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जरा कल्पना कीजिए दिवाली के कुछ दिन बाद ही उत्तरी भारत की एक सांस्कृतिक जनसंख्या..मान लीजिए कि अपना पलामू ही आपके आंखों के सामने है... लोग एक बार फिर नया नया कपड़ा पहिन के चवनिया स्माइल बिखेरते दिख जाते हैं. औरतें बूट, बजरी, रेंगनी का कांटा इक्कठा करते, लालाजी लोग में पुरुष औऱ बच्चे अपनी विद्वता प्रदर्शित करने कलम दवात का इंतजाम करते हैं.
भाईदूज यानी गोधन /यमद्वितीया में बजरी कूटना मतलब अपने भाई को वज्र सा ताकतवर बनाने की कामना करना, जिससे वो अपने कष्ट क्लेश का मुक़ाबला आसानी से कर सकें. लकड़ी, डंडा जो मिले उससे दिवाली के बचे-जले मिट्टी के खप्पर, दीयों, नारियल औऱ बजरी को कूट काट के बराबर कर देना, लड़ भीड़ जाना, यमराज माने मृत्यु से भी टकरा जाना- क्यूंकि यमराज, यमीन की ही छवि तो बनती है गोबर मिट्टी से लीप के. यद्यपि मृत्यु के देवता का इतना वीभत्स चित्रण क्यूँ होता समझ से परे है. जैसे जन्म शाश्वत सत्य है वैसे ही मृत्यु भी...
जन्म मृत्यु, पाप पुण्य, कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले श्री चित्रगुप्त महाराज की पूजा भी उसी दिन होती है उनके वंशजों द्वारा - लालाजी लोग करते हैं. लिखाई पढ़ाई से छुट्टी एक दिन के लिए.
ये कैसी विडम्बना है कि मृत्यु देवता से भयभीत हो लोग उनकी भ्रतसना कर रहें है, वहीँ उनके लेखाकार चित्रगुप्त महाराज को खुश करने कि कवायद. अजीब दोमुँहा ऐटिटूड है भाई.
अब आपको लिए चलते हैं दक्षिणी दिल्ली के एक कॉलेज में जहाँ पढ़ती है छोटे शहर क़ी स्वाति. स्वाति को उस समय घनघोर कल्चर शॉक मिला ज़ब पता चला कि उसकी कक्षा के 60% सहपाठी किसी ना किसी तरह का नशा करते हैं, क्या लड़का क्या लड़की, हेप दिखना है तो शराब औऱ नशा फैशन ट्रेंड हैं. वो बात अलग है कि स्वाति को ऐसी कोई तमन्ना नहीं थी हेप लगने क़ी... इसलिए बात बिगड़ी नहीं.
वहीं दिल्ली की तस्वीर के ठीक विपरीत एक और तस्वीर पेश है जालंधर आए प्रहलाद की. प्रह्लाद पलामू के सिमरिया का पहला नवयुवक था जो पढ़ लिख कर जूता बनाने क़ी फैक्ट्री में काम करने हेतु मैनेजर बन के दूर शहर जालंधर गया था. उसके गांव के बाकी साथी या तो क़ृषि योग्य भूमि क़ी गांव में अनुपलब्धता के कारण बेकार बैठे थे या फिर पूरी तरह से नशे में गिरफ्त, शराब में धुत्त गृहस्थी को ढोने के लिए मजूरी वाला छिटपुट काम कर लेते थे. प्रह्लाद को क्षोभ होता था उन्हें अपना दोस्त कहने में. किन्तु पंजाब के हालात भी काफी अच्छे नहीं थे. उड़ता पंजाब के किस्से लोकप्रिय तो हैं ही.
अब आइए लौटते हैं अपने डाल्टनगंज के साहित्य समाज चौक पर. मधु माई उम्र के चालीसवे दशक में हैं. घरों में झाडू,पोंछा, बर्तन धोने का काम करती हैं. उनके पति औऱ सुपुत्र दोनों को जबरदस्त चरस, गांजा क़ी लत्त लग गयी है. घर क़ी माली हालत सब बिकने के कगार पर पहुँच चुकी है. बस उनको खुद के हाथों का ही आसरा, ऐसे में क्या गोधन औऱ क्या कोई त्यौहार, वो बिना नागा किये हर दिन बोझिल क़दमों से ही सही सुबह निकल पड़ती हैं. भले ही आँसू से आँखों के काले घेरे औऱ सुर्ख हुए जा रहे हों. साहित्य समाज चौक से ढलकते ही छोटी दुकानों में कई सारी रंगीन खैनी के डब्बों को देख उनको अपनी भतीजी क़ी याद आ जाती है जो उन्हें खिलौने समझ खरीदने क़ी ज़िद्द करती थी. काश मधु माँ समय से अपने बेटा औऱ आदमी दोनों को उसी समय रोक पाती जब उनकी शुरुआत खैनी खाने से हुयी थी.
इतने सारे दृश्यों की झलकी के बाद अब दृष्टांत क्या?
एक सवाल आप सब से - सिर्फ त्यौहार के हरेक रीती रिवाज़ को बारीकी से मानना जरुरी है, या फिर जब इन त्योहारों को बनाया गया होगा तो उसके पीछे छिपी भावना क्या थी इस बात को समझना?
मंगलकामना करो बहिनों लेकिन अपने बांधवों, खुद के अंतर में व्याप्त बुराईयों डर को सबसे पहले शमन करो. यमराज/मृत्यु से डरने औऱ चित्रगुप्त महाराज को घटा के अपने मुनाफा का लेखा जोखा लिख के देने क़ी बजाय त्यौहार उल्लास के साथ मनाइये. फिर हर त्यौहार रोशन होगा औऱ हर व्यक्ति खुशहाल.
©शिवांगी

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