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दशहरा चढ़ते आपन गांव जाएला मन ललचने लगता हैं। अब का कहे … एक समय उ भी गुजरा है जब डाल्टेनगंज के पूजा पंडाल हमनी कहिनो पूरा देख नही पाते थे। जब गांव निकलते तो पंडाल बनते रहता आउ आते तो पंडाल खुल रहा होता। लेकिन जे कहिए एकर मलाल भी हमनी के कहिनो नहीं रहा, उ घरी के बाते कुछ और था।
चढ़ते दशहरा सब आपन-आपन निकसार (मुख्य दरवाजा) पर बुरी नज़र से बचे खातिर टिका-भूका (काला-लाल स्याही से बना एक पैटर्न) बनावे लगता था। डाइन-डोकाइन से बचे ख़ातिर तो लइकन के डाड़ (कमर) आउ गरदन में बड़का-बड़का ताबीज़ लटकल रहता था। दादी कहती थी- ‘चढ़ते दशहरा डाइन-डोकाइन (नकारात्मक ऊर्जा) के बाण तेज़ हो जाला।’ साल भर में कहिनों कपड़ा लियाये चाहे नहीं दशहरा में लियाना फिक्स था। बाकि एक बात था, उ घरी दशहरा में जाड़ लगे लगता था जी, न जनि अब दइबा के का हो गया है, सब मौसमे बदल गेल है। मने का कहे हमरा तो उ घरी इहे टेंशन रहता था कि ‘नया कपड़ा जे बाबूजी लेतथी, उ तो देखइबे ना करतइ काहे ही उपरे से वहीं पुरनका सूटर (स्वेटर) चढ़ावे ला पड़ी।‘ सूटरो तो लइकन के वइसने रहता था , आधा बाँह चबा-चबा के भरबाहिया के अधकटिया बना देते थे।
दशहरा में आपन गांव जायेके तलतली हमनियें के नहीं, बाबूवो जी के बराबर होता था। काहे कि बाबूजी, आपन गांव में दशहरा के अवसर पर में होए वाला नाटक (ड्रामा) के डायरेक्टर थे। लेकिन जे कहिये उ घरी बड़ी जूनून था सबमें ड्रामा को लेकर। करीब एक महीना पहिले ही बाबूजी गांव जा के पाठकर्ता में पाठ बाँट देते थे। खेत-खलिहान, नदी-ढोड़ा या नौकरी पर जे जहां रहता उहइ आपन पाठ रटते रहता। कलाकार कोई बहरी नहीं आपने गांव के लोग रहते थे, गांव में आपन आपन टैलेंट दिखावे के इहे न एक मौका था। उस समय बिजली तो आपन गांव में एक सपना था, पेट्रोमैक्स लाइट से ही आयोजन होता था, फिर भी अपना पंचायत भवन का परिसर खचाखच भर जाता था। सत्यवादी राजा हरिशचंद्र, अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, महाराजा भरथरी ये कुछ ऐसे नाटक थे जिनकी पुनरावृति होते रहती थी।
खैर, जब हमनी के गांव जाए के दिन ठेकान ठीक हो जाता तो दू दिन पहिलही से बाबूजी गांव वाला 407वा (टेकर बस) के पता करते रहते, आखिर गांव की एकलौती गाड़ी न थी; मोहन सिनेमा के पीछे तालाब के पास खड़ा होती थी। चलिए जइसे तइसे इंतज़ार की घड़ी खतम होती और हमलोग करीब दिन के 10 बजे तक गांव के लिए निकल जाते। रेड़मा चौक पर बाबूजी रिक्शा लेते, जेकर में पूरा परिवार बैठते, बाबूजी के गोदी में हम, माई के गोदी में छोटकी बहिन आउ पायदान पर दीदी। हां ओवरब्रिज के चढ़ाई में बाबूजी उतर के रिक्शा को धक्का लगाने लगते थे। बस स्टैंड पहुंच के जब 407वा का दीदार होता तो मत कहिए विंड शील्ड पर ‘डाल्टेनगंज से खैरादोहर भाया छतरपुर’ लिखल बोर्ड देख के जे होता खुशी उ तो मने में दबा रह जाता। उस समय दिमाग में एक बात आउ आता था कि जब गाड़ी के दाम 407ते रुपया है, तबो गांव में एके-गो काहे है। खैर हमलोग गाड़ी के अंदर सीट पकड़ के बैठ जाते, और बाबूजी बड़ी प्रसन्नचित भाव से ड्राइवर से पूछते- ‘का बाबूराम कए बजे गाड़ी खोलबही ’
ड्राइवर बाबूराम चबा रहे पान के थूक को अंदर घोटते हुए कहता- ‘ढ़ाई बजे गुरूजी, तबतक तनी पिछलका चकवा के पंचर बनवा के आवइत ही’
अक्सर गाड़ी में कुछ न कुछ खराबे रहता था। लगभग 3 घंटा गाड़ी में अपनी सीट की रखवाली करते, ऊबने लगते थे हमलोग, तभी बाबूराम, उचक के ड्राइवर वाला गेट से गाड़ी के अंदर दाखिल होता, आउ झट से गाड़ी स्टार्ट कर देता। बड़ी धुरफनिया ड्राइवर है बाबूराम जी, 15 मिनट गाड़ी स्टार्ट करके छोड़ दिया, इंजन के साथे साथ हमनियों के बॉडी के कल-पूर्जा फ्री कर दिया, चलिए फिर भी ससमय गाड़ी डाल्टेनगंज से खुल ही जाती थी, बस कांडा घाटी सही समय विश्वकर्मा जी पार करवा दे, ओकर बाद तो चैगौना बाबा हइये है।
‘तनी लगाव हो बाबूराम…..!, दुर्गा माई वाला कैसेट’ करमा के साव जी ने अपनी फरमाइस रखी
‘एक दम न मालिक, भरत शर्मा वाला सातों रे बहिनिया सुनावइत न हिवा, अमानत तो पार करे दा’ बाबूराम गाड़ी को चौथे गियर में ठेलते हुए टेप के प्ले बटन को चिप देता।
‘लाले रंग सेनुरा बा, लाले रंग पुतरिया हो कि लाले रंगवा नऽ
मैया के तन पर चुनरिया कि हो लाले रंगवा नऽ ...... ’
गाड़ी के अंदर तो स्पीकर हइये था, उपर कैरियर में भी चोंगा लगा था, बाकि पसिंजर के सर-सामान से अंदर वाला स्पीकर पूरा दब गेल था। बाहर वाला चोंगा के आवाज़ अंदर तक घुस रहा था; पसिंजर और राहगिर सब भक्तिमय हो गया।
‘बाबूराम, छतरपुर में मनोज के दुकान पर ड्रामा के पोशाक आउ पर्दा रखल हsवा उठा लिहा ‘ लखन चाचा ने ड्राइवर को स्मरण कराया ।
सवारी को चढ़ाते उतारते 50 किलोमीटर का सफ़र हमलोगो लगभग दिन भर में तय किया करते, अब गोधूलि बेला की शुरुवात हो चुकी थी, गाड़ी पक्की सड़क को छोड़ कच्ची संकरी रास्तों में बढ़ने लगी थी, सड़क के दोनों तरफ बॉउंड्री बनाये थेथर और पुटुस के पौधे बस के खिड़कियों से टकराने लगे थे, और अब हम अपने गांव पहुंच चुके थे। थोड़ी ही देर में पंचायत भवन आने वाली है, हमलोग बस के गेट से लग खड़े हो जाते और फिर गाड़ी को पीछे से अलविदा करते। अरे …..! दादा दुरा पर मवेशियों को गवत लगा रहे थे, दादी भी गाड़ी की आवाज़ सुन सड़क तक आ गई। एक दूसरे को देख के उस वक़्त जो खुशी के भाव झलक रहे थे उसे शब्दों में कैसे पिरोया जाय यह हम नहीं बता पा रहे……..!
गांव में कदम रखते ही दिन भर की थकान छू मंतर हो गई थी, तभी राजकुमार दौड़ते हुए आया- ‘चल मुन्ना भाई दुर्गामाई के मूर्ति देख के आवइत ही.......... ………………………. ,
पहिले के दिन भर के सफ़र को आज संसाधनों के बदौलत घंटो में तय किया जाता है,
पर क्या कोई दशहरा पर अपने गांव में गोड़लगी करने जाता है….?
साल भर के रुसल जब रमेश चाचा भी दशमी के दिन गोड़लगी करने आ जाते, फिर हम भला कैसे न उनको गले से लगाते।
दशमी के घर-घर खूब बड़ो का आश्रीवाद मिलता, साथे निमकी, गटौरी आउ पिआव भी मिलता।
मूर्ति-विश्रजन तो अपने गांव में एकादशी को होता, माई को विदा करके भला कैसे हमसे गौड़लगी होता…..!
प्रेम से बोलिये दुर्गा महारानी की ..... जय
© अवनीश प्रकाश

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