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धूप में बारिश होते देखा, तो अनायास बचपन की एक कहावत याद आ गयी कि जरूर कहीं किसी सियार का बियाह हो रहा होगा। लगे हाथ यूट्यूब में सियार-सियारिन का बिरहा गीत बजा दिया, तो माहौल पूरा सियारमय हो गया। सियार अपनी जिंदगी में एक ही बार जोड़ी बनाता है और आखिरी वक्त तक निभाता है। इसीलिए उसकी शादी पर प्रकृति अपनी अनोखी छटा बिखेरती है।
अचानक कौतुहल हुआ कि सियार देखे बहुत दिन हो गया 'यार'। बाबूजी से पूछा कि आखिरी बार सियार कब देखे थे, तो उन्हें भी हाल का कोई समय याद नहीं आया। एक समय था कि डाल्टनगंज में हमारे घर के पीछे खेत में सियार दिख जाया करते थे। हालांकि गांव में अभी भी इक्का-दुक्का सियार दिख जाते हैं, पर वो शाम होते ही डरावनी हुवाँ-हुवाँ की आवाज, जिसके डर से शहर के बच्चे सप्ताह भर का प्रोग्राम एक दिन में ही निबटा कर भाग जाते थे, अब सुनने को नहीं मिलता।
एक सत्य घटना बतलाता हूँ। तकरीबन 25 साल पहले मेरे दो मामा ग्रीष्मकालीन पर्यटन पर मेरे गांव पधारे। पूरा दिन तो थ्रिल-एडवेंचर चलता रहा, पर शाम होते ही हुवाँ-हुवाँ की आवाज से दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, बेचारों का पहला अनुभव था सियार की आवाज सुनने का। अगले दिन तड़के ही दोनों 407 सवारी गाड़ी से गांव को हमेशा के लिए अलविदा कह शहर को प्रस्थान कर गए।
मुझे याद नहीं कि दादी-नानी की कहानी कभी भी बिना सियार के शुरू होती थी। सियार को हमेशा कहानी में चतुर और मंत्री के रूप में दिखाया जाता था। पंचतंत्र में भी रंगा सियार की कहानी तो आप सबने जरूर पढ़ी होगी। बाद में नंदन-चंपक में इतनी कहानियां पढ़ी पर अधिकतर फैंसी जानवर ही दिखते थे, अपना पलमुवा सियार का दर्शन नहीं होता था। फिल्मों में जरूर गाहे-बेगाहे ये डायलॉग सुनने मिल जाता था कि "जब गीदड़ की मौत आती है, तो वो शहर की ओर भागता है" या फिर "ये गीदड़भभकी किसी और को दिखाना"। बाद में थोड़े समय के लिए ही सही पर शक्तिमान में डॉ जैकाल के दर्शन हुए।
सियारिन को देहात में फ़ेंकार भी कहा जाता है और उसका रोना बहुत ही अपसगुन माना जाता है। दरअसल सियारिन का आवाज नर सियार से थोड़ा कमजोर होता है और रोने जैसा साउंड करता है। आज भी कोई बच्चा अगर देहात में बहुत देर तक रोये, तो उसे कहेंगे कि काहे फ़ेंकरत हें एतना देर से। कुछ साल पहले तक कुछ भी गलत होने पे सारा आरोप सियारिन पर डाल दिया जाता था। अकसर लोग ये कहते मिलते कि कल राते फ़ेंकार फेकरत रहे, इहे से हो गइल। बाद में शहरीकरण के कारण फ़ेंकार का स्थान कुत्तों के रोने को दे दिया गया।
अभी जितिया पर्व में चिल्हो-सियारो की पूजाई में भी सियार का वर्णन सुनने को मिलेगा। सियार हमेशा से हमारी संस्कृति, लोककथा का हिस्सा रहा है लेकिन अब पर्यावरण के बिगड़ने का ऐसा असर पड़ा कि आज की पीढ़ी सियार शब्द से भी अनजान है। कुछ दशक पहले तक 'सियारमरवा' लोग गांव में सियार के खाल के लिए, उनका शिकार करते चलते थे। अब तो सियार के साथ-साथ सियारमरवा भी नजर नहीं आते हैं। पलामू के देहात में आज भी कुछ इलाकों के खेतों में मकई और केतारी खाते सियार दिख जाते हैं, लेकिन उनकी घटती संख्या के कारण अब सियार दिखना दुर्लभ ही माना जा सकता है।
जब भी धूप और बारिश एकसाथ देखें, तो याद रखें कि कहीं सियार की शादी हो रही है। आपके पास भी सियार से जुड़ी कोई किस्सा कहानी या बातें हो, तो कमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें।
© सन्नी शुक्ला
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