगता था)। आज कल के नन्हन-नन्हन रेंगन ट्यूशन जाता है। पूछिये कहाँ जा रहे हो बाबू तो कहेगा कि संस्कृत के, त S.St. के। जा रे दुनिया विकास के नाम पर कहाँ से कहाँ पहुंच गया।
आज की तरह हमनी के पास कौनो बढ़िया मार्वल और टेड्डी बेयर वाला फैंसी बैग नहीं था। बल्कि कपड़ा के झोला में शुरुवाती कुछ दिन तक ले के गए, फिर कुछ दिन बाद बस्ता में किताब कॉपी साज के गए, आउ तनिक गार्जियन के भरोसा हो गया कि लइका में टैलेंट है आगे बढ़ेगा पढ़े लिखे के लक्षण है, तो बाद में अल्मुनियम के पेटी किनाया स्कूल जाए ला।
परीक्षा खतम होने के बाद, आपन किताब बेचके और दूसर से अगला क्लास का पुराना किताब ख़रीदे में हमनी के कहियो कोई हिचकिचाहट नहीं होता था। और वैसे भी कौन सा किताब और पाठ्यक्रम साले साल बदलने वाला था। लेकिन भाई, मजा तो आपन पुरान बेशकीमती किताब पे रद्दी अखबार के जिल्द चढ़ावे में आता था, कसम से वार्षिक उत्साह जैसा महौल रहता था।
स्कूल में गुरुजी के हाथ से मार खाने में या स्कूल के बाहर मुर्गा बनने में, या फिर गुरु जी के द्वारा लाल होने तक कान मरोड़े जाने में, हमनी के ईगो कभी आड़े नहीं आया। घर और स्कूल में तो मार खाना हमनी के रूटीन लाइफ का एक सामान्य प्रक्रिया था । बुढ़ पुरनियाँ कहबो करते थे कि "मार खाये से देह बहुत बजड़ होता है"।
आज के लइकन के जइसन हमनी कहियो पॉकेट मनी नहीं मांगते थे। काहे की हमनी के जरूरत भी बहुत छोटे-छोटे रहता था। साल में कहियो मेला-उला में दू-चार बार झिरुआ, निमकी, दलमोट, बरफ खाये ला मिल जाता उहे बहुत होता था। पिज़्ज़ा, बर्गर, रोल, पेस्ट्री आउ सैंडविच के तो नामो नहीं जानते थे हमिन। आज के समय जैसा हर बात के लिए, मां बाप पर आश्रित नहीं रहते थे। छोटा-मोटा जरूरत, तो संयुक्त परिवार में अईसही पूरा हो जाता था।
आप सबों को बाल दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं। ध्यान रखिये कि कहीं प्रतियोगिता के इस दौर में अपने नन्हे मुन्हे को मजबूत बनाने के चक्कर में आप कहीं उसकी बचपन ना छीन लें।

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