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कार्तिक महीना मने व्रत त्यौहार के महीना, ई महीना में कण- कण से पवित्रता और भक्ति के सुगंध आवेला। अमावस के दीवाली, दूतिया के गोधन, फिर चार दिन के महापर्व छठ पूजा जब समाप्त होईल त मन बड़ी उदास हो गईल। लागल अब तो सब परब त्यौहार समाप्त हो गईल अब फिर से ऊहे भागा-दौड़ी सुरु होई। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर सब खुल गेल, एही बीच अक्षय नवमी अर्थात अँवरा पूजा भी मन गइल। ईहे सब सोचत विचारत हली, लेकिन अभी घरे पहुँचलो ना हली कि गितिहारीन के गीत सुनाई देलक....
"कार्तिक मासे नहइली, कार्तिक छठ कइली नू हो,
ए बहिनी कार्तिके में तुलसी बियहली कि संगे शालिकग्राम जी नु हो...."
सुन के मन बड़ी फूला गेल, लोकगीत से अगाध प्रेम जे रहल। पता चलल घर में देवठान पूजा के तैयारी हो रहल बा। आँगन में चौरेठा से चौका पुरावल गेल साथे-साथे खड़ाऊँ, डोली, मड़वा, सिन्होरा, ऐनक, कंघी, मोर, पाँच तरह के अनाज से भरल कोठी, गाय के खुर, बराती के रूप में घर के सब परिवार के जोड़ के खड़ाऊ आउ चप्पल आदि।शुभ प्रतीक के चौरेठा से ही आँगन में गोठल (बनाया) गेल। सब घर के चौखट पर भगवान शालिकग्राम आऊ तुलसी माई के चरण पादुका के चिन्ह उकेरल गेल। ओने गितिहारिन के एकादशी के गीत से सउसे घर सोहावन हो गेल.....
"कइले हई चऊबीसों एकादसी, दोवादसी के पारन कइली न..
अन्हरा के रहिया बतवले हइ भूखा के जेववले हई न...."
माई, चाची, आउ गाँव के औरत सब मिल के तुलसी जी के चुनरी ओढ़ा के सिंदूर, बिंदी, चूड़ी सब से कन्या जइसन सजा देलन। कतारी के मड़वा मड़ई छवा गेल और बड़ी धूम-धाम से तुलसी के बियाह होईल। हलुआ, पूड़ी, बताशा आउ फल-फूल के परसादी बंटाईल।
देवथान यानी कार्तिक एकादशी मनावे के पीछे ई मान्यता बा कि एही दिन भगवान् श्री हरि विष्णु पूरे चार महीना के चिर निद्रा से उठ जा लें और संसार के बागडोर जे शिव जी के सौंपले रहन ऊ संभाले लाग लेन। मने जमघट खत्म आउ सब शुभ मांगलिक कार्य जइसे शादी, बियाह, गृह प्रवेश सब शुरु हो जाला। एह दिन तुलसी बियाह मनावे के पीछे देवी वृन्दा और भगवान विष्णु के एक बड़ी प्रसिद्ध कथा बा जे हम इ आलेख में नइखी कहत...इ कथा रउअन कहुँ कमेंटबॉक्स में आउ साथे-साथे देवथान आउ लोकगीत से जुडल आपन अनुभव भी बताऊँ।
© जया शुक्ला
कैमरा: सुधांशु रंजन


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