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आज हर शहर, हर गांव और हर घर मे गैस का इस्तेमाल होता है। पर हमारे घर की छत पर चूल्हा भी बना हुआ था। हर सर्दी हम बहन भाई दोपहर को चूल्हे पास माँ के हाथों की बनी रोटी खाते थे। गर्मा गरम रोटियां खाने मेँ बड़ा मजा आता था। अब ना माँ है ना वो चूल्हा। हमारा बचपन अनमोल था।
हम ही नहीं इस पीढ़ी के बहुत से लोगों ने उस दौर को देखा होगा जब लकड़ी के चूल्हे का प्रचलन था, मांएं खाना बनाती थीं और बच्चे वहीं बैठकर आग की गर्माहट और माँ का सानिध्य पाते थे। तब की माएं सबकुछ हाथ से करने के बावजूद बहुत फुर्सत में होती थीं, हो भी क्यों न तब मोबाइल का दौर जो नहीं था! फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम का बुखार नहीं था! सिलबट्टे पर मसाला पिसना, खुद बर्तन धोना, बिना कूकर के सब्जी, दाल बनाना, यहाँ तक की गेहूं, चावल वगैरह भी जांते में पिसने का चलन था तब जाकर गृहणियां खाना बनाती थीं, वो भी लकड़ी या गोएंठे पर। कुछ महिलाएं बाद में भूसी चूल्हे और मिट्टी तेल वाले स्टोव का प्रयोग करने लगीं जिसे जलाना भी सबके वश की बात नहीं थी। पिन मारकर, माचिस लगाकर तब पंप मारने के बाद स्टोव जलता था, घर्र घर्र की आवाज के साथ। इंतज़ार रहता कि कब ये बंद होगा और शांति होगी। अगर आपने मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना बनाने या माताओं को बनाते हुए देखा होगा तो जरूर ही उस आग में कभी आलू, शकरकंद और बादाम भी पकाया होगा। उस स्वाद के आगे सारे स्वाद फीके हैं। खासकर आग में भूनकर पकाए हुए आलू का स्वाद काफी बेजोड़ हुआ करता था, हो भी क्यों न तब बिना खाद वाले आलू मिलते थे जो स्वाद से भरपूर होते थे। उसी चूल्हे पर हमारी माताएं हमें पढ़ाई के साथ साथ पाककला में दक्ष बनाने की ट्रेनिंग भी देती थीं!
रोटी बनाते समय अंत में आटे की एक लोई यह कहकर छोड़ दी जाती थी कि इसे टेढ़ा मेढ़ा, कच्चा पक्का कैसे भी बनाओ, इसे तुम्हें ही खाना है! तब तो मन में चाइलेंज की भावना आ जाती थी और हम अपनी पूरी मेहनत झोंक दिया करते थे कि कैसे भी रोटी अच्छी ही बनाना है। उस दौर में अपने घर में ही आग जलाना कोई जरूरी नहीं था अगल बगल से भी रसम मांगने की परंपरा थी और इसी बहाने पड़ोसियों के हालचाल, सुख दुःख भी हम पता कर लिया करते थे। अभी जैसा अपार्टमेंट कल्चर नहीं था कि बगल में कौन रहता है मालूम ही नहीं, सुख दुःख में शामिल होना तो दूर की बात है। मतलब आपसी सौहार्द बनाये रखने में भी लकड़ी के चूल्हे ने अहम भूमिका निभाई! बस धूएं से महिलाओं की आंखों पर असर, आंखों से पानी आना, सांस की दिक्कत, सिरदर्द वगैरह की समस्या होना मात्र ही उस चूल्हे का माइनस प्वाइंट था ।
लकड़ी के चूल्हे के खात्मे के साथ ही खत्म हो गया बर्तन में ’ लेवकन ' (बर्तन को काला होने से बचाने के लिए मिट्टी और राख का लेप ) लगाने का रिवाज । ' लेवकन ' लगाने की कला भी सबके वश की बात नहीं थी, हमने भी महीनों बाद इसमें निपुणता पाई थी । अच्छे से अगर बर्तन में लेवकन न लगा हो तो उस बर्तन को धोते समय नानी याद आती थी। कालिख से हाथ काले पड़ जाते और बर्तन की चमक भी फीकी पड़ जाती। उस दौर में महिलाओं के पास धैर्य भी बहुत था! अभी तो जल्दी से तीन चार सिटी लगाए और दाल तैयार! तब ऐसा नहीं था। धीमी आंच पर धीरे धीरे दाल गलती थी काफी देर में। जाड़े के मौसम में टमाटर डालकर ' कुलथी ' का दाल लगभग हर घर में बनता, घी का छौंक लगाकर। मान्यता यह थी कि कुलथी का दाल खाने से पेट कि पथरी गल जाती है और पाचन शक्ति दुरूस्त बनी रहती है। चना साग भी धीमी आंच पर धीरे धीरे पकता जिसका स्वाद ही अनूठा हुआ करता था, अब तो चने की साग भी कूकर में सीटियां लगाकर पकाई जाती हैं । लकड़ी के चूल्हे पर बनी सोंधी रोटियां आज भी मिल जाएं तो बड़े बड़े होटलों में बने नान, तंदुरी रोटी, कुलचा और पिज्जा की छुट्टी समझिए।
आप सब भी मिट्टी के चूल्हे पर बने भोजन के स्वाद और बनाने के अपने अनुभव यहां साझा करके एकबार पुराने दौर में चले जाएं। आपके अनुभव हमें काफी आनंदित करेंगे उम्मीद है।
© शर्मिला शुमि

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