Thursday, September 29, 2022

लइका के भागे लरकोरी

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"सब्जी मत खईह एतना तीता आऊ मसाला से लाइका के पेट जरे लगी।"
एक बार फिर????
गला रूंध सा गया 'शारदा' का एक-एक निवाला अटक रहा था गले में। पोते की खूब चिंता है, लेकिन बहू की रूचि बिलकुल मायने नहीं रखती क्या?
नवंबर माह की शुरुआत में शारदा ने अपने जैसे ही सुंदर एक बेटे को जन्म दिया था। वह खुद तो दुबली पतली थी, पर बच्चा एकदम हृष्ट पुष्ट था। एक साल पहले की ही तो बात है जब सुंदर सुडौल बड़ी-बड़ी आंखों वाली शारदा रविंद्र से ब्याह कर अपने ससुराल आई थी। ग्रामीण जीवन की सरलता उसको आकर्षित करती थी।जल्दी ही मातृत्व ने उसकी ज़िन्दगी में भी दस्तक दे दी।
उल्टीयों के दौर ने उसकी हालत खराब कर दी थी, जितना सुन्दर कविता साहित्य में मातृत्व को चित्रित किया जाता है, सच्चाई काफ़ी इत्तर होती है। धीरे-धीरे उसकी मायूसी हावी होती गई और उसे मां की याद आने लगी, काश किसी तरह एक बार वह मायके चली जाए। आधुनिक युग में इसको पोस्ट पार्टम डिप्रेशन कहा गया है। परंतु गांव के भगत जी की सख्त हिदायत थी कि बच्चे के जन्म तक नईहर नहीं भेजा जाए।
भगत जी की दकियानूसी सोच पूरे परिवार पर हावी थी । धीरे धीरे कर शारदा के गहने उतरते गए और उसकी जगह ताबीजों ने ले ली। पर उसे फुर्सत कहां थी स्वयं को देखने की, बच्चे की डिलीवरी सामान्य हो जाए, इसके लिए उसे आराम छोड़ पूरे समय शारीरिक श्रम करने के लिए टोका जाने लगा। उसकी परिश्रम रंग लाई और प्रसव के दौरान सामान्य तरीके से उसने अपने बच्चे को जन्म दिया। बच्चे को देखकर उसकी सारी तकलीफें मानो छू मन्तर हो गईं!
पर यह क्या अचानक ही जैसे शारदा के खाने पर ग्रहण सा लग गया -वात के प्रकोप से बचने के लिए बैंगन, टमाटर, फलियां, धनिया की पत्ती, मूली सभी से परहेज किया जाने लगा और अमूमन यही सब्जियां तो उगती थी उसके खेतों में । शारदा दिन प्रतिदिन दुर्बल होते चली गईं। अधूरी जानकारी व अंधविश्वास के आधार पर ही जीवन यापन की परम्परा रही है। इसी रूढ़िवादिता में बदलाव की नितांत आवश्यकता है।
वर्तमान समय में प्रसव के दौरान महिलाओं में बाहरी ख़ून चढ़ाने की परिपाटी सी बन गई है और यह सब होता है अज्ञानता के कारण। गर्भावस्था और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती ही है। यदि इसे पूरा किया जाए, तो प्रसव चाहे सामान्य हो या सिजेरियन कभी रक्त की कमी नहीं होगी। पर जागरूकता के अभाव में हम स्वयं को ख़तरे में डाल देते हैं।
ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं तो डॉ॰ द्वारा निर्धारित दवाओं का डोज़ भी नहीं लेती कि बच्चा मोटा हो जाएगा तो ऑपरेशन की नौबत आ जाएगी। और होता इसके उलट है। महिला इतनी कमजोर हो जाती है कि वह सामान्य प्रसव करने में असमर्थ हो जाती है फिर नौबत ऑपरेशन की आ जाती है।
एक दिन शारदा की एक समझदार ताई-सास उनसे मिलने आयीं। शहर के रिहाइश ने उनको काफी जागरूक बना दिया था. जब उन्होंने देखा की यहां तो दो वक्त का भोजन भी बड़ी मुश्किल से शारदा को मिल रहा था। पहले की भांति ही सभी को खिलाने के बाद बचा खुचा खाना वह खा लेती थी। बच्चे को दूध मिलता रहे, इसके लिए वह अक्सर माड़ पी लेती थी। उसे स्वयं दूध पीने की आवश्यकता थी पर यह उस के नसीब में कहाँ था। बहरहाल खून की कमी/एनीमिया के लक्षण साफ-साफ दिख रहे थे, उसके और उस बच्चे की बीमार आंखों में।
मोहल्ले की महिलाएं कानाफूसी करती थीं कि रविंद्र बहू का ख्याल ठीक से नहीं रख रहे, उसके परिवार वाले। इन बातों को सासू मां भी भली-भांति भांप रही थी और अपनी करनी पर पर्दा भी बखूबी डालती थी।
"का जनी कइसे अनाज इनकर देहें में नईखे लागत, खाए के कमी बा, कोठी भर भर के त अनाज बा भंडार में।"
ताई-सास के सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने एक दिन भोरे भोरे शारदा की सास/अपनी गोतनी को बुला के खूब डांटा। "इसलिए गाँव में अपनी बेटियां बियाहने में कतराने लगे हैं लोग। तुम अपना समय भूल गयी दुल्हिन? छोप के रखते थे हमलोग, खाली भाँजने के लिए नहीं होता था सुख सम्पति। जब उन्होंने डांट खा कर रुआँसी हो चुकी शारदा की सास को गलती का एहसास करवा दिया, तो फिर शारदा को भी बुला कर डांटा। "दुल्हिन तुम तो आज की पढ़ी लिखी लड़की हो। खुद की सेहत का ध्यान रखना तुम्हारी भी जिम्मेवारी बनती है कि नहीं? डॉक्टर के पास जाओ, उचित सलाह लो औऱ अपने और बच्चे दोनों को तंदरुस्त रखो। इतना ही नहीं कचर पचर में पड़ने की बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं की पढ़ाई फिर से शुरू कर दो। " उसके बाद कुछ ही देर में अपना बोरिया बिस्तर बाँध के वापस अपने घर चली आयीं।
एक साल बाद एक सुहानी सुबह ताई जी के घर एक तार आया। कुछ ही शब्द लिखे थे। मुन्ना और शारदा दोनों स्वस्थ् हैं। शारदा ने बैंक की प्रतियोगी परीक्षा उतीर्ण कर ली है। साथ में एक महिला गैर सरकारी संस्था शुरू किया है, जिसे दोनों सास बहु मिल के चला रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जच्चा-बच्चा के पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु। ताई जी का सीना चौड़ा हो गया। आखिरकार उनकी बातों ने गांव में नयी रौशनी जो फैलाई थी।
© संध्या शेखर
May be an image of 1 person and text that says "लरकोरी ममता को समर्पित कहानी � संध्या शेखर ठेठ पलामू की प्रस्तुति"

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