Thursday, September 29, 2022

लइका के भागे लरकोरी

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"सब्जी मत खईह एतना तीता आऊ मसाला से लाइका के पेट जरे लगी।"
एक बार फिर????
गला रूंध सा गया 'शारदा' का एक-एक निवाला अटक रहा था गले में। पोते की खूब चिंता है, लेकिन बहू की रूचि बिलकुल मायने नहीं रखती क्या?
नवंबर माह की शुरुआत में शारदा ने अपने जैसे ही सुंदर एक बेटे को जन्म दिया था। वह खुद तो दुबली पतली थी, पर बच्चा एकदम हृष्ट पुष्ट था। एक साल पहले की ही तो बात है जब सुंदर सुडौल बड़ी-बड़ी आंखों वाली शारदा रविंद्र से ब्याह कर अपने ससुराल आई थी। ग्रामीण जीवन की सरलता उसको आकर्षित करती थी।जल्दी ही मातृत्व ने उसकी ज़िन्दगी में भी दस्तक दे दी।
उल्टीयों के दौर ने उसकी हालत खराब कर दी थी, जितना सुन्दर कविता साहित्य में मातृत्व को चित्रित किया जाता है, सच्चाई काफ़ी इत्तर होती है। धीरे-धीरे उसकी मायूसी हावी होती गई और उसे मां की याद आने लगी, काश किसी तरह एक बार वह मायके चली जाए। आधुनिक युग में इसको पोस्ट पार्टम डिप्रेशन कहा गया है। परंतु गांव के भगत जी की सख्त हिदायत थी कि बच्चे के जन्म तक नईहर नहीं भेजा जाए।
भगत जी की दकियानूसी सोच पूरे परिवार पर हावी थी । धीरे धीरे कर शारदा के गहने उतरते गए और उसकी जगह ताबीजों ने ले ली। पर उसे फुर्सत कहां थी स्वयं को देखने की, बच्चे की डिलीवरी सामान्य हो जाए, इसके लिए उसे आराम छोड़ पूरे समय शारीरिक श्रम करने के लिए टोका जाने लगा। उसकी परिश्रम रंग लाई और प्रसव के दौरान सामान्य तरीके से उसने अपने बच्चे को जन्म दिया। बच्चे को देखकर उसकी सारी तकलीफें मानो छू मन्तर हो गईं!
पर यह क्या अचानक ही जैसे शारदा के खाने पर ग्रहण सा लग गया -वात के प्रकोप से बचने के लिए बैंगन, टमाटर, फलियां, धनिया की पत्ती, मूली सभी से परहेज किया जाने लगा और अमूमन यही सब्जियां तो उगती थी उसके खेतों में । शारदा दिन प्रतिदिन दुर्बल होते चली गईं। अधूरी जानकारी व अंधविश्वास के आधार पर ही जीवन यापन की परम्परा रही है। इसी रूढ़िवादिता में बदलाव की नितांत आवश्यकता है।
वर्तमान समय में प्रसव के दौरान महिलाओं में बाहरी ख़ून चढ़ाने की परिपाटी सी बन गई है और यह सब होता है अज्ञानता के कारण। गर्भावस्था और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती ही है। यदि इसे पूरा किया जाए, तो प्रसव चाहे सामान्य हो या सिजेरियन कभी रक्त की कमी नहीं होगी। पर जागरूकता के अभाव में हम स्वयं को ख़तरे में डाल देते हैं।
ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं तो डॉ॰ द्वारा निर्धारित दवाओं का डोज़ भी नहीं लेती कि बच्चा मोटा हो जाएगा तो ऑपरेशन की नौबत आ जाएगी। और होता इसके उलट है। महिला इतनी कमजोर हो जाती है कि वह सामान्य प्रसव करने में असमर्थ हो जाती है फिर नौबत ऑपरेशन की आ जाती है।
एक दिन शारदा की एक समझदार ताई-सास उनसे मिलने आयीं। शहर के रिहाइश ने उनको काफी जागरूक बना दिया था. जब उन्होंने देखा की यहां तो दो वक्त का भोजन भी बड़ी मुश्किल से शारदा को मिल रहा था। पहले की भांति ही सभी को खिलाने के बाद बचा खुचा खाना वह खा लेती थी। बच्चे को दूध मिलता रहे, इसके लिए वह अक्सर माड़ पी लेती थी। उसे स्वयं दूध पीने की आवश्यकता थी पर यह उस के नसीब में कहाँ था। बहरहाल खून की कमी/एनीमिया के लक्षण साफ-साफ दिख रहे थे, उसके और उस बच्चे की बीमार आंखों में।
मोहल्ले की महिलाएं कानाफूसी करती थीं कि रविंद्र बहू का ख्याल ठीक से नहीं रख रहे, उसके परिवार वाले। इन बातों को सासू मां भी भली-भांति भांप रही थी और अपनी करनी पर पर्दा भी बखूबी डालती थी।
"का जनी कइसे अनाज इनकर देहें में नईखे लागत, खाए के कमी बा, कोठी भर भर के त अनाज बा भंडार में।"
ताई-सास के सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने एक दिन भोरे भोरे शारदा की सास/अपनी गोतनी को बुला के खूब डांटा। "इसलिए गाँव में अपनी बेटियां बियाहने में कतराने लगे हैं लोग। तुम अपना समय भूल गयी दुल्हिन? छोप के रखते थे हमलोग, खाली भाँजने के लिए नहीं होता था सुख सम्पति। जब उन्होंने डांट खा कर रुआँसी हो चुकी शारदा की सास को गलती का एहसास करवा दिया, तो फिर शारदा को भी बुला कर डांटा। "दुल्हिन तुम तो आज की पढ़ी लिखी लड़की हो। खुद की सेहत का ध्यान रखना तुम्हारी भी जिम्मेवारी बनती है कि नहीं? डॉक्टर के पास जाओ, उचित सलाह लो औऱ अपने और बच्चे दोनों को तंदरुस्त रखो। इतना ही नहीं कचर पचर में पड़ने की बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं की पढ़ाई फिर से शुरू कर दो। " उसके बाद कुछ ही देर में अपना बोरिया बिस्तर बाँध के वापस अपने घर चली आयीं।
एक साल बाद एक सुहानी सुबह ताई जी के घर एक तार आया। कुछ ही शब्द लिखे थे। मुन्ना और शारदा दोनों स्वस्थ् हैं। शारदा ने बैंक की प्रतियोगी परीक्षा उतीर्ण कर ली है। साथ में एक महिला गैर सरकारी संस्था शुरू किया है, जिसे दोनों सास बहु मिल के चला रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जच्चा-बच्चा के पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु। ताई जी का सीना चौड़ा हो गया। आखिरकार उनकी बातों ने गांव में नयी रौशनी जो फैलाई थी।
© संध्या शेखर
May be an image of 1 person and text that says "लरकोरी ममता को समर्पित कहानी � संध्या शेखर ठेठ पलामू की प्रस्तुति"

Sunday, September 18, 2022

सियार का बियाह

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धूप में बारिश होते देखा, तो अनायास बचपन की एक कहावत याद आ गयी कि जरूर कहीं किसी सियार का बियाह हो रहा होगा। लगे हाथ यूट्यूब में सियार-सियारिन का बिरहा गीत बजा दिया, तो माहौल पूरा सियारमय हो गया। सियार अपनी जिंदगी में एक ही बार जोड़ी बनाता है और आखिरी वक्त तक निभाता है। इसीलिए उसकी शादी पर प्रकृति अपनी अनोखी छटा बिखेरती है।
अचानक कौतुहल हुआ कि सियार देखे बहुत दिन हो गया 'यार'। बाबूजी से पूछा कि आखिरी बार सियार कब देखे थे, तो उन्हें भी हाल का कोई समय याद नहीं आया। एक समय था कि डाल्टनगंज में हमारे घर के पीछे खेत में सियार दिख जाया करते थे। हालांकि गांव में अभी भी इक्का-दुक्का सियार दिख जाते हैं, पर वो शाम होते ही डरावनी हुवाँ-हुवाँ की आवाज, जिसके डर से शहर के बच्चे सप्ताह भर का प्रोग्राम एक दिन में ही निबटा कर भाग जाते थे, अब सुनने को नहीं मिलता।
एक सत्य घटना बतलाता हूँ। तकरीबन 25 साल पहले मेरे दो मामा ग्रीष्मकालीन पर्यटन पर मेरे गांव पधारे। पूरा दिन तो थ्रिल-एडवेंचर चलता रहा, पर शाम होते ही हुवाँ-हुवाँ की आवाज से दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, बेचारों का पहला अनुभव था सियार की आवाज सुनने का। अगले दिन तड़के ही दोनों 407 सवारी गाड़ी से गांव को हमेशा के लिए अलविदा कह शहर को प्रस्थान कर गए।
मुझे याद नहीं कि दादी-नानी की कहानी कभी भी बिना सियार के शुरू होती थी। सियार को हमेशा कहानी में चतुर और मंत्री के रूप में दिखाया जाता था। पंचतंत्र में भी रंगा सियार की कहानी तो आप सबने जरूर पढ़ी होगी। बाद में नंदन-चंपक में इतनी कहानियां पढ़ी पर अधिकतर फैंसी जानवर ही दिखते थे, अपना पलमुवा सियार का दर्शन नहीं होता था। फिल्मों में जरूर गाहे-बेगाहे ये डायलॉग सुनने मिल जाता था कि "जब गीदड़ की मौत आती है, तो वो शहर की ओर भागता है" या फिर "ये गीदड़भभकी किसी और को दिखाना"। बाद में थोड़े समय के लिए ही सही पर शक्तिमान में डॉ जैकाल के दर्शन हुए।
सियारिन को देहात में फ़ेंकार भी कहा जाता है और उसका रोना बहुत ही अपसगुन माना जाता है। दरअसल सियारिन का आवाज नर सियार से थोड़ा कमजोर होता है और रोने जैसा साउंड करता है। आज भी कोई बच्चा अगर देहात में बहुत देर तक रोये, तो उसे कहेंगे कि काहे फ़ेंकरत हें एतना देर से। कुछ साल पहले तक कुछ भी गलत होने पे सारा आरोप सियारिन पर डाल दिया जाता था। अकसर लोग ये कहते मिलते कि कल राते फ़ेंकार फेकरत रहे, इहे से हो गइल। बाद में शहरीकरण के कारण फ़ेंकार का स्थान कुत्तों के रोने को दे दिया गया।
अभी जितिया पर्व में चिल्हो-सियारो की पूजाई में भी सियार का वर्णन सुनने को मिलेगा। सियार हमेशा से हमारी संस्कृति, लोककथा का हिस्सा रहा है लेकिन अब पर्यावरण के बिगड़ने का ऐसा असर पड़ा कि आज की पीढ़ी सियार शब्द से भी अनजान है। कुछ दशक पहले तक 'सियारमरवा' लोग गांव में सियार के खाल के लिए, उनका शिकार करते चलते थे। अब तो सियार के साथ-साथ सियारमरवा भी नजर नहीं आते हैं। पलामू के देहात में आज भी कुछ इलाकों के खेतों में मकई और केतारी खाते सियार दिख जाते हैं, लेकिन उनकी घटती संख्या के कारण अब सियार दिखना दुर्लभ ही माना जा सकता है।
जब भी धूप और बारिश एकसाथ देखें, तो याद रखें कि कहीं सियार की शादी हो रही है। आपके पास भी सियार से जुड़ी कोई किस्सा कहानी या बातें हो, तो कमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें।
© सन्नी शुक्ला

Saturday, September 17, 2022

बिसकरमा पूजा है, गाड़ी धोये कि नहीं

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जब हमनी रेंगा थे, तो दुगो पुजा के पुरजोर असरा देखते थे, सरस्वती पूजा और विश्वकर्मा पूजा। काहे की इ दुनो पूजा में हमिन के करे ला कुछ ना कुछ मिलिए जाता था , बाकि में तो लइका बुझ के कोई भेलुये नहीं देता था। एगो आउ बात था कि दुनों पूजा में बुंदिया के प्रसादी दबा के मिलता था (अब ई मत कहिएगा की आप बिना बुंदिया चलउले विश्वकर्मा पूजा कर देते हैं)।
विश्वकर्मा पूजा के हमनी बिसकरमा पूजा कहते है। हर साल ई पूजा 17 सितंबर के ही आता है। तिल-सकरात, बिसो आउ बिसकरमा पूजा; तीने गो पूजा हम जानते हैं जेकर अंग्रेज़ी और हिंदी दुनों कलेंडर में एक्के दिन पड़ता है। मजाल हैं कि कउनो पंडित जी कंफ्यूज कर दें कि पूजा आज है कि कल।
सनातन धर्म में बाबा विश्वकर्मा की पूजा का विशेष महत्व है। बाबा विश्वकर्मा को दुनिया का सबसे पहिला इंजीनियर कहल गया है। कहल जाता है कि भोलेबाबा के तिरसुल आउ विष्णु भगवान् का सुदर्शन चक्र; विश्वकर्मा बाबा ही बनाये थे। सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग में सोने की लंका, द्वापरयुग में द्वारकानगरी आउ कलयुग में पूरी जगन्नाथ मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण-बलराम-सुभद्रा की मूर्ति का निर्माण भी इन्हीं के हाथो माना जाता हैं। देखिये प्रभु की लीला अपरम्पार है, उनके उपलब्धियों की सूची हम तुच्छ प्राणि लोग क्या बना पाएंगे। हमलोग तो बस इहे चाहते हैं कि बाबा कि कृपा दृष्टि हमसब पर सदा बनी रहे,बस।
बिसकरमा पूजा घरे-घर होये वाला पूजा है। काहे की सबके घर कुछ न कुछ कल-पुर्जा, अवजार, पहसुल, कोड़ी-कुदारी-टांगी, हल-जुआठ, साइकिल; आउ आधुनिक घर में तो बिजली से चले वाला ढेरे उपकरण है जैसे मिक्सी, पंखा, टीभी, कंप्यूटर; वाहन में मोटर-साईकिल, स्कूटर, कार रहबे करता है।
कार-जीप-ट्रक के ड्राइवर सब तो पूजा के दिन गाड़ी के नहर-पोखर में ले जा के खूब पखार-पखार के धोता है। फिर झालर-चुनरी से सजा के गाड़ी एकदम चकचका देता है। मेरे पास जब रेंजर सइकिल था (जेकरा बड़ी जिद करला पर बाबूजी लिये थे, उहो तब तक नहीं जब तक कि हम मैट्रिक पास नहीं कर लिए), ओकरा बिसकरमा पूजा के दिन रगड़-रगड़ के साफ़ कर के एक-एक स्पोक चमका देते थे; मजाल था कि कउनो चित्ति दिख जाए, बिसकरमा पूजा पे। फिर माँ अपना सिलाई मशीन और बाबूजी का स्कूटर के साथे हमर साइकिल के भी सिंदूर लगा के और अगरबत्ती देखा के पूजा कर देती। आउ हम नहा-धोवा के, नारियल के एक्के पटकन में फोर के चक्का पे पानी चढ़ा देते।
खैर घर में पूजा हो गेला पे, ऊपरी बेला में हमनी सब लइकन, घर के नाम मात्र के गार्जियन (जेकर में बचपना कूट-कूट के भरल रहता था, ताकि हमनी के मनमानी पे अंकुश ना लगल रहे) के साथे चिमकी (प्लास्टिक थैली) ले के निकल जाते पुरे शहर में बाबा बिसकरमा के दर्शन करे आउ बुंदिया कलेक्शन करे। कहूँ छेनी-हथौड़ी लिए हांथी पर सवार बाबा के विकराल दर्शन होता, तो कहूँ गैरेज में फोटो पर ही पूजा हो गया होता। हाँ, "उ घरी बिजली ऑफिस में बड़ा भव्य आयोजन होता था", एक बात आउ जउन पंडाल या गरेज में 2 बजे तक पूजा नहीं होता था, उ से हमनी बड़ी खिसियाते थे, काहे की हमनी सोचते थे कि परसादी बांटे के चलते भइवन लेट से बाबा के पूजा करता है। बिसकर्मा बाबा के नाम पर हमनी खालसा गैरेज, विश्वकर्मा गैरेज, बिजली ऑफिस , रांची रोड, पांकी रोड, इंजीनियरिंग रोड, इन्कमटैक्स रोड पूरा शहरे मख देते थे। साँझ के केकर केतना प्रसादी जमा हुआ है देखल जाता, फिर मिल बाँट के बाबा का प्रसाद पूरा परिवार खाता। ये तो बचपन था और बचपन हर गम से बेगाना होता हैं.......
पर जब तक आप किसी कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते, उस कार्यक्रम के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर भी आपको उतनी संतुष्टि नहीं मिलती। पूजा पाठ को ही ले लीजिए; पंडाल बनाने में, सजाने सवारने में, प्रसाद बनाने, पूजा में बैठने में, प्रसाद वितरण में, हवन में जब हम अपना योगदान देते हैं, तो पूजा कितना आनंददायक और फलदायक लगता है। पर आज किसी भी चीज़ का टेंडर दे देने का रिवाज़ बन गया है, चाहे काम हो या पूजा; बस टेंडर निकल देना है। पंडाल बनाने का टेंडर, मूर्ति बनाने का टेंडर , बुंदिया/प्रसाद बनाने का टेंडर, प्रसाद बाँटने का टेंडर, मूर्ति विसर्जन का टेंडर, यहाँ तक की पूजा में बैठने का भी टेंडर लोग दे दे रहे हैं। बड़ी प्रोफेशनल होते जा रहा है सब जी, काम हो या पूजा पाठ सब जगह टेंडर सिस्टम दीमक की तरह फ़ैलते जा रहा है। काश किसी इंसान को खुश रहने का भी टेंडर दे देते ये लोग।
सहकर्मी-बंधुओं के सक्रिय योगदान से हमारे DVC ऑफिस में भी विश्वकर्मा पूजा का आयोजन किया गया है। बाबा से हम सभी यही कामना करते है कि प्लांट के कल-पुर्जो के साथ-साथ, हमारे दिमाग के कल-पुर्जे भी सुचारू रूप से काम करते रहें। इस विश्वकर्मा पूजा पर प्रार्थना है, हम सभी शून्य दुर्घटना लक्ष्य को हासिल करते रहे।
प्रेम से बोलिये विश्वकर्मा बाबा की ...... जय
© Er. Awnish Prakash
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Thursday, September 15, 2022

भेंट का फूल

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पलामू के बच्चों को कमल का फूल सिर्फ किताबों में और दिवाल पर टंगे भगवान की तस्वीरों में देखने का ही सौभाग्य था। ऐसे ही एक दिन बाबूजी के साथ सड़क किनारे पानी में 'जल-कुमुदनी' के पुष्प को देख कर अनायास ही जिद कर बैठा कि मुझे 'कमल' का फूल चाहिए, तोड़ दीजिये। बाबूजी गंदे पानी में उतर कर फूल लाने के बजाए, मुझे ज्ञान देना ज्यादा उचित समझे - " बेटा ये #भेंट का फूल है, कमल नहीं है।" पूरे रास्ते उन्होंने अपना बायोलॉजी ज्ञान दिया कि कैसे कमल और वाटर-लिली में बहुत सारी डिफरेंसेज होती है।
थोड़ा बड़ा होने पे जब अपने मन का मालिक हुआ और दोस्तों के साथ साईकिल पे नए-नए रास्ते ढूंढने निकलने लगा, तो जब भी कहीं अहरा, पोखरा, खेत, तालाब में भेंट का फूल दिखता, तो हमारी पूरी टोली पानी में उतरने में देर नहीं लगाती। देखते-देखते हमारा टिड्डियों का दल पूरा का पूरा भेंट का फूल तोड़ कर आपस में बंटवारा करने में लग जाते थे। फिर भेंट के फूलों का ढेर साईकल के कैरियर पे लाद, हम बच्चे शान से ऐसे चलते थे, मानो कोई खजाना हाँथ लग गया हो। पूरे रास्ते लोग एकाध फूल मांगते रहते थे और हम दानी कर्ण बन अपनी उदारता में बांटते चलते थे, साथ में अपनी बहादुरी के किस्से सुनाना नहीं भूलते थे।
कुछ बच्चे फूल के नीचे की डंडी को मोड़-तोड़ कर माला बनाते थे, तो कुछ सारी पंखुड़ियों को नोच और नीचे की डंडी को छील कर चकरी। लेकिन असली मजा तो भेंट के फूल का 'बचका' खाने में आता था, जिसे आज कल की पीढ़ी 'पकौड़ी' के नाम से जानती है। चूंकि भेंट का फूल गंदे पानी में भी उगा रहता था, तो घर पर माताजी को विश्वास दिलाना जरा मुश्किल काम था कि फूल साफ पानी में से ही लाये हैं। तभी जाकर भेंट की पंखुड़ियों की अद्भुत सुस्वादिष्ट #बचका खाने को मिलता था। दरअसल खाने की थाली में उपस्थित सभी चीजें घर में पापा लाते थे, तो थाली में एक आइटम खुद का कमाया हुआ सा अलग गौरवान्वित करने वाला अहसास देता था।
उस वक़्त डाल्टनगंज में बरसात के बाद जगह-जगह पानी जमा होकर पोखर का रूप ले लेती थी और उन सब पोखरों में खिला भेंट का फूल, एक अलग ही रमणीय दृश्य बनाता था। ये एक तरह का जल संरक्षण का प्रकृति का अपना ही तरीका था। फिर शहरीकरण की दौड़ में डाल्टनगंज में जमीन की ऐसी लूट मची कि पानी जमना तो दूर तिल रखने की जगह भी नहीं बची।
अरे हाँ, बताना तो भूल ही गए। जब बहुत बाद में बड़ा होने पे असली कमल का फूल देखने को मिला तो मुँह से निकला "धुत्त बुड़बक, बहुत बेकार दिखता है ई तो, कइसन लुंजपुंज है ई कमल का फूल, एकर से तो हज़ार गुना सुंदर हमर पलामू के भेंट के फूल दिखता है।"
© सन्नी शुक्ला
May be an image of flower, outdoors and text that says "भेंट का फूल"

Wednesday, September 14, 2022

जनार्दन द्विवेदी 'दीन' पलामू के 'संत साहित्यकार'

 

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हिंदी दिवस विशेष
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जनार्दन द्विवेदी 'दीन' की साहित्य साधना अद्वितीय है, उनका व्यक्तित्व अनुकरणीय है और उनका व्यवहार तो आह्लादित करने वाला है। मैं सारी बातें वर्तमान काल में इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि साहित्य साधक कभी भूतकाल में जा ही नहीं सकता है। उनकी लेखनी जितनी भावनाप्रद थी, व्यवहार उतना ही भावनाओं से भरा होता था। एक मुलाकात में ही लोग उनके मुरीद हो जाते और उनके सामने श्रद्धानवत हो जाते थे।
प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा दीन जी के सबसे पुराने शिष्यों में से एक हैं। दोनों के बीच गुरु-शिष्य के अलावा एक और रिश्ता था। वह रिश्ता था मामा-भांजा का। दरअसल दीन जी ब्राह्मण विद्यालय में शिक्षक थे। इसी स्कूल में पं. उमाकांत पाठक भी पढ़ाते थे। उमाकांत पाठक जी प्रो. मिश्रा से छोटे मामा थे। इसी नाते यह रिश्ता पनपा और सदैव बना रहा। प्रो. मिश्रा कहते हैं कि दीन जी एक बार स्कूल में पढ़ाते समय दीपावली पर लेख लिखवा रहे थे। तब उनके शब्द कुछ इस प्रकार थे, 'आज व्यक्ति और ईश्वर में संघर्ष है। ईश्वर चाहते हैं कि अंधेरा फैला देंगे पर व्यक्ति दृढ़ प्रतिज्ञ है कि वह दीपों की जगमगाहट से रोशनी फैला देगा। व्यक्ति सफल होता है, दीपों की जगमगाहट अमावस्या की कालिमा को दूर कर देती है। छात्रों को दीपों के जगमागहट से ही नहीं बल्कि ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान रूपी कालिमा को भी दूर करना होगा।'
प्रो. मिश्रा बताते हैं, 'तब वे जनार्दन द्विवेदी थे। एसएन सिन्हा कॉलेज, औरंगाबाद के छात्र के रूप में फीस माफी के लिए प्रिंसिपल जनार्दन झा 'द्विज' के पास के पास पहुंचे। उन्हें देखते ही द्विज जी ने कहा कि तुम तो बहुत तीक्ष्ण बुध्दि के हो, इस तरह 'दीन' की भांति क्यों खड़े हो। द्विज जी का यह संबोधन छात्र जनार्दन की दिशा बदलने वाला था। उनका फीस तो माफ हुआ ही 'दीन' का उपनाम भी मिल गया।'
दीन जी को 20 मार्च 1994को राधाकृष्ण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब वे डालटनगंज लौटे तो मैं भी पापा के साथ उनके नावाटोली स्थित घर पर गया था। हम दोनों ने उनके पैर छुए तो उन्होंने हमें गले लगाते हुए कहा, 'पूर्वजों की कृपा आऊ तोहिन अइसन के प्यार से ई पुरस्कार हमरा मिलल बा। हमरा ई समझ में नईखे आवत कि हम अइसन का लिखले ही की हमरा एतना बढ़का सम्मान मिलल।'
अब जरा देखिए दीन जी की लेखनी कैसी थी। 'हमारे सिद्ध संत एवं साधक' में वह लिखते हैं, 'भारतवर्ष संत महात्माओं का देश है। सौभाग्य से इन संत महात्माओं के आविर्भाव समय-समय पर इस देश के विभिन्न भागों में होते रहे हैं। सिक्ख गुरुओं के आत्म बलिदानों से पंजाब ही नहीं सारा भारतवर्ष गौरवान्वित हुआ है।...संत शिरोमणि श्री रामकृष्ण परमहंस, श्री विवेकानंद, महर्षि अरविंद आदि संतों के अलौकिक कार्यों और उन संतों की दिव्य साधनाओं से भारतवर्ष महिमान्वित हुआ है।...रैदास, कबीर, नानक, दादू दयाल, दरिया साहब आदि संत-महात्माओं की दिव्य वाणियों से भक्ति और ज्ञान की ऐसी गंगा, यमुना की धाराएं प्रवाहित हुई हैं जिनकी शीतलता से संगत एवं उत्पीड़ित मानवता को त्राण मिला है।' ऐसे शब्द लिखने वाले दीन जी की संगत से भी लोगों को मानसिक पीड़ाओं से त्राण मिलता रहा है। वह श्री अरविंद सोसाइटी, डालटनगंज के अध्यक्ष भी रहे थे।
ओम प्रकाश अमरेंद्र दीन जी के पुत्र और पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं। पुत्र और पत्रकार दोनों के नाते उन्होंने अपने पिता को काफी नजदीक से देखा है। वह बताते हैं, 'बाबू जी के लिए लेखन और निजी रिश्ते सबसे ज्यादा प्रिय थे। जब प्रो. मिश्रा उनसे मिलने आते तो दोनों की बातचीत सदैव पलमूआ में ही होती थी। गुरु-शिष्य और मामा-भगिना के रूप में शुरू हुई बातचीत कब साहित्यिक हो जाती थी यह पता ही नहीं चलता था।'
हिंदी के प्रकांड विद्वान डॉ. रामदयाल पांडेय दीन जी के आदर्श थे। उन पर छायावाद के एक स्तंभ सुमित्रानंदन पंत का काफी प्रभाव था। पंत जी से मिलने वे उनके प्रयागराज स्थित घर पर भी जा चुके थे। वाराणसी में पढ़ाई के दौरान वहां के साहित्याकारों से भी उनके बहुत नजदीकी रिश्ते थे। मेदिनीनगर (डालटनगंज) के समकालीन साहित्यकारों स्व. जगदीश नारायण दीक्षित, स्व. ज्योति प्रकाश, स्व. डॉ. जगदीश्वर प्रसाद, स्व. डॉ. ब्रजकिशोर पाठक, स्व. दीनेश्वर प्रसाद 'दीनेश' के वे काफी प्रिय थे। प्रो. कमला कांत मिश्र, प्रो. सुभाष चंद्र मिश्र, हरिवंश प्रभात जैसे आज के साहित्यकारों को भी वे स्नेह देते थे। पत्रकारों में वह ज्यादा समय गनौरी ठाकुर, करुणा सिंधु दास गुप्ता, रामेश्वरम, महेंद्र नाथ त्रिपाठी, सुरेंद्र सिंह रूबी के साथ गुजारते थे। मेरी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए तो वे आदर्श थे ही।
दीन जी का लेखन अध्यात्मिक होने के साथ-साथ यात्रा वृत्तांत भी होता था। एक जगह वे लिखते हैं, 'अपनी हिमालय यात्रा के क्रम में कई संत महात्माओं के पावन दर्शन के सौभाग्य प्राप्त हुए थे। उन संतों में श्री बदरी विशाल के सर्वश्री मौनी बाबा, गुदड़ी बाबा और श्री केदारनाथ के श्री फलाहारी बाबा के नाम उल्लेखनीय हैं। इन संतों की विकट साधनाओं को देखकर हृदय आश्चर्य से भर उठता है।'
दीन जी की अध्यापकीय यात्रा 1950 में बिहार के औरंगाबाद जिले के ओबरा हाई स्कूल से शुरू हुई। इस यात्रा के पड़ाव जनता उच्च विद्यालय, बिश्रामपुर, ब्राह्मण उच्च विद्यालय, डालटनगंज, रामा साहू उच्च विद्यालय, गढ़वा रहे। रामा साहू उच्च विद्यालय के तो वे प्राचार्य भी थे। जुलाई 1954 से जून 1955 तक वे बीएड प्रशिक्षण के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय भी गए। 1955 से 1961 तक ब्राह्मण विद्यालय में रहने के दौरान उन्होंने यहां से निकलने वाली पाक्षिक पत्रिका का संपादन भी किया। बाद में वे कोलकाता से निकलने वाले 'दैनिक विश्वामित्र' के धार्मिक स्तंभों के प्रमुख लेखक और पलामू के जिला संवाददाता रहे।
दीन जी की पहली पुस्तक 'अश्रु कण' 1956 में छपी थी। इसी साल 'दुपहरिया के फूल (पांच कहानियों का संग्रह), 'समाधि के फूल' (दो ऐतिहासिक कहानियां), 'देवलोक की ओर' (हिमालय यात्रा वृत्तांत) पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 'देवलोक की ओर' का द्वितीय संस्करण 1990 में आया। 1992 में 'पतझड़' (कहानी संग्रह), इसी साल पूज्यवाद अघोरेश्वर भगवान राम की जीवन यात्रा का भी प्रकाशन हुआ। दीन जी की सबसे चर्चित कृति 'हमारे सिद्ध संत एवं साधक' का प्रकाशन 1993 में हुआ। पलामू के इस महान साहित्यकार का जन्म 15 नवंबर 1924 में बिश्रामपुर के तीसीबार गांव में और निधन डालटनगंज में 13 मई 1999 को हुआ था।
हिंदी दिवस के मौके पर इस संत-पत्रकार को विनम्र श्रद्धांजलि।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा

Monday, September 12, 2022

युगांत बद्री पांडेय जी का खत ठेठ पलामू के नाम


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प्रिय ठेठ पलामू के पाठक गण🙏
इसे महज संयोग कहे या फिर मेहनत व जुनून का प्रतिफल कहें कि डालटनगंज(पलामू,झारखंड) से दो युवा पिंकू दुबे (लेखक/निर्देशक) व स्वयं मैं युगांत बद्री पांडेय (अभिनेता)अपने अपने ख्वाबो को लेकर मुम्बई मायानगरी पहुंचते है, दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग किन्तु मंजिल एक।
संयोग देखिए एक इंटरनॅशनल फ़िल्म फेस्टिवल गोल्डन वीट में बतौर लेखक पिंकू दुबे की फ़िल्म द लास्ट एनवलप व मेरी फिल्म बतौर अभिनेता द स्पैरो (निर्देशक अभिषेक पांडेय ) प्रतियोगिता में पहुंचती है और इस से भी बड़ा संयोग यह है कि मित्र पिंकू दुबे की फ़िल्म बेस्ट शार्ट के लिए सम्मानित की जाती है और मेरी फिल्म को बेस्ट सिनेमेटोग्राफर का सम्मान प्राप्त होता है। प्रथम बार ऐसा हुआ है कि हम दोनों मित्र एक साथ एक मंच पर मौजूद तो है ही साथ ही अपनी अपनी उपस्थिति को पुरजोर तरीके से दर्ज करा रहे है ।
मित्रो यह बहुत बड़ी उपलब्धि तो नही है। सफर अभी बहुत लंबा है किंतु जो फिलवक्त मेरी जो भावना है वो यह है कि दो मित्र जिनकी अलग अलग आंखों ने कुछ एक जैसे सपने संजोए, छोटे शहर से निकल कर अपनी पहचान के लिए शिद्दत से संघर्ष करने और कुछ कर जाने की तमन्ना से मुम्बई शहर पहुंचे थे, उनका एक बड़े मंच पर अलग अलग माध्यम से पहुंचना और छोटी ही सही मगर दोनों का उपलब्धि प्राप्त करना मुझ में एक नई ऊर्जा का संचार कर रहा है। मेरे लिए तो यह एक अद्धभुत आनंद का क्षण है । मुझे पूरा विश्वास है कि यह आनंद प्रत्येक पलामू(डालटनगंज) वासियों में भी एक ऊर्जा व उत्साह का कारण बनेगा और साथ ही मुम्बई में संघर्ष कर रहे हमारे शुभचिन्तको व मित्रो को भी यह खबर आनंदित करने वाला है ।
आपका अपना
युगांत बद्री
May be an image of 2 people, beard and text that says "ਬ ठेਠ प्रलामू अंतरराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने के लिए पलामू के दोनों सपूतों को दिल से बधाई"