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फैशन उहे जे सभे मन भाए, ना कि फाटल चिटल, अजीब कुछू पहन लिए। फैशन सही रहे से कॉन्फिडेंस हाई रहता है, आउ काम में मन लगता है।
फैशन, मने कि सुन्दर और दूसरों से अलग दिखने के लिए अपनाया जाने वाला वेश-भूषा। प्राचीन काल से ही फैशन स्त्रियों और पुरुषों को तत्कालीन चलन के अनुसार आकर्षित करता रहा है, जिसका प्रमाण प्राचीन साहित्य, शिल्प-कलाओं और चित्रों से मिलता है। फैशन हमेशा से बहुत वोलाटाइल चीज रहा है, मने की उड़नछू। आज आप लैटेस्ट फ़ैशन में हैं और कल आउटडेटेड कहलाइयेगा।
जहां पहले का फैशन ज्यादा दिन तक टिकता था। वहीं आज के समय में फैशन तो मानो मौसम से भी तेज बदल जा रहा है। कभी पीछे लंबे बालों का संजय दत्त वाला फैशन आएगा, तो कभी बीच मांग में तेरे नाम वाला, तो कभी फैशन में बाल पूरा सफाचट भी हो जाता है। कभी टाइट पैंट, तो कभी पैंट ढीला हो जाता है, तो कभी फैशन में पैंट फट भी जाता है। इसी तरह आभूषण जहां औरतें सजने संवरने के लिए प्रयोग करती थीं, तो आज के समय में लड़का लोग भी खूब कान-भौह छिदवा रहा है। फैशन का आगाज सबसे पहले फिल्मों, खिलाड़ियों या अन्य सेलिब्रिटियों के द्वारा ही होता है और फिर उनकी नकल करने के लिए तो हमारे 'अभिषेक और ऐश्वर्या' हर गली में भरे ही पड़े हैं। बिना सोचे समझे कि उनके अनुरूप वह फैशन है भी या नहीं, और वे हंसी के पात्र भी बन जाते हैं।
अब कुछ रेट्रो फैशन की बात करते हैं, जो पिछले कुछ दशकों में प्रचलित रहे और फिर जैसे एकदम से गायब ही हो गए।
बालों को तरह-तरह से सवारना फैशन का प्रमुख पार्ट रहा है, पुरुषों और स्त्रियों दोनों में।साठ के दशक में बालों का फैशन 'देवानन्द' और 'साधना' से प्रभावित था। पुरुष अपने बालों को झाड़ कर दो-तीन लहरनुमा जुल्फी बना लेते थे, तो वहीं स्त्रियां कुछ बाल ललाट पर लटका देती थी, जिसे 'साधना-कट' कहा जाता था। कहा जाता है कि साधना की ललाट थोड़ी ज्यादा चौड़ी थी, जो उसकी सुंदरता को कम कर देती थी। इस कमी को छुपाने के लिए ही उसने कुछ बालों को ललाट पर लटकाने के लिए इस फैशन को अपनाया था। पर फैशन के नकलचियों को यह कहाँ पता थी। फिर तो वो औरतें भी इस फैशन की दीवानी हो गईं, जिनकी ललाट कम चौड़ी थी, और उन पर यह फबता भी नहीं था।
बाद में देवानंद की ही एक फ़िल्म आयी "हरे राम, हरे कृष्ण" जिसकी हीरोइन 'जीनत अमान' थी। उस फिल्म में कुछ नशेबाज मनमौजी युवकों को दिखाया गया था जिनके बाल काफी लंबे थे और उन्हें 'हिप्पी' कहा जाता था। फिर तो युवको में लंबे बाल रखने का जुनून सा सवार हो गया, जिसे 'हिप्पी-कट' कहा जाता था। फिर टी.वी. का दौर आया, वर्ल्डकप फुटबॉल मैच, क्रिकेट का लाइव प्रसारण शुरू हुआ। लोग अपने अपने पसंदीदा खिलाड़ियों के बालों को फैशन के रूप में अपनाने लगे और तरह-तरह के बालों का फैशन चल पड़ा। इसमें माराडोना और धोनी वाला स्टाइल कुछ ज्यादा ही हिट रहा। कुछ दिन तो आमिर खान की फ़िल्म गजनी के बालों का फैशन भी खूब चला। बड़ा ही अजीब था वो फैशन, देख कर लगता था जैसे अभी-अभी अपनी खोपड़ी वापस सिलवा कर आ रहा है लड़का।
अब पैंट की बात करें, तो साठ के दशक में फिल्मों के हीरो जो फुलपैंट पहनते थे, वो जरा ढीला-ढाला और ऊपर से नीचे तक समान चौड़ाई की होती थी, जिसे पतलून कहा जाता था। उसका निचला हिस्सा डेढ़-दो इंच मुड़ा होता था। धीरे-धीरे इसमें भी परिवर्तन आता गया। सबसे पहले नीचे का फोल्ड हटा और फिर धीरे-धीरे निचले हिस्से की चौड़ाई कम होती चली गयी, जिसे 'मोहरी' कहा जाने लगा।इसकी चौड़ाई 11-12 इंच तक आ गई थी, बोले तो पूरी तरह टाइट पैंट बन गया, जिसे 'ड्रेन पाइप पैंट' के नाम से जाना गया। इसे पहनना और खोलना किसी कसरत से कम नहीं था, ऐसा लगता था मानो अपनी पैर की चमड़ी उतार रहे हों। साथ ही उसे पहनने के बाद उठना-बैठना भी भारी मुश्किल का काम था। अब इस मुश्किलात को कम करने के लिए नीचे की मोहरी को चौड़ा करने की शुरुआत हुई और यह बढ़ता ही गया, बढ़ता ही गया और रुका तब, जब चौड़ाई 30-35 इंच तक पहुंच गई। यह 'बेल-बॉटम' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 70 और 80 के दशक के सारे फिल्मों में हीरो को इसी पैंट में देखा जा सकता है। 90 के दशक में मोहरी फिर से कम होने लगी और 17-18 इंच पर पहुंच गयी। अभी तक तो ये सभी पैंट नार्मल कपड़ों से बने होते थे, फिर आया दौर जीन्स का, जिसके डिज़ाइन बदलते रहे और अंत में बात हमारे प्यारे फटे जीन्स तक पहुंच गई।
शर्ट का फैशन भी कम रोचक नहीं रहा है अभी तक। शर्ट के फैशन में मुख्य रूप से कॉलर और पॉकेट के डिज़ाइन तो हमेशा बदलते ही रहे। कॉलर कभी लंबा, तो कभी छोटा, तो कभी पान के पत्ते जैसा डिजाइन में होता रहा। कॉलर में एक समय 'बॉबी कॉलर' खूब प्रचलन में था, जो 'राजकपूर' की फ़िल्म 'बॉबी' से शुरू हुई थी। कपड़ों की डिज़ाइन भी शर्ट के फैशन पर प्रभावी रहा, जैसे कभी छोटे, तो कभी बड़े चेक, कभी धारीदार, तो कभी प्रिंटेड कपड़े, तो कभी प्लेन। लेकिन सबसे प्रसिद्ध फ़ैशन तो हमारे पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना ने शुरू किया था। अपने दाएं हाँथ की ऐब को छुपाने के लिए वो ढीला कुर्ता पहनते थे, साथ ही नीचे पैंट। फिर क्या था युवाओं में पैंट के ऊपर कुर्ता पहनने का फैशन बहुत दिनों तक रहा।
फैशन के बारे में बस यही कह सकता हूँ कि कोई भी फैशन स्थायी नहीं होता और समय, स्थान, मौसम, प्रोफेशन की प्रकृति इत्यादि से प्रभावित होते रहता है। इसके पीछे बहुत माथापच्ची करने, बहुत पैसे उड़ाने और अधिक भागने की जरूरत नहीं है। खासकर कुछ बच्चे बिना सोचे समझे फैशन के पीछे दीवाने हो जाते हैं, गार्जियन लोगों की आर्थिक स्थिति की अनदेखी कर उन्हें परेशान करते हैं, जो उचित नहीं है। हमें उसी फैशन को अपनाना चाहिए जो अनुकूल, आरामदायक और आर्थिक स्थिति के अनुरूप हो।
"Be comfortable & look beautiful."
Article © Sunny Shukla
Picture © Shivangi Shaily

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