Wednesday, October 12, 2022

हम केकरो से कम हैं क्या ???

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"अपने हुनर को कम ना आंक तू,
किसी से ना डर, ना घबरा तू,
अभावों का क्या है?
ये तो वक़्त का पहिया है,
कभी घना-घना,
तो कभी मुट्ठी भर चना है।"
अभावों में ही तो प्रतिभा निखर कर हुनर का रूप लेती है। सारी सुख सुविधाओं में तो खुद भी अपनी प्रतिभा की कद्र नहीं रहती।
एक पूरा मोची मोहल्ला है, जिन्होंने 10 वर्ष पूर्व कोलकाता जा कर, एकदम सही तरीके से मशीन की ट्रेनिंग ली थी; जूते, चप्पल, बैग, वॉलेट इत्यादी बनाने की। पर सरकारी वित्तीय सहायता बंद होते ही, उन सब को बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन के पास बूट पोलिश/ठेले की दूकान खोलना ज्यादा श्रेयस्कर लगा। यही हाल ज़रदोज़ी कढ़ाई, कांथा में ट्रेनिंग पाए पोलपोल, चियांकी, सतबरवा और रेड़मा के 300 कुशल गृहणियों के साथ भी हुआ। बढ़ावा और सरकारी सहायता लगातार ना मिल पाने के कारण शायद उनके दक्ष हाथ सहायता की आस में कहीं खो गए, स्वरोज़गार के सपने तो चूल्हे चौकों में छिप कर सो गए।
वैसे तो छोटे और मंझौले उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग विभाग भी है, पर पूरी सरकारीपने से ग्रस्त। हर साल कला, गृह उद्योग, हस्तकरघा, हस्तकला में उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कारों का प्रावधान है, लेकिन प्रयास तभी सफल हो पाएंगे ना, जब उसकी उचित पहचान करने वाला कोई हो? लालफीताशाही और कभी ना भरने वाला पेट, किसी का भला होने दिया है आज तक भला!
किनत्सुकि एक जापानी कला है; टूटी हुयी सिरेमिक के बर्तनो में दरार को सोने से भर देने की, जिससे की वो ना सिर्फ फिर से काम में आने लायक हो जाएं, बल्कि अपने मौलिक स्वरुप से भी बेहतर बन जाएं। हरेक अवसर का, प्रत्येक संसाधन का भरपूर लाभ उठाया जा सकता है। जरूरत है तो सिर्फ एक पॉजिटिव माइंडसेट की, आज तक संसाधनों के अभाव में किसी की उन्नति रुकी है क्या?
दिल्ली के युसूफ-सराय, गोविंदपुरी, गढ़ी गांव, शाहपुर जाट इत्यादि इलाकों में मैंने देखा है कि हमारे बिहार-झारखण्ड के ही लोग - एक 10ft.x10ft. वाले कमरे में एक साथ 15 लोग, कोई ज़रुदोज़ी वाली खाट फ्रेम पर, तो कोई बैग के हिस्से सिल रहे होते हैं। हरेक कमरे में एक अलग उद्योग विकसित हो रहा होता है। वही लोग अपने घर, अपने गांव वापस आ कर कुछ काम नहीं कर सकते क्या?
पलामू संसाधनों, कलाकारो, बुनकरों, सिनेमाकारों, संगीतकारों, रचनाकारों, साहित्यकारों औऱ बुद्धिजीवीयों का हमेशा से गढ़ रहा है। जाने क्यूँ हमारी नम्रता कह लीजिये या फिर झिझक अपनी उत्कृष्टता जग जाहीर करना हमलोग को अच्छा नहीं लगता। बिश्रामपुर, हरिहरगंज के देसी हस्तकरघा में बने अच्छे खासे 'अरज वाला गमछा' हो, जिसे पहनने, ओढ़ने, बिछाने सबके लिए इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर 'पोखरी-कला' में बनी खद्दर की धोती, कुर्ता, चादर-पलामू का हस्तकरघा काफी कुछ बोलता है, पर समझने वाले दिमाग कम ही दिखते हैं।
शिल्पीस्तान की तपोवन जैसे उस एक कमरे के कलामंदिर में बैठ आदरणीय नैयर सर ने ना जाने कितने लोगों की मुलाक़ात रंग, कूची, कैनवस से करवाई है। सैकत दादा की राष्ट्रीय स्तर की फोटोग्राफी हो, प्रेम भसीन सर का ड्रिफ्ट वुड आर्ट, सेसा के द्वारा कई विधाओं में महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए किये जा रहे प्रयास हों; पलामू में कुशलता की कोई कमी कभी रही नहीं।
कल को आपको अगर चोट लग जाये और आप किसी काम के ना रहें, तो आप क्या करेंगे? अपने आप को बेकार घोषित करने से तो अच्छा है कि उद्यम करें और पूरी जान लगा कर कोशिश करें संसाधनों का पूरा दोहन करने की। रिपेयर, रिसाइकिल, अपसाइकिल, किनत्सुकि; हरेक में रूचि लेने का ज़माना है।
तभी ना टिके रहिएगा!! पलामू किले के ईंट-गारा की तरह चिरस्थाई बनियेगा, बरसों बाद भी चमकते रहिएगा।
"क्या कहा? चित्र बिगड़ गयी है?
तो उसको विचित्र ही रहने दें ना?
भींड़ में खो जाने से तो अच्छा है ना कि अपनी अलग पहचान बची रहेगी।"
© शिवांगी शैली
May be an image of 1 person and text that says "Shivangi shauly की कलम से पलामू के हस्तकरघा उद्योग की खूबसूरत झलकी Theth Thethpalamu palamu"

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