Sunday, December 18, 2022

जाड़े में कउवा स्नान



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बात जाड़े के दिन की हो और स्नान करने पर बात न की जाय, तो एकबारगी अन्याय होगा उनपर जो सुबह-सुबह स्नान करके अपने दोनों केहुनियों को सीने से चिपकाये हथेलियों में घर्षण से उष्मा का संचार करते काफी फुर्सत में नज़र आते हैं और दूसरा उनपर जो एकाद अठवरिया में (साप्ताहिक) कौवा स्नान कर के कुम्भ स्नान का अनुभव करते है।
अठवरिया स्नान से याद आया जब मै तीसरी कक्षा में था, उन दिनों अपने विद्यालय में बिना स्नान किये जाना भी दंडनीय था। ठंडी के दिनों में सुबह-सुबह स्नान करना वो भी कुएं से पानी से बड़ी कष्टदायक था। हम तीन भाई-बहनों का विद्यालय भी एक ही था। इसकी मुख्य वजह थी बड़ी और समझदार बहन का सानिध्य तथा निगरानी में दो अनुज हमेशा रहे और गार्जियन टेंशन फ्री रहे। इसका दूसरा पहलु भी था, एक ही घर के दो बच्चों के मासिक फ़ीस पर तीसरे बच्चे का फ़ीस माफ़। विद्यालय के आचार्य जी प्रार्थना के पश्चात ही सभी विद्यार्थीयों का यूनिफार्म और साथ में शारीरिक साफ़-सफ़ाई की जाँच बारीकी से करते थे और जो छात्र-छात्राएं उनकी परिपाटी में फिट नही होते, दण्डित किये जाते।
मेरी दीदी ने ठंडी के दिनों में हमें नहाने से बचाने और आचार्य जी के दंड से ईजात पाने का संयुक्त उपाय ढूंढ लिया था। अब हम तीनों भाई-बहनों की न सिर्फ अच्छी कट रही थी बल्कि वर्ग में आचार्य जी हम तीनों की प्रशंसा भी कर रहे थे। दूसरे बिन स्नान किये विद्यार्थियों को हमारी तरफ दिखा के बोलते - देखो इनलोग ठण्ड में भी रोज स्नान कर के आता है और तुमलोग…… ऐसा लगता है जैसे लेदरा (कम्बल) हटा के सीधा बस्ता टांग लिए होगे; सबसे ज़्यादा पाला तुमलोग पर ही पड़ रहा है…. आएं..... तनी लानो तो डंटवा जी..... कातो ढ़ेर पाला इन्हीं लोग पर गिर रहा है.....
और फिर उनकी उतनी धुनाई हो जाती थी कि उनके शरीर से उष्मा का संचार होने लगता था।
खैर…. ज्यादा दिन हमलोग का चालाकी भी नहीं चल सका। दीदी की सहेली जो की पड़ोस की ही थी बोली-
‘ आएं जी तुमलोग तो कभी कुएं पर दिखाई ही नहीं देते, कब स्नान कर लेते हो ? ’
‘ अरे दीदी हमलोग आंगन में न पानी ले जा कर नहाते है ‘ ऐसा कहते वक़्त मेरा आत्मविश्वास चरम पर था।
‘ अच्छा…! ‘ उन्होंने मेरे कथन पर विस्मय प्रगट की ।
और एक दिन वे विद्यालय जाने से पूर्व हमलोग के घर, आंगन में आ गई। फिर क्या… ..
उन्होंने देखा हम तीनों भाई बहन, यूनिफार्म पहिन के, उकड़ू बैठ के, मुंडी निचे गाड़ के, लोटे से गर्दन पर जल अर्पित कर रहे है जो की सर के केशों को भिगोते हुए भूमिगत हो रही थी।
‘ अच्छा जी… तो यही है तुमलोग का स्नान; कौवा स्नान…… खाली मुंडी धो-धो के आचार्य जी को अच्छा उल्लू बना रहे हो तुमलोग…… चलो स्कूल आज…’
फिर क्या…. विद्यालय में कुछ दिन उपहास के पात्र बने रहे हम तीनों।
चलिए अब एक अन्य घटना का जिक्र करते है, एक बार की बात है मेरे दो परम मित्र बड़ा दिन की छुट्टी में मेरे क्वॉटर में पधारे, मेरा पोस्टिंग उन दिनों गोला (रामगढ़) में था, प्रयोजन कुछ मूल्यवान समय एक साथ व्यतीत करना और रजरप्पा के छिन्नमस्तिके माता के दर्शन। क्वार्टर में पानी एक ही टाइम आता था जिसका समय निश्चित नहीं था और वो भी आधा घंटा। उन दिनों मेरा काम साइट पर ही ज्यादा चलता था तो मै सुबह निकलता और देर शाम अपने क्वार्टर में पहुँचता। अब अनिश्चिचित समय पर आने वाले सप्लाई वाटर को स्टोर करने के लिए, हमने कंक्रीट के ढलाई से बने हौदी में लगे नल को हटा दिया, अब पानी कभी भी आता स्टोर हो जाता। सुबह इस स्टोर्ड वाटर का तापमान इसके अधिकतम घनत्व वाले तापमान के आस-पास तो अवश्य होता था वो ऐसे कि इस पानी से स्नान करने पर ऐसा लगता था मानो आधा कपाल फ्रीजर में और बाकि का बॉडी चील ट्रे में रख दिया गया हो। अब योजनानुसार हम तीनों मित्रों को सुबह इस स्टोर्ड वाटर से स्नान कर के रजरप्पा मंदिर जाना था। वैसे पानी गरम करके स्नान की जा सकती थी पर उसमे ताज़गी ज्यादा देर तक नहीं बनी रह पाती। एक बात और ठंडे पानी के पहले लोटे को शरीर पर उड़ेलते ही बाकि का वीडियो फ़ास्ट फॉरवर्ड होने लगता है और आप जल्द ही बाल्टी भर पानी से स्नान कर लेते है, दूसरी और अगर सुसुम (लूकवार्म) पानी हो तो यही वीडियो स्लो-मोशन में चलती है और आप ज़्यादा देर तक पानी के संपर्क में रहना पसंद करते हैं। खैर हमलोग फ़ास्ट फॉरवर्ड वाले ही थे पर तीन में से बस दो जन। एक मित्र स्नान करने से पाहिले हमसे एक मलिया करुआ तेल मांग के फूल बॉडी पर चोप लिए फिर ऊपर से एक बाल्टी पानी उड़ेल लिए, मुझे तो ये समझ नहीं आया कि वे खुद नहाये या फिर एक मालिया करुआ तेल को नहलाये... खैर दूसरे मित्र ने रजरप्पा पहुंच के भैरवी नदी में स्नान करने की इच्छा जाहिर की हलाकि वो बात अलग है मान्यवर वहां भी अपने बात से मुकर गए बोले- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा ’।
कुछ मातायें बहने आज भी सूर्योदय पूर्व कार्तिक स्नान करती है, कहा जाता है जो फल सामान्य दिनों में एक हजार बार गंगा स्नान का होता है, प्रयाग में कुंभ स्नान का होता है वही फल कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व किसी भी नदी में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। मैं उन तमाम माताओं बहनों की चरणवंदना करता हूँ, जो इस कलयुग में इतनी निष्ठा ला पाती हैं। अंत में उम्मीद करता हूँ कि आप सब भी जाड़े के स्नान से जुड़ी कुछ रोचक यादों को अवश्य साझा करेंगे।
© Article: अवनीश प्रकाश
© Picture: शिवांगी शैली

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