Thursday, December 1, 2022

डालटनगंज के मारवाड़ी पुस्तकालय आए थे राजेंद्र बाबू

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'पूज्य महात्मा गांधी जी के साथ मैंने भी पुस्तकालय को देखा और देखकर बहुत ही आनन्द पाया। इस प्रकार के पुस्तकालयों से जनता को बहुत लाभ पहुंचता है और मेरी आशा है कि संचालक इसे स्थायी बनावेंगे और इसकी प्रति दिन उन्नति होती जायगी।' ये संदेश देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हैं। वे 11 जनवरी 1927 को डालटनगंज (अब मेदिनीनगर) के मारवाड़ी सार्वजिक हिंदी पुस्तकालय में आए थे। देशरत्न राजेंद्र बाबू के ये शब्द यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि उन्हें पुस्तकों से कितना लगाव था। संभवतः यह राजेंद्र बाबू की इस शहर की पहली यात्रा थी।
इसके बाद इस शहर से राजेंद्र बाबू का अटूट संबंध बनते चला गया। स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य रहे यदुवंश सहाय 'यदु बाबू' का तो पूरा परिवार ही उनसे काफी प्रभावित था। यदु बाबू के छोटे भाई उमेश्वरी चरण 'लल्लू बाबू' (डालटनगंज से 1957 के विधायक) ने तो उनके कहने पर पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। 1989 में जब डालटनगंज में राजेंद्र बाबू की मूर्ति लगी तो तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण इसका उद्घाटन करने आए थे। उनके भाषण का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद यदु बाबू के सबसे छोटे भाई मदन कृष्ण वर्मा ने किया था। छहमुहान पर लगी मूर्ति की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
आजादी की लड़ाई के दौरान किसानों की सभा में भाग लेने के लिए राजेंद्र बाबू डालटनगंज आए थे और यदु बाबू के घर रूके थे। यदु बाबू के पुत्र बृजनंदन सहाय 'मोहन बाबू' बताते हैं कि जिस मैदान में सभा होनी थी वहां बड़ी संख्या में किसान जुटे थे। इसी बीच राजेंद्र बाबू का दमा (सांस की बीमारी) उभर गया। मीटिंग तो नहीं हो सकी पर राजेंद्र बाबू ने किसानों से भेंट की। यहीं उनका इलाज हुआ। जो दवाएं वे लेते थे वह तो उन्हें दी ही गईं साथ ही देसी इलाज भी हुआ। यदु बाबू के घर बिनाई राम जी काम करते थे। उन्होंने राजेंद्र बाबू को लहसुन पका हुआ तेल लगाया जिससे उन्हें काफी आराम मिला। तेल लगाने के दौरान एक दिलचस्प वाकया हुआ। बिनाई राम जी ने राजेंद्र बाबू से पलामू की बोली में पूछा, 'रऊआ का करिला, हुजुर। केतना बाल-बच्चा बड़न। घर कईसे चलला।' घर चलाने का सवाल कई बार पूछे जाने पर भी राजेंद्र बाबू चुप रहे। इसके बाद बिनाई राम जी ने कहा, 'बूझ गईली, जईसे हमार बाबू के घर चलला ओहिंसही राऊरो घर चलत होखी। दूनो जना देश के आजादी दिलावे में लागल ही।'
राजेंद्र बाबू के प्रति उमेश्वरी चरण 'लल्लू बाबू' के मन में कितना सम्मान था, यह उनकी डायरी से देखा जा सकता है। 30 अक्तूबर 1945 को गया में लिखते हैं, 'आज का अधिकाश वक्त राजेंद्र बाबू के स्वागत में बीता। कितना बीमार हैं और प्रांत भर का दौरा कर रहे हैं। हमलोगों को भी इससे उत्साह मिलता है।'
मेदिनीनगर में आज भी राजेंद्र बाबू के आशा के अनुरूप मारवाड़ी पुस्तकालय चल रहा है। यदु बाबू के घर से निकल कर आपकी यादें पूरे शहर में फैल रही हैं। आपको आपकी 138वीं जयंती पर सादर नमन।
© प्रभात सुमन

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