Saturday, September 17, 2022

बिसकरमा पूजा है, गाड़ी धोये कि नहीं

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जब हमनी रेंगा थे, तो दुगो पुजा के पुरजोर असरा देखते थे, सरस्वती पूजा और विश्वकर्मा पूजा। काहे की इ दुनो पूजा में हमिन के करे ला कुछ ना कुछ मिलिए जाता था , बाकि में तो लइका बुझ के कोई भेलुये नहीं देता था। एगो आउ बात था कि दुनों पूजा में बुंदिया के प्रसादी दबा के मिलता था (अब ई मत कहिएगा की आप बिना बुंदिया चलउले विश्वकर्मा पूजा कर देते हैं)।
विश्वकर्मा पूजा के हमनी बिसकरमा पूजा कहते है। हर साल ई पूजा 17 सितंबर के ही आता है। तिल-सकरात, बिसो आउ बिसकरमा पूजा; तीने गो पूजा हम जानते हैं जेकर अंग्रेज़ी और हिंदी दुनों कलेंडर में एक्के दिन पड़ता है। मजाल हैं कि कउनो पंडित जी कंफ्यूज कर दें कि पूजा आज है कि कल।
सनातन धर्म में बाबा विश्वकर्मा की पूजा का विशेष महत्व है। बाबा विश्वकर्मा को दुनिया का सबसे पहिला इंजीनियर कहल गया है। कहल जाता है कि भोलेबाबा के तिरसुल आउ विष्णु भगवान् का सुदर्शन चक्र; विश्वकर्मा बाबा ही बनाये थे। सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग में सोने की लंका, द्वापरयुग में द्वारकानगरी आउ कलयुग में पूरी जगन्नाथ मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण-बलराम-सुभद्रा की मूर्ति का निर्माण भी इन्हीं के हाथो माना जाता हैं। देखिये प्रभु की लीला अपरम्पार है, उनके उपलब्धियों की सूची हम तुच्छ प्राणि लोग क्या बना पाएंगे। हमलोग तो बस इहे चाहते हैं कि बाबा कि कृपा दृष्टि हमसब पर सदा बनी रहे,बस।
बिसकरमा पूजा घरे-घर होये वाला पूजा है। काहे की सबके घर कुछ न कुछ कल-पुर्जा, अवजार, पहसुल, कोड़ी-कुदारी-टांगी, हल-जुआठ, साइकिल; आउ आधुनिक घर में तो बिजली से चले वाला ढेरे उपकरण है जैसे मिक्सी, पंखा, टीभी, कंप्यूटर; वाहन में मोटर-साईकिल, स्कूटर, कार रहबे करता है।
कार-जीप-ट्रक के ड्राइवर सब तो पूजा के दिन गाड़ी के नहर-पोखर में ले जा के खूब पखार-पखार के धोता है। फिर झालर-चुनरी से सजा के गाड़ी एकदम चकचका देता है। मेरे पास जब रेंजर सइकिल था (जेकरा बड़ी जिद करला पर बाबूजी लिये थे, उहो तब तक नहीं जब तक कि हम मैट्रिक पास नहीं कर लिए), ओकरा बिसकरमा पूजा के दिन रगड़-रगड़ के साफ़ कर के एक-एक स्पोक चमका देते थे; मजाल था कि कउनो चित्ति दिख जाए, बिसकरमा पूजा पे। फिर माँ अपना सिलाई मशीन और बाबूजी का स्कूटर के साथे हमर साइकिल के भी सिंदूर लगा के और अगरबत्ती देखा के पूजा कर देती। आउ हम नहा-धोवा के, नारियल के एक्के पटकन में फोर के चक्का पे पानी चढ़ा देते।
खैर घर में पूजा हो गेला पे, ऊपरी बेला में हमनी सब लइकन, घर के नाम मात्र के गार्जियन (जेकर में बचपना कूट-कूट के भरल रहता था, ताकि हमनी के मनमानी पे अंकुश ना लगल रहे) के साथे चिमकी (प्लास्टिक थैली) ले के निकल जाते पुरे शहर में बाबा बिसकरमा के दर्शन करे आउ बुंदिया कलेक्शन करे। कहूँ छेनी-हथौड़ी लिए हांथी पर सवार बाबा के विकराल दर्शन होता, तो कहूँ गैरेज में फोटो पर ही पूजा हो गया होता। हाँ, "उ घरी बिजली ऑफिस में बड़ा भव्य आयोजन होता था", एक बात आउ जउन पंडाल या गरेज में 2 बजे तक पूजा नहीं होता था, उ से हमनी बड़ी खिसियाते थे, काहे की हमनी सोचते थे कि परसादी बांटे के चलते भइवन लेट से बाबा के पूजा करता है। बिसकर्मा बाबा के नाम पर हमनी खालसा गैरेज, विश्वकर्मा गैरेज, बिजली ऑफिस , रांची रोड, पांकी रोड, इंजीनियरिंग रोड, इन्कमटैक्स रोड पूरा शहरे मख देते थे। साँझ के केकर केतना प्रसादी जमा हुआ है देखल जाता, फिर मिल बाँट के बाबा का प्रसाद पूरा परिवार खाता। ये तो बचपन था और बचपन हर गम से बेगाना होता हैं.......
पर जब तक आप किसी कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते, उस कार्यक्रम के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर भी आपको उतनी संतुष्टि नहीं मिलती। पूजा पाठ को ही ले लीजिए; पंडाल बनाने में, सजाने सवारने में, प्रसाद बनाने, पूजा में बैठने में, प्रसाद वितरण में, हवन में जब हम अपना योगदान देते हैं, तो पूजा कितना आनंददायक और फलदायक लगता है। पर आज किसी भी चीज़ का टेंडर दे देने का रिवाज़ बन गया है, चाहे काम हो या पूजा; बस टेंडर निकल देना है। पंडाल बनाने का टेंडर, मूर्ति बनाने का टेंडर , बुंदिया/प्रसाद बनाने का टेंडर, प्रसाद बाँटने का टेंडर, मूर्ति विसर्जन का टेंडर, यहाँ तक की पूजा में बैठने का भी टेंडर लोग दे दे रहे हैं। बड़ी प्रोफेशनल होते जा रहा है सब जी, काम हो या पूजा पाठ सब जगह टेंडर सिस्टम दीमक की तरह फ़ैलते जा रहा है। काश किसी इंसान को खुश रहने का भी टेंडर दे देते ये लोग।
सहकर्मी-बंधुओं के सक्रिय योगदान से हमारे DVC ऑफिस में भी विश्वकर्मा पूजा का आयोजन किया गया है। बाबा से हम सभी यही कामना करते है कि प्लांट के कल-पुर्जो के साथ-साथ, हमारे दिमाग के कल-पुर्जे भी सुचारू रूप से काम करते रहें। इस विश्वकर्मा पूजा पर प्रार्थना है, हम सभी शून्य दुर्घटना लक्ष्य को हासिल करते रहे।
प्रेम से बोलिये विश्वकर्मा बाबा की ...... जय
© Er. Awnish Prakash
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