बचपन मे समझ में ही नहीं आता था कि बड़ा दिन माने क्या? दिन बहुत बड़हन होता होगा इसीलिए क्या? लेकिन दिनवा तो तुरंत भाग जाता जाता है, कइसन बड़ा दिन है ये? बाद में बाबूजी ने बताया कि दिन बड़ा होने की शुरुवात होने लगती है, तब जा कर उलझन कुछ कम हुई।
घर के बगल में एक मिशन हॉस्पिटल था - "तुम्बागड़ा नवजीवन"। हम बहाना खोज-खोज के जाते थे, काहे की वहाँ पर पढने के लिए ढेरों किताब मिलता था यीशु मसीह, चरवाहों, जेरुसलेम, पवित्र तारों और ऐसी ही रोचक घटनाओं का खूबसूरत व्याख्यान। साथ में विदेशी नाम और स्थान का जिक्र, समुद्री यात्रा और रेगिस्तान का जिक्र, परिकथा की तरह बाल मन कल्पना लोक में पहुँच जाता था।
मेरी छोटकी बहन आबादगंज वाले मिशन स्कूल में पढ़ती थी। उसके अनुभव क्रिसमस को लेकर थोड़े अलग थे। जितना हंगामा होली दशहरा में नहीं होता था, उससे ज्यादा बड़ा दिन पर स्कूल औऱ सिस्टर लोग के कान्वेंट में तैयारी होती थी। केक बनने, बेकिंग की खुशबू कई दिनों पहले से खिड़की से तैर सुबह की सभा में यीशु का गुणगान करते चेहरों तक पहुँच जाती थी। पेड़किया को डंपलिंग बोल उसमें नारियल का बुरादा, खोवा, मेवा भरके बनाया जाता था। निमकी, खाजा तो देशी प्रभाव में आ कर सिस्टर लोग बनाने लगी थीं। ई सब भले बच्चों को नहीं मिलता था, सिर्फ उन अतिथियों के लिए होता था, जो सिस्टर लोग को बधाई देने 25 को कान्वेंट पहुँच जाते थे। मैं भी कौतुहल में एकाध बार अपने चाचा संग लटक के गया था, इसीलिये इतना डिटेल पता था। VIP गेस्ट होने के भी अलग फायदे हैं, जबरदस्त सुन्दर झांकी देखने को मिला, ए ग्रेड अतिथि वाला ट्रीटमेंट हुआ सो अलग। स्कूल बंद होने से पहले एक दिन 19-22 दिसंबर के बीच में बच्चों का सेलिब्रेशन होता था। किसी मोटे बच्चे को रुई वाला दाढ़ी मूंछ लगा के लाल कोट पैंट और टोपी पहना, 'संताबाबा' बना दिया जाता था, हर बच्चे से 5-10 रुपया उगाही कर कॉपी, पेंसिल, साबुन टाइप गिफ्ट् खरीद के चिमचीमिया में लपेट, संता बाबा झोला ले के पक्कल दाढ़ी पर हाथ फिराते बच्चा लोग को बाँट देते थे। मेरी छोटकी बहन बहुत लाजवंती थी लेकिन उसको भी दो तीन बार संताबाबा बनाया गया था, ऊ तो घाँस पट्टी में पक्कल दाढ़ी मूंछ खरीदने के लिए गयी, कितना परेशानी हुआ खोजने में, ई बताते हुए बोल गयी तो हम पकड़ लिए।
ग्रीटिंग कार्ड बनाने, खरीदने और बांटने का जबरदस्त प्रचलन था। एकदम अमला टोली का बाजार तो जगमगा जाता था नया साल औऱ क्रिसमस् का कार्ड से, उस समय मोबाइल था नहीं और चिट्ठी पत्री का ज़माना ही था। फूल, पट्टी, प्राकृतिक दृश्य वाले ग्रीटिंग कार्ड ज्यादा चलते थे। कागज़ को मोड़ पॉप अप कार्ड थोड़ा महंगे पड़ते लेकिन उनका भी फैशन था। अंदर में खूब कलात्मक डायलॉग मारते थे हमलोग औऱ कुछ तुकबंदी भी -
"यह कार्ड खोलना तुम हंसते-हंसते
मेरे खास दोस्त को नए साल की बधाई और नमस्ते."
"लिफाफा खोलिये मगर प्यार से! "
"नया साल, नया दौर,
मुबारक हो आपको नये मौसम का नया बौर "
डिजिटल युग के दौर में वो मासूमियत शायद अब खो गयीं है। सब कुछ इतना सुलभ और फैंसी हो गया है कि इसके महत्त्व का पता ही नहीं चलता है, तो गाजर का हलवा, प्लम केक खाइये और आपके अनुभव बड़ा दिन को लेकर क्या हैं, लिख मारिये। ठीक है ना !!!
© ठेठ पलामू

No comments:
Post a Comment