Monday, December 19, 2022

" ठाट "

 

    पहिले खपड़ा वाला घर के छप्पर छवात रहे, ओकरा हमनी "ठाट" करेला कहअ हली। उभी का समय रहे, बिना पईसा     के पुरे घर के एक दिन में ठाट हो जात रहे।

ठाट करे के एक दिन पहिले शामे में पुरे गांव में घर-घर जा कहल जात रहे कि ठाट करे के अज्ञा हवा भाई। दुसर दिन पुरे गांव के लोग आ जइतन, आऊ शुरू हो जाइत ठाट।
बढ़ बुढ़ छप्पर पर चढ़ जइतन, कुछ नीचे रहतन। ऊपर से हाला करतन चोप....,चोप...., बाती...., बाती...., त फिर कहतन बीड़ के चोप, बीड़ के बाती। गार्जियन लोग बांस बाती धरवतन आऊ हमनी लइका सब के चोप धरावे वोला काम रहे। बांस मे चोप लगा-लगा के दउड़- दउड़ के धरवती। सबसे नीचे मोहबत बन्हात रहे, त हाला हाईत की मोहबत के बाती..., मोहबत के बाती..., मोहबत के चोप, त उहे मुताबिक हमनी समान धरवती।

सब अलग-अलग मांग होत रहे, एह से की अलग नाप रहे।
एक दिन पहिलही जमीन में गड़हा खान के पानी भर देतन, उहे में चोप डला जाईत, रात में फुलल रहित, आऊ ऊहे में से निकाल-निकाल के देल जात रहे।

बीच में रावा गुड़ के शरबत डुभा (बड़ा कटोरा) में मिलत रहे। शरबत बनावे ओला के अलगे डीउटी रहत रहे।
दुपहर में सातु प्याज खएला मिलत रहे। एकर तइयारी अगल बगल के चाची लोग के हांथ में रहत रहे।
उ दुपहरिया में हंसी खुशी से "ठाट" के काम पुरा हो जाइत, पता भी ना चलित।
शाम के सब कोई के खातिर दाल भात आऊ एकाध गो सब्जी बनित। सभे कोई पंगत में बईठ के खाना खईतन आऊ आपन-आपन घरे जइतन।
© दधिबल मेहता
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