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जो लोग नब्बे के दशक को देखे हैं, उन्हें अच्छे से अंदाजा है कि उस दौर में टेक्नोलॉजी कितनी तेजी से बदल रहा था। मनोरंजन उद्योग आये दिन नए-नए इंस्ट्रूमेंट्स लांच करते रहता था। कैसेट, वीसीपी, वीसीआर, सीडी, डीवीडी, टेप रेकॉर्डर, साउंड बॉक्स, टू इन वन रेडियो, वाक मैन इत्यादि ना जाने कितने मनोरंजन के साधन आ रहे थे और तेजी से गायब भी हो रहे थे।
रेडियो सुनना शहर के लोगों के लिए कल की बात हो चुकी थी। मार्केट में रंगीन टी.वी. जगह बनाना शुरू कर चुका था, पर इतना महंगा था कि आपकी तीन-चार महीने की पूरी सैलरी चली जाती थी खरीदने में। इसी कारण ब्लैक एंड व्हाइट टी.वी. ने अलग-अलग ब्रांड और साइज में लगभग सभी शहरी घरों में जगह बना लिया था। रेडियो की दयनीय स्थिति पर स्कूल की हिंदी की पाठ्यपुस्तक में भी " रेडियो और टी.वी." पर चैप्टर आने लगा था, जिसमें टी.वी. चिढ़ाते हुए रेडियो को दादाजी कह कर संबोधित करता है। शहरी बच्चों को तो रेडियो चलाना भी नहीं आता था। मीडियम और शार्ट क्या होता है वो उन्होंने कभी सुना ही नहीं था।
हमलोग सप्ताह भर इंतजार करते थे इतवार का, ताकि रंगोली, चन्द्रकांता, श्री कृष्णा, शक्तिमान, कैप्टन व्योम जैसे दिल को छू लेने वाले कार्यक्रम टीवी पर देख सकें। दमदमी माई और क्रूर सिंह का खौफ अपनी बंधु बांधवों में फैलाने में बहुत मजा आता था। शक्तिमान के तमराज किलविश के अँधेरा कायम करने की कवायद हमारी पसंदीदा टाइमपास हुआ करती थी। सौरी शक्तिमान तो हमलोगों का तकिया कलाम होता था। शक्तिमान की तरह गोल-गोल घूम कर उड़ने में कितनी बार चक्कर खा कर गिरे होंगे। रंगोली, चित्रहार और पटना दूरदर्शन से आने वाला मुखिया म्यूजिक शो(हालांकि इसमें सिर्फ एल्बम के गाने आते थे), एकमात्र माध्यम था सिनेमा के गीत देखने का।
लेकिन उस दौर का सबसे बड़ा विलेन था बिजली विभाग। जब दूरदर्शन पर रविवार शाम को फिल्म आती थी, तो मेन सीन के पहले ही बिजली चली जाती थी। नागिन फ़िल्म पूरा नहीं देखने का गम तो जैसे सीने में आग की तरह सालों धधकता रहा। इसी बीच बाबूजी छौमुहान से एक छोटा सा 10 बैंड वाला रेडियो उठा लाये, जिसमें बहुत लंबा एंटीना निकलता था। देखने में बहुत ही आकर्षक और आवाज तो जैसे पानी की तरह साफ आता था। उस क्यूट रेडियो ने तुरंत ही हम सभी बच्चों के दिल में जगह बना ली। उस रेडियो की जो बात सबसे ज्यादा यूनिक थी कि उसमें FM के साथ टीवी भी पकड़ता था। बस फिर तो ऐसा लगा कि लाइफ सेट हो गया हमसबों का।
अब बिजली आये या जाए, हम सब अपनी कल्पना शक्ति के सहारे किसी भी कार्यक्रम का पूरा आनंद लेते थे। एंटीना खिंच कर कान से रेडियो सेट को सटा कर ना जाने कितने दृश्यों को अपने मन के आँगन मे जीवंत किया होगा... वह भी पूरी मंडली के साथ। ऐसा नहीं है की इस बात का हमें कोई मलाल हो। सुविधाओं का आभाव हमें सीखने का, कुछ अच्छा ढूंढ निकालने का हौसला देते थे। तकनीक भले ही उतनी विकसित नहीं थी, पर अपनी बारी का इंतज़ार करना, सब्र रखना, जितना मिले उतने में ही संतोष करना हमने बखूबी सीखा था। वही जिजीविषा हमें जीवन की कई तकलीफों से बचाते चली आ रही है।
मुद्दे की बात ये है कि जब हमारे ही पीढ़ी के लोगों को पेरेंट्स बनने की बारी आयी, तो हमने अपनी अभावों जनित सीख को भूल कर अपने बच्चों को सुविधाओं से लादना ज्यादा पसंद किया। हमारे बच्चों को अब जनमते ही खाने, पीने, सोने, ब्रश करने, पढ़ाई करने या फिर सिर्फ शांत बैठने के लिए भी मोबाइल का ही सहारा चाहिए। स्मार्टफोन औऱ टैब ने तो जैसे बचपना छीन ही लिया है। ये नशा चरस-गांजे के नशे से भी भयंकर विकराल होता जा रहा है।
क्या हम बदले ज़माने को थोड़ा संतुलित नहीं कर सकते? क्या अपना बिता बचपन अपने बच्चों के लिए सीख नहीं बना सकते? क्या हम जुगनूओं का पीछा करना, तितली के फ़टे पंखों की मरम्मत करना, ज़मीन पर खल्ली से इखट्ट-दोखट्ट खींच खेलना, किताबें-कॉमिक्स से दोस्ती करना, बारिश में भींगते पिल्ले के लिए गत्ते का घर बनाना; अपने बच्चों को नहीं सीखा सकते? क्या सचमुच ये सब इतना मुश्किल है?
अगली बार अपना कोई काम निपटाने के लिए अपने बच्चे को फ़ोन सौंपने से पहले सोचियेगा जरूर - "ये सौदा कहीं कुछ ज्यादा महंगा तो नहीं हो गया?"
© शिवांगी शैली

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