हमिन एतना बम्मड़ थे कि प्यार से समझावे वला गुरुजी के कुछु सुनबे नहीं करते थे। हमिन के उहे गुरुजी प्यारे लगते थे, जे कचरमकुट रेंगन के कूटे में विश्वास रखते थे। खौफ का आलम ई था कि अगर बाहरे भी कहीं बजार दने गुरुजी दिख गए, तो हमिन कहीं साइड में दुबक जाते थे। वरना एकर कउनो गारंटी नहीं था कि फिर से रेन्यूवल ना हो जाये।
हमिन घड़ी खाली पढ़ाईये में अव्वल होखे से विद्यार्थी के पहचान नहीं होता था। स्कूल में पढ़ाई के साथे-साथे संस्कार और तमीज के भी शिक्षा देवल जाता था। उ घड़ी के गार्जियन लोग गुरजी से भेटाएँ पे कहबो करते थे कि-" पढ़ता नहीं है, तो मारते काहे नहीं है एकरा बढ़ियां से" । बस एतना काफी था कि गुरुजी के तो जइसे लाइसेंस मिल जाता था, लइकन के कुटे ला। बेंच पे खड़ा करना, मुर्गा बनाना, क्लास के बाहरे निकालना; ई सब जइसन बेइज्जती करे वाला मामूली सजा में ना हमिन के गुरुजी विश्वास रखते थे और ना हमिने के ई सब हल्लुक सजा से कुछु फरक पड़ता था।
मारे ला स्पेशल रकम के छड़ी मंगवाल जाता था(ज्यादातर जेकर कुटाई होता था, उहे छड़ी लावे जाता था और महान बने में सबसे बढ़ियंक्का छड़ी तोड़ कर लाता था)। हर गुरुजी के एगो पसंदीदा छड़ी होता था। बेंत के छड़ी हेडमास्टर साहेब के हांथ में परमानेंटे रहता था और खुशनसीब रेंगन बेंत से पिटाता था।लेकिन ज्यादातर के किस्मत में सिनवार और खजूर के छड़ी देह पे बजे ला लिखल रहता था। हमिनियो कहियो गुरुजी के मार के तनिको बुरा नहीं मानते थे। अरे अगर काम भर पिटइबो नहीं किये, तो देह कइसे मजबूत होता।
आज हम सभी जिस भी मुकाम पर पहुंच पाए हैं, उसमें हमारे गुरुजी का विशेष स्नेह और आशीर्वाद का सबसे बड़ा हांथ रहा है। उस चिठ्ठी पत्री के जमाने में भी दूर रहने के बावजूद गुरुजी का आशीर्वाद हमेशा बना रहा था। स्कूल खत्म होने के दशकों बाद भी गुरुजी एक-एक विद्यार्थी को नाम से याद रखते थे और उनका हाल-चाल लेते रहते थे। वर्तमान दौर में देख लीजिए, कितने शिक्षक और विद्यार्थी मोबाइल फोन होने के बावजूद एक दूसरे के लिए चिंतित रहते हैं?
आज-कल सूचना क्रांति के युग में शिक्षा एक पेशा भर रह गया है और सभी विद्यार्थियों को शिक्षक एक ही भेंड़चाल में हांकते रहते हैं। पैसे पर टिकी शिक्षा व्यवस्था, इतनी सतही है कि कोई शिक्षक अगर चाहे भी, तो किसी विद्यार्थी पर अलग से कैसे ध्यान दे पाएगा। बच्चों को मारना तो दूर, अगर शिक्षक जोर से डांट भी दे, तो आजकल के सुकुमार बच्चे डिप्रेशन में चले जाते हैं और बेचारे शिक्षक की खैर नहीं रहती। नतीजा शिक्षक भी अपनी क्लास खत्म करने पर ही ध्यान देने को प्रोफेशनलिज़्म समझते हैं।
अभी दो दिन पहले ही एक वायरल वीडियो में देखा कि पलामू के स्कूल के कुछ बच्चे अपने शिक्षक को पेंड़ से बांध कर धमका रहे थे और एक लड़का लाइव वीडियो बना रहा था। मने की गुरुजी का डर तो है ही नहीं आज कल के रेंगन में।
ये सब आज के मॉर्डन गार्जियन लोगों का ही करल धरल है, जो आपन बच्चा को आँचल में छुपा कर रखते हैं। अरे भाई, शिक्षक का डांट और मार एक नालायक बच्चा को अच्छा इंसान बनाता है। ये एक सदियों से आजमावल विधि है और एकर कउनो साइड इफ़ेक्ट नहीं है। बाहर की दुनिया बहुत जालिम है महाराज, आप आपन बच्चा के नाजुक बना के, ओकर सबसे बड़हन दुश्मन बन रहे हैं। लइकन को बरियार बनाइये, फूलकुमार नहीं।
आप सभी लोगों से निवेदन है, इस शिक्षक दिवस पर अपने-अपने गुरुजी के सम्मान में अपनी कुटाई का अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर से शेयर करें।
लेखक: नब्बे के दशक का एक पलमुवा विद्यार्थी
© ठेठ पलामू

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