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तानियोसुन कनकनी शुरू होइते, मौसम पिकनिकिया जाला, मतलब सब के मन में पिकनिक के लेके प्लान बने लगेला। कौनो एतवार या छुट्टी के दिन कड़कड़ाईत कुहा (कोहरे) वाला सुबह आऊ लईकन के मन कौंधईत प्लान की पिकनिक कईसे मनावल जाव। गरीबी से जुझइत गाँव के हर घर के लईकन के पिकनिक मनावे के उल्लास जाड़-पाला आऊ कोहरा से मानो जंग लड़े ख़ातिर तइयार होवईत हलक, पर सबसे बड़ समस्या रहे कि पिकनिक के सामान कहाँ से लावल जाव। घर पर तो पिकनिक मनावे के बात करलो गुनाह रहे फिर माई-दादी से पिकनिक ला सामान मांगला से तो गारी के साथ- साथ ठोकाई-कुटाई भी मिल जईतक कि घरे के खाना सोहाईत नईखे ,टाँड़ आऊ परसबन में जाके खइहें तबे एहनी केे पेट भरी।
बात गाँव के बचपन के ऊ उम्र के हन जब हमनी 6 से 12 साल के ग्रुप में हली। पिकनिक के उमंग आऊ कहीं से कोई स्पोर्ट न मीले के बाद सब लईकन मिल के मीटिंग कइलीं आऊ एक उपाय निकालल गेल की सब गोड़ा कुछ-कुछ सामान और हँड़िया-बरतन आउ खाना के समान अपन घर से लुका के लाईब। अब करवाई शुरू भईल एक-एक करके बरतन और राशन छुपा के लावे के ....कोई पसुल,कोई कड़ाही ,कोई झाँझरा(झरना), कोई छोलनी, कोई कड़ाही लुका-छुपा के ले के सब निकले लगली, अब समझ तो रहे नहीं कि कउन समान कतना लागी आऊ दूसरे की लूका के लावेला भी रहे तो जेकर हाथे जेतना लागल उठा के भगले, कोई तेल के पूरा बोतल, कोई आलू, प्याज तो मर-मसाला, आटा ले के निकल लक। अब सब अपन ठिकाना पर परसबन में पहुँच गईली। सब के इकठ्ठा होखला पर पूरा टीम अइसन खुश दिखत रहे मानो कोई जीत हासिल भईल बा। अब थोड़ा सुरुज भगवान दिखे लगलन, पानी के साधन तो आस पास रहे नई, काफी दूर से स्कूल के चापाकल से कुछ लोग पानी लईलन, कुछ झूरी-काठी आऊ चूल्हा बनावे में जुटलन आऊ कुछ आलू-प्याज़ चीरे आउ आंटा साने में, सब कोई काम मे बिजी हो गईल। सबसे पहिले पुड़ी छाने के प्लान भईल अब पूड़ी बेले खातिर तो चकला-बेलना(पीढ़ा-बेलना) चाही, पर उ तो हइये नईखे, उ तो छूट गईल अब के लावे जाइ केहू के हिम्मत न होवत रहे, ओहि मे एगो हिम्मत करके अपन घर गईल, आउ जइसहीं अपन घर से पीढ़ा-बेलना ले के निकलल, ओकर माई देख लेलक, आउ माई के देखते उ दउड़े लागल, पर माई के हाथे पकड़ा गइल, अऊर उहे बेलना से पूड़ी से पहिले खुदे बेला गईल, पीढ़ा बेलना फेंक के उ रोवईत हमनी भीर पहुँचलक। अब तो बड़ा मुशीबत रहे कि पुड़ी कइसे बनी, फिर दिमाग लगावल गेल स्टील के थारी औंध के, स्टीले के गिलास से धीरे-धीरे पुड़ी बेलाइल आउ छनाइल। अब तक दिन चढ़ गेल हलक आउ सबके भूख से बुरा हाल होवईत हलक, फिर कड़ाही खाली होइते जल्दी से आलू के तरकारी बनावल गेल आउ सब लोग मिलके एके साथे बईठ के आधा कच्चा पका पूड़ी आउ आलू के तरकारी खूब खइली भूख में उ खाना बड़ा स्वादिष्ट लागत रहे।
अब तक घरे वलन के पता चल गेल हलक, आउ घर पर हमनी के स्वागत के बेशब्री से इंतेज़ार होवईत हलक। काहे की हर घर से जरूरत के कुछ न कुछ सामान गायब रहे, जे चालाक हलन उ तो चुपे अपन घर के समान रख देलन, पकड़ईलन ना, आउ जे समान रखते या ले के अइते पकड़ाइल, ओकर सारा पिकनिक (पुड़ी-तरकारी)खाईल माई के हाथे कूटा के निकल गईल, इहवों जे ना पकड़ाईल उ दूसरे के पिटाइत समय खुब मजा लेलक। एक के पिटाई पर बारी-बारी सब के माई खोरी में ई बात बोल के हल्ला करइत मिललक कि फलनवा के बेटा के देखा हिसँगी तु सब समान बरबाद करले बड़े, कोई कहईत मिललन की हमर घरे से तेल के बोतल गायब बा, तो कोई के आटा, कोई के मसाला ग़ायब के शिकायत रहल.... ई सब शिकायत के पीछे एक बड़ वजह रहे कि ऊ समय दैनिक उपभोग के सब समान साप्ताहिक हाट/बजार से किनाइत रहे आउ सीमित रहत रहे, पर लइकन के ई सब बात के समझ कहाँ रहे कि गरीबी के गृहस्थी केतना कठीन होला।
आज स्थिति काफी कुछ बदल गइल बा, आज के माता पिता (घर) से स्कूल तक सब जगह अब इस तरह के आयोजन पर ध्यान देल जाइत बा। अब तो लगभग हर स्कूल के तरफ से भी लइकन के एक से एक दर्शनीय प्राकृतिक स्थल पर पिकनिक ख़ातिर ले जाईल जाईत बा, साथ ही आज के माता पिता भी अपन बच्चन के साथ इस तरह के इवेंट में काफ़ी सक्रियता देखावईत हत, जे काफी सकारात्मक पहलू बा। पर आज भी कोई भी पिकनिक के जगह पर जाये पर उ बचपन के गाँव के पिकनिक के स्मृति मन में एक अलग रोमांच और ख़ुशी भर देवेला।
© Rakesh Bharti Goswami

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