यदि आप गाँव में रहे हैं, तो बोरसी शब्द से आप जरूर परिचित होंगे और संभवतः इसका आनंद भी उठाए होंगे। किसी घर की कामकाजी महिला, जो दिन रात घर वालों की सेवा में लगी रहती है और जब उसकी किसी इच्छा की पूर्ति नहीं होती है, तो उसे शायद यह कहते हुए भी सुना होगा "हमर परवाह केकरो नइखे। खाली हम सबके बोरसी भरे ला ही।" जब कभी कोई महिला किसी से नाराज होती है और उसे मनाने या कुछ देने की बात हो, तो गुस्से में कहती है कि " हो, ओकर हम बोरसी नई भरब, ओकरा हम मनावे जात ही?"
कभी आपके घर की बूढ़ी दादी या काकी ने आपसे जाड़े में बोरसी भर देने की विनती भी की होगी।
यह बोरसी ग्रामीण जिंदगी में काफी महत्व वाला रहा है। बोरसी वास्तव में कम ईंधन में अधिक देर तक गर्मी देने वाला पात्र या अंगीठी है, जो विशेष रूप से वृद्धों के लिए जाड़े में वरदान है। यह एक मिट्टी की पकी हुई या कच्ची कड़ाही होती है, जिसमें जाड़े में सुलभ 'धान की भूसी' का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। शाम को इस कड़ाही में पूरी तरह धान की भूसी को भर दिया जाता है और फिर उस पर जलती चिपरी(उपला) का एक टुकड़ा रख दिया जाता है। कुछ समय तक काफी धुंआं निकलता है और धीरे धीरे बोरसी सुलग जाता है और धुआँ समाप्त हो जाता है। फिर अक्सर वृद्ध महिला इसे अपने पास रख कर बैठ जाती है और धीरे-धीरे हाथ पांव सेंकते रहती है। रात को इस बोरसी को कभी कभी खटिया के नीचे भी रख दिया जाता है, जिससे सोने वाले को नीचे से गर्मी मिलते रहती है।
इस बोरसी की विशेषता है कि इससे कभी आग की लपटें नहीं निकलती और न एक बार जल जाने के बाद धुंआं ही निकलता है। इसकी आग 15-20 घंटे तक जलती रहती है, केवल ताप कम होता जाता है। जब जाड़े में दिन को धूप नहीं होता, तो दिन भर बोरसी का आनंद लिया जा सकता है। बच्चे तो इस बोरसी का मजा कई प्रकार से लेते हैं। दादी के पास बैठ कर उनकी मजेदार बातें या कहानी तो सुनते ही हैं, साथ ही उस बोरसी में सेम या आलू या शकरकंद घुसेड़ कर पकाते हैं और निकाल निकाल कर खाते जाते हैं।बोरसी का इस प्रकार पकाये गए आलू या शकरकंद के स्वाद का क्या कहना!!!
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