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जाड़ा आ गया है, हाथ से बीनल ऊन का नया स्वेटर पहनने के लिए कितना उत्साहित रहता था लइकन सब बचपन में। माई तो बनाती ही थी, मौसी और फुआ लोग भी भेज देती थी, आपन हाथ से स्वेटर बुन के। स्वेटर में नेह सान के जैसे अपनापन के गर्माहट में लपेट देता था। अनकहा नियम था कि बनाने में भूल चूक से छोट बड़ हो जाए, तो जेकर फिटिंग के बन जायेगा, ओकरे गिफ्ट् मिल जायेगा। अब ओतना मेहनत से सुन्दर डिजाइन बनावल तनी बेसाइजो हो जाने पर अफसोस तो लगता ही होगा, लेकिन रिश्ता में मिठास बनल रह जाता था।
पलामू में दिवाली बाद, मने छठ आवत आवत तक ला तो जाड़ा लगहीं लगता है। सब के अलमारी आऊ ट्रँक से कम्बल, रजाई, सूटर निकल के छत पे पसारल मिलता है, लेकिन ई जाड़ा के जुगाड़ तुरंते नही, कुछ महीना पहिलहीं से ईस्टाट हो जाता है। गांव में फेरी वाला साइकल पर रंगबिरंगा ऊन के लच्छा लेके सप्ताह में तीन चार बार घुमत दिख जाता था। अब न लेदर के जैकेट आऊ डिजाइन वाला हुडी आ गया है, पहले ऊन का अलग ही डिमांड चलता था, गांव के महिला समाज एकदम लुझल रहती ऊन लेने के लिए। केकरो एक किलो तो केकरों डेढ़ किलो। ऊन आऊ कांटा लेने के बाद तो मने हर घरी हाथ में उहे नज़र आता। ऊ लोग के खाना बनईते केकराे से बतीयईते उंगली तेज़ी से दौड़ते रहता था।
मल्टीकलर डिजाइन के आलावा गर्म भी रखता था सूटर, आऊ चलता भी बहुत था। बाप रे बाप इगो सूटर याद है, पांचवा कलास में मम्मी बना के दी थी दसवां कलास तक चला था। ऊन के बुनावट शरीर के हिसाब से फ़ैलियो जाता है, साइज एडजस्ट हो जाता था। वैसे तो माई लोग के आदते है, तनी बढ़न बनाना लेकिन उसका साइज भी खतरनाके एडजस्ट करता था, एक एक साल बाद एक एक इंच बढ़ जाता था जइसे। कोई कोई चाचा लोग का सूटर तो दसों साल पुराना होता है और बड़ा शौख से पहिनते हैं।
बड़का भाई के कपड़ा छोट हो जाने पर छोटका भाई को गिफ्ट वाउचर मिलता है, ई तो सब घर के कहानी है लेकिन मज़ा तब आता था, जब बड़का भाई ला नया सूटर बिनाता था और गलती से तनी छोट बन जाता था। मने एक साथ दू गो सूटर! अइसन खुशी लगता था जैसे जाड़ा में छठी मईया छोटके पे मेहरबान हो। क्लास के लाइकन में कंपटीशन भी रहता था कि केकर सूटर जादे बढ़िया है। स्कूल यूनिफार्म का मशीन से बिनाया स्वेटर ज्यादा से ज्यादा तीन चार साल चलता, वही घर में बिनाया स्वेटर ज्यादे गब्स भी रहता था और कभी भी कन्धा, गर्दन के पास से उसका रंग भी उड़ जाता था।
अब तो खैर लेदर जैकेट, ब्लेजर, कोट के भीड़ में बड़ी मुश्किल से देखेला मिलता है ऊन के बिनल सूटर। पहले के महिलाओं का हस्तकला का जरूरी मापदंड सिलाई और बुनाई ही होता था, इसीलिये ये आम बात थी। 1962 के युद्ध काल में बर्फीले बॉर्डर पर तैनात ऊँचे कद-काठी के जवान सिपाहियों को हाथ से बिनल स्वेटर भेजने के लिए हमारे माँ, मौसी, चाचीयों के स्कूल टाइम में होड़ मची रहती थी, इसीलिये सब के सब दक्ष होती थी। बुतरू लोग को नानुकुर करने पर इ सब कहानी डेढ़ पसली छाती चौड़ी करने हेतु सुनाई जाती थी।
जैसे जैसे लोहे कि सलाईयों पर जादुयी उंगलियां चलने लगती, प्रेम की परिभाषा और सुदृढ़ होती जाती। विदेशों में सूटर बुनना किसी जेंडर विशेष की बपौती नहीं होती, बल्कि एक कला है, कौशल है। अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में हाथ से बुने स्वेटर की अपनी विशिष्ट जगह है जो अलग अलग रूप, रंग और डिज़ाइन में साल दर साल वापस आते रहता है।
चलिए अब अस्कताइये मत, अपने बचपन के एकदम पसंदीदा सूटर के कलर और डिजाइन माने फूल था की हॉफ, कॉलर वाला की 'भी' गला वाला था, कॉमेंट कर के बताइए और नॉस्टलजिया में डुबकी लगा आईये एहई बहाने|
© बालेन्दु शेखर एवं शिवांगी शैली

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