-आज 120वीं जयंती है जीएलए कालेज के संस्थापक की
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पलामू में उच्च शिक्षा का दीया जलाने वाले महान व्यक्तित्व का नाम है गणेश लाल अग्रवाल। उन्होंने 1954 में जो ज्योति जलाई थी आज उससे कई दीपक जल चुके हैं। इनका प्रकाश चारों ओर फैल रहा है। जिस शहर या जिले में एक भी कॉलेज नहीं था वहां आज इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज तक खुल चुके हैं। इन संस्थानों से पढ़े छात्र केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्री से लेकर केंद्रीय व राज्य की प्रशासनिक सेवा में बड़े पदों पर रह चुके हैं। प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर, अधिवक्ता, पत्रकार से लेकर समाज का कोई तबका ऐसा नहीं है जहां यहां से शिक्षा पाए विद्यार्थी कार्यरत नहीं हैं।
आइए, कोई 67 साल पहले लौटते हैं। थोड़ी कल्पना कीजिए, थोड़ा यथार्थ को महसूस कीजिए। तब जिले (अब प्रमंडल) के छात्रों के लिए कॉलेज की पढ़ाई किसी सपने की तरह था। हाई स्कूल डालटनगंज, गढ़वा और लातेहार में तो कई थे पर इसके बाद की शिक्षा के लिए कोई संस्थान नहीं था। जिन बच्चों का जन्म संपन्न परिवारों में हुआ था वे तो रांची या पटना चले जाते थे पर गरीबों के लिए कोई जगह नहीं थी। कम पैसे वाले लोग थोड़ी हिम्मत करके अपने बच्चों को किसी तरह बगल के औरंगाबाद (तब यह गया जिले का हिस्सा था) में पढ़ने के लिए भेजते थे। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग मैट्रिक पास करने के बाद उच्च शिक्षा से वंचित हो जाते थे। यह पीड़ा यहां के लोगों को सालती थी। यह पीड़ा ऐसी थी, जिसका निदान किसी के पास नहीं था।
शहर में गणेश लाल साहू नाम के बड़े व्यवसायी थे। इन्हें गणेश लाल अग्रवाल के नाम से भी जाना जाता था। इनके पास सुख से सभी साधन थे, बस कमी थी तो संतान की। उन्हें पता चला की जपला के पास कामदारपुर गांव में रघुनंदन सिंह जी के घर बड़े ज्योतिषी रहते हैं। ये ज्योतिषी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज में भी रह चुके थे पर नेता जी के विदेश चले जाने के बाद कोलकाता से औरंगाबाद स्थित अपने गांव केताकी जाने के क्रम में रघुनंदन बाबू से मिले थे और फिर यह उनके गांव पहुंच गए। ज्योतिषी का नाम था पंडित नंदकिशोर पाठक।
पाठक जी के बेटे हैं पंडित विजयानंद सरस्वती। ये भी नामी ज्योतिषी हैं और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक हैं। सरस्वती जी को अपने पिता और गणेश बाबू की मुलाकात और फिर गणेश लाल अग्रवाल कॉलेज के स्थापना की पूरी कहानी याद है। उनकी जुबानी, 'गणेश बाबू पुत्र की कामना लिए पिता जी के पास सपत्नीक पहुंचे थे। पिताजी ने कुंडली देखी और साफ कहा कि आपके भाग्य में संतान सुख नहीं है। इस पर गणेश बाबू खफा हो गए और डालटनगंज लौट आए। हालांकि कुछ वर्षों के बाद उन्हें वास्तविकता का एहसास हुआ तो उन्होंने पिता जी को डालटनगंज बुला लिया और उनके रहने की व्यवस्था वर्तमान के राजमणि धर्मशाला में की।'
कॉलेज कैसे खुला, इस पर सरस्वती जी कहते हैं, 'मेरे पिता जी सहित कई लोगों के कहने पर गणेश बाबू ने हाई स्कूल की स्थापना कर दी थी। इसके बाद बड़ा सवाल था कि यहां से मैट्रिक करने वाले बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए कहां जाएंगे। इस स्कूल में महुगांवा के रामनाथ पांडेय संस्कृत पढ़ाते थे। उन्होंने बच्चों की आगे की पढ़ाई की चिंता पिता जी से बताई तो उन्होंने कहा कि सुबह में गणेश बाबू और वह एक जगह बैठ कर गप करते हैं आप उसी समय बच्चों को लेकर आ जाइएगा। गणेश बाबू के सामने क्या सवाल पूछना है इसकी भी जानकारी उन्हें दे दी गई।' अगले दिन सुबह गणेश बाबू और पाठक जी बैठ कर बात कर रहे थे। तभी वहां करीब तीस बच्चे नारे लगाते हुए पहुंच गए। अब सरस्वती जी के शब्दों में, 'पिता जी ने छात्रों से पूछा कि आपलोग किसके बच्चे हैं? बच्चों ने समवेत स्वर में कहा 'गणेश के'। बस यहीं से कॉलेज की स्थापना की नींव पड़ गई। पिता जी ने गणेश बाबू से कहा कि देखिए इतने बच्चे आपके हैं। आप इनके लिए अपने नाम पर कॉलेज खोलिए, सभी के सर्टिफिकेट पर आपका नाम होगा। ऐसा होने पर आप अमर हो जाएंगे। फिर क्या था गणेश बाबू ने कॉलेज खोलने की हामी भर दी और जिले में उच्च शिक्षा का द्वार खुल गया।'
गणेश बाबू खुद स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे पर कई स्वतंत्रता सेनानी उनके मित्र थे। इन्हीं मे से प्रमुख थे यदुवंश सहाय, गणेश प्रसाद वर्मा और राजकिशोर सिंह। यदु बाबू के बेटे बृजनंदन सहाय 'मोहन बाबू' और गणेश बाबू के बेटे सतपाल वर्मा ने मुझसे बातचीत में बताया था कि गणेश लाल अग्रवाल जी ने हम दोनों के पिताजी के 1942 आंदोलन में जेल में रहने के दौरान परिवार की काफी सहायता की थी। मोहन बाबू कहते हैं, 'गणेश बाबू अपनी गाड़ी घर से दूर छोड़कर रात होने पर बाबू जी से मिलने आते थे और आंदोलन में मदद करते थे।' जब कॉलेज खोलने की बात तय हो गई तो उन्होंने इसके लिए जो दिन तय किया वह काफी ऐतिहासिक था। यह दिन था 15 अगस्त यानी देश की आजादी का दिन और साल 1954। कॉलेज खुलने के बाद पहले प्राचार्य के रूप में कैप्टन जीपी हजारी की नियुक्ति हुई। 1955 में प्रो. जगदीश नारायण दीक्षित इस कॉलेज के प्राचार्य बने। गणेश बाबू की नजदीकी यदु बाबू के छोटे भाई उमेश्वरी चरण 'लल्लू बाबू' से भी थे। उन्होंने लल्लू बाबू की पत्नी उमा देवी को कॉलेज के शासी निकाय के सदस्य के रूप में भी रखा था।
जीएलए कॉलेज की शुरुआत रांची रोड, रेड़मा में गणेश बाबू के व्यावसायिक भवन से हुई थी। वर्तमान में बारालोटा में जो भवन है इसका शिलान्यास अगस्त 1956 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने किया था। करीब 85 एकड़ में कॉलेज का परिसर है। यहां कई ब्लॉक बनाए गए थे। आधुनिक सुविधाएं थी, हर विभाग के लिए अगल-अलग क्लास रूम, प्रयोगशाला, लाइब्रेरी, कॉमन रूम, खेल का मैदान, ह़ॉस्टल का निर्माण किया गया था। अभी इसी परिसर में नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय का भवन भी बन रहा है। स्टेडियम भी निर्माणाधीन है।
अब इस कॉलेज से निजी रिश्ते। पापा (प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा) ने 1967 में एमए (अंग्रेजी) की परीक्षा दी थी। कॉलेज में लेक्चरर के लिए इंटरव्यू हो रहा था और वे भी इंटरव्यू देने पहुंच गए। उनका चयन भी हो गया पर इस शर्त के साथ कि अगर रिजल्ट आने पर वे सेकेंड क्लास नहीं ला पाते हैं तो उनकी सेवा उसी क्षण समाप्त हो जाएगी। रिजल्ट आने तक सेवा भी अवैतनिक होगी। रिजल्ट आने पर पापा को सेकेंड क्लास आ गया और वे आधिकारिक रूप से कॉलेज के हिस्सा हो गए। जितना दिन अवैतनिक पढ़ाया था, उस अवधि का वेतन भी मिला। 1970-71 में पापा केंद्र सरकार की सेवा में दिल्ली आ गए पर उनका मन जीएलए कॉलेज में ही रह गया था। 1972 में उन्होंने फिर यहां नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया। चयन होने के बाद 18 सितंबर 1972 को यहां योगदान दिया और 29 नवंबर 2007 को रिटायर हुए। उनके रिटायर होने से पहले पलामू में विश्वविद्यालय की नींव पड़ गई थी। रांची विश्वविद्यालय की शाखा यहां खुली और वे इसके पहले समन्वयक बनाए गए। खेल से लेकर सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। मैंने इस कॉलेज में 1983 में नाम लिखाया और अंग्रेजी से एमए किया। छोटे भाई हेमंत मिश्रा ने मनोविज्ञान में एमए किया तो बड़ी बहन रश्मि ने अंग्रेजी में ऑनर्स और छोटी बहन प्रियंका ने इतिहास में ऑनर्स किया। मेरे बच्चे दिल्ली और गाजियाबाद में रहे इसकी वजह से इनकी शिक्षा यहां नहीं हुई लेकिन भतीजा मानस अभी इस कॉलेज में अंग्रेजी ऑनर्स कर रहा है।
गणेश लाल अग्रवाल मूल रूप से वर्तमान के औरंगाबाद (बिहार) जिले के दाऊदनगर के रहने वाले थे। उनका जन्म दो अक्टूबर 1902 को हुआ था। पलामू में उच्च शिक्षा को नई दिशा देने वाले इस महान शख्सियत ने 14 फरवरी 1964 को आखिरी सांस ली। गणेश बाबू को उनकी 120वीं जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा

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