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जब सर्द मौसम में हवा में नमी घटने लगे और कनकनी बढ़ के दिन भर साल-सुटर ओढ़ने पर मजबूर कर दे, तो समझ जाइए कि पौस महीने का आहट सुनाई देने लगी है। सुरुज भगवान का जैसे-जैसे उत्तरायण में जाने का समय नज़दीक आने लगता है, वैसे-वैसे धूप में बइठ कर सुस्ताने का आनंद और खटिया में बइठ के खाने का मज़ा दुनों दुगुना हो जाता है ।
पिट्ठा आजकल मिक्सी सब के चलते घर पे झटपट बन जाता है। इसको पकाने में उतना समय नहीं लगता जितना की तैयारी करने में। पहिले तो जांता(चकरी) में चावल पीस के बनता था, पर अब आजकल कौन इतना धोना-पीसना करता है। समय के साथ सब चीज़ शॉर्टकट हो गया, तो उसमें पिट्ठा भी नहीं बचा। अब बहुत लोग जल्दी के लिए सूजी(रवा) से बना लेते है, पर हाँ अंदर का भरावन में कोई समझौता मंज़ूर नहीं है हमको। चना-दाल और मसाला भर के जो स्वाद आता है न, उसका बात ही कुछ और है !!!
'पुसपिट्ठा' या सिर्फ़ 'पिट्ठा' कह लीजिए एक्के बात है। चूँकि ये पूस(पौष) के मौसम में ख़ासकर के अधिक बनता है, इसलिए समय के साथ उसके आगे इसका नाम जुड़ गया।
अच्छा ये तो बात दाल-चावल वाले पिट्ठा का हुआ, लेकिन जैसी विविधता हमारे संस्कृति के हरेक अंश में है , वैसी ही वेराइटी पिट्ठा में भी देखने को मिलता है। कुछ लोग गोल बनाते है, तो कुछ गुझिया-पेड़किया के जैसा या मॉडर्न स्टाइल में बोले तो डंपलिंग के आकार का।
पिट्ठा बहुत लोग गुड़-नारियल का भरावन डालते हैं, तो कुछ लोग दूध में पकाकर मीठा खीर के जैसा बनाते है। पिट्ठा सिर्फ़ झारखंड-बिहार ही नहीं पूरे पूर्वी भारत यहाँ तक की बांग्लादेश में भी खूब प्रसिद्ध है। मेरे ओड़िया मित्र के चलते कई बार ओड़िसा का 'अरिसा-पिट्ठा' खाने को मिला। यहाँ तक की भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद भोग में भी प्रतिदिन पिट्ठा चढ़ाया जाता है। असमिया बंगाली लोग भी इसको अपने तरीक़े से बनाते हैं।
तो आप भी आलस छोड़िए, रजाई से निकलिए और बनाइए अपने घर पर पुसपिट्ठा और कोई बच्चा खाने में नखरा करे तो बोलिये की देसी मोमोज है। दावा है पूरा परिवार दबा कर खायेगा। ना तलना ना भूँजना, बस भाप में सिझा के पका देना है। इसीलिए ये पेट पर भारी भी नहीं होता और स्वाद में भी बेमिसाल है। अब इससे आसान और सेहतमंत और क्या होगा। बस साथ में कड़ू तेल-नमक और धनिया-पत्ता का चटनी जरूर ले लीजिएगा, फिर बैठ कर लेते रहिए पुसपिट्ठा का मज़ा पूरे परिवार के साथ।
© अनुज

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