Wednesday, September 14, 2022

जनार्दन द्विवेदी 'दीन' पलामू के 'संत साहित्यकार'

 

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हिंदी दिवस विशेष
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जनार्दन द्विवेदी 'दीन' की साहित्य साधना अद्वितीय है, उनका व्यक्तित्व अनुकरणीय है और उनका व्यवहार तो आह्लादित करने वाला है। मैं सारी बातें वर्तमान काल में इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि साहित्य साधक कभी भूतकाल में जा ही नहीं सकता है। उनकी लेखनी जितनी भावनाप्रद थी, व्यवहार उतना ही भावनाओं से भरा होता था। एक मुलाकात में ही लोग उनके मुरीद हो जाते और उनके सामने श्रद्धानवत हो जाते थे।
प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा दीन जी के सबसे पुराने शिष्यों में से एक हैं। दोनों के बीच गुरु-शिष्य के अलावा एक और रिश्ता था। वह रिश्ता था मामा-भांजा का। दरअसल दीन जी ब्राह्मण विद्यालय में शिक्षक थे। इसी स्कूल में पं. उमाकांत पाठक भी पढ़ाते थे। उमाकांत पाठक जी प्रो. मिश्रा से छोटे मामा थे। इसी नाते यह रिश्ता पनपा और सदैव बना रहा। प्रो. मिश्रा कहते हैं कि दीन जी एक बार स्कूल में पढ़ाते समय दीपावली पर लेख लिखवा रहे थे। तब उनके शब्द कुछ इस प्रकार थे, 'आज व्यक्ति और ईश्वर में संघर्ष है। ईश्वर चाहते हैं कि अंधेरा फैला देंगे पर व्यक्ति दृढ़ प्रतिज्ञ है कि वह दीपों की जगमगाहट से रोशनी फैला देगा। व्यक्ति सफल होता है, दीपों की जगमगाहट अमावस्या की कालिमा को दूर कर देती है। छात्रों को दीपों के जगमागहट से ही नहीं बल्कि ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान रूपी कालिमा को भी दूर करना होगा।'
प्रो. मिश्रा बताते हैं, 'तब वे जनार्दन द्विवेदी थे। एसएन सिन्हा कॉलेज, औरंगाबाद के छात्र के रूप में फीस माफी के लिए प्रिंसिपल जनार्दन झा 'द्विज' के पास के पास पहुंचे। उन्हें देखते ही द्विज जी ने कहा कि तुम तो बहुत तीक्ष्ण बुध्दि के हो, इस तरह 'दीन' की भांति क्यों खड़े हो। द्विज जी का यह संबोधन छात्र जनार्दन की दिशा बदलने वाला था। उनका फीस तो माफ हुआ ही 'दीन' का उपनाम भी मिल गया।'
दीन जी को 20 मार्च 1994को राधाकृष्ण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब वे डालटनगंज लौटे तो मैं भी पापा के साथ उनके नावाटोली स्थित घर पर गया था। हम दोनों ने उनके पैर छुए तो उन्होंने हमें गले लगाते हुए कहा, 'पूर्वजों की कृपा आऊ तोहिन अइसन के प्यार से ई पुरस्कार हमरा मिलल बा। हमरा ई समझ में नईखे आवत कि हम अइसन का लिखले ही की हमरा एतना बढ़का सम्मान मिलल।'
अब जरा देखिए दीन जी की लेखनी कैसी थी। 'हमारे सिद्ध संत एवं साधक' में वह लिखते हैं, 'भारतवर्ष संत महात्माओं का देश है। सौभाग्य से इन संत महात्माओं के आविर्भाव समय-समय पर इस देश के विभिन्न भागों में होते रहे हैं। सिक्ख गुरुओं के आत्म बलिदानों से पंजाब ही नहीं सारा भारतवर्ष गौरवान्वित हुआ है।...संत शिरोमणि श्री रामकृष्ण परमहंस, श्री विवेकानंद, महर्षि अरविंद आदि संतों के अलौकिक कार्यों और उन संतों की दिव्य साधनाओं से भारतवर्ष महिमान्वित हुआ है।...रैदास, कबीर, नानक, दादू दयाल, दरिया साहब आदि संत-महात्माओं की दिव्य वाणियों से भक्ति और ज्ञान की ऐसी गंगा, यमुना की धाराएं प्रवाहित हुई हैं जिनकी शीतलता से संगत एवं उत्पीड़ित मानवता को त्राण मिला है।' ऐसे शब्द लिखने वाले दीन जी की संगत से भी लोगों को मानसिक पीड़ाओं से त्राण मिलता रहा है। वह श्री अरविंद सोसाइटी, डालटनगंज के अध्यक्ष भी रहे थे।
ओम प्रकाश अमरेंद्र दीन जी के पुत्र और पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं। पुत्र और पत्रकार दोनों के नाते उन्होंने अपने पिता को काफी नजदीक से देखा है। वह बताते हैं, 'बाबू जी के लिए लेखन और निजी रिश्ते सबसे ज्यादा प्रिय थे। जब प्रो. मिश्रा उनसे मिलने आते तो दोनों की बातचीत सदैव पलमूआ में ही होती थी। गुरु-शिष्य और मामा-भगिना के रूप में शुरू हुई बातचीत कब साहित्यिक हो जाती थी यह पता ही नहीं चलता था।'
हिंदी के प्रकांड विद्वान डॉ. रामदयाल पांडेय दीन जी के आदर्श थे। उन पर छायावाद के एक स्तंभ सुमित्रानंदन पंत का काफी प्रभाव था। पंत जी से मिलने वे उनके प्रयागराज स्थित घर पर भी जा चुके थे। वाराणसी में पढ़ाई के दौरान वहां के साहित्याकारों से भी उनके बहुत नजदीकी रिश्ते थे। मेदिनीनगर (डालटनगंज) के समकालीन साहित्यकारों स्व. जगदीश नारायण दीक्षित, स्व. ज्योति प्रकाश, स्व. डॉ. जगदीश्वर प्रसाद, स्व. डॉ. ब्रजकिशोर पाठक, स्व. दीनेश्वर प्रसाद 'दीनेश' के वे काफी प्रिय थे। प्रो. कमला कांत मिश्र, प्रो. सुभाष चंद्र मिश्र, हरिवंश प्रभात जैसे आज के साहित्यकारों को भी वे स्नेह देते थे। पत्रकारों में वह ज्यादा समय गनौरी ठाकुर, करुणा सिंधु दास गुप्ता, रामेश्वरम, महेंद्र नाथ त्रिपाठी, सुरेंद्र सिंह रूबी के साथ गुजारते थे। मेरी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए तो वे आदर्श थे ही।
दीन जी का लेखन अध्यात्मिक होने के साथ-साथ यात्रा वृत्तांत भी होता था। एक जगह वे लिखते हैं, 'अपनी हिमालय यात्रा के क्रम में कई संत महात्माओं के पावन दर्शन के सौभाग्य प्राप्त हुए थे। उन संतों में श्री बदरी विशाल के सर्वश्री मौनी बाबा, गुदड़ी बाबा और श्री केदारनाथ के श्री फलाहारी बाबा के नाम उल्लेखनीय हैं। इन संतों की विकट साधनाओं को देखकर हृदय आश्चर्य से भर उठता है।'
दीन जी की अध्यापकीय यात्रा 1950 में बिहार के औरंगाबाद जिले के ओबरा हाई स्कूल से शुरू हुई। इस यात्रा के पड़ाव जनता उच्च विद्यालय, बिश्रामपुर, ब्राह्मण उच्च विद्यालय, डालटनगंज, रामा साहू उच्च विद्यालय, गढ़वा रहे। रामा साहू उच्च विद्यालय के तो वे प्राचार्य भी थे। जुलाई 1954 से जून 1955 तक वे बीएड प्रशिक्षण के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय भी गए। 1955 से 1961 तक ब्राह्मण विद्यालय में रहने के दौरान उन्होंने यहां से निकलने वाली पाक्षिक पत्रिका का संपादन भी किया। बाद में वे कोलकाता से निकलने वाले 'दैनिक विश्वामित्र' के धार्मिक स्तंभों के प्रमुख लेखक और पलामू के जिला संवाददाता रहे।
दीन जी की पहली पुस्तक 'अश्रु कण' 1956 में छपी थी। इसी साल 'दुपहरिया के फूल (पांच कहानियों का संग्रह), 'समाधि के फूल' (दो ऐतिहासिक कहानियां), 'देवलोक की ओर' (हिमालय यात्रा वृत्तांत) पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 'देवलोक की ओर' का द्वितीय संस्करण 1990 में आया। 1992 में 'पतझड़' (कहानी संग्रह), इसी साल पूज्यवाद अघोरेश्वर भगवान राम की जीवन यात्रा का भी प्रकाशन हुआ। दीन जी की सबसे चर्चित कृति 'हमारे सिद्ध संत एवं साधक' का प्रकाशन 1993 में हुआ। पलामू के इस महान साहित्यकार का जन्म 15 नवंबर 1924 में बिश्रामपुर के तीसीबार गांव में और निधन डालटनगंज में 13 मई 1999 को हुआ था।
हिंदी दिवस के मौके पर इस संत-पत्रकार को विनम्र श्रद्धांजलि।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा

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