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भादो इन्जोरिया के चउदहवां दिन पलामू के हर घर में अनंत भगवान के पूजा होता है। शायदे कोई घर होता हो, जहां अनंत पूजा नहीं करल जाता हो।
अनंत पूजा के विधी भी हमिन पालमुवा लोग तरी एकदम सिंपल है। सबसे पहले तो मेहुटी वाला खीरा बाजार में ढुंढल जाता था। चूंकि आज के दिन खीरा के डिमांड जादे रहता है और सप्लाई कम, सेहिसे खीरा भी हीरा के मोल मुंहमांगा रकम दे के खरीदल जाता है। साथ में चउदह गांठ वाला अनंत धागा भी खरीदल जाता है, जो सूती या रेशम का बना होता है।
परसादी में आज के दिन देहात में पूड़ी, केरा-दुधउरी और पूवा बनना फिक्स रहता है, और शहर में तो जानबे करते हैं कि आलस में खाली फल खरीद के भी काम चला देवल जाता है। अब जेकर जेतना शक्ति, ओतना भक्ति।
आज के दिन सुबह-सुबह घरे के सबे बेक़त खाली पेटे नहा-धो के चकाचक कपड़ा में एक साथ पूजा में शामिल होता है। जै आदमी, ओतना अनंत के खीरा के मेहुटी में बांध के पंचामृत में मथल जाता है और कहल जाता है-
"का मथत ही? खीर (क्षीर) समुंदर।
का खोजइत ही? अनंत गोसाईं।
पइलs? पइली। माथा चढ़ाऊँ
।"
पूजा के बाद बस अनंत धो के, बांह में बाजूबंद तरी बांध लेवल जाता है और फिर वक़्त होता है धूमच के पूड़ी तोड़ने का। आप भी अगर अनंत बांध के पूड़ी तोड़ना शुरू कर चुके हैं, तो अपना अनंत पूजा का अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर से शेयर करें। आप सबों को अनंत चतुर्दशी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
© सन्नी शुक्ला


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