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ढेर दिन बाद दशहरा में गाँव लउटे हैं महाराज। कोरोना के नाम पे हैभी ड्यूटी लागल है, कह-कह के बड़ी ठगे घरे वलन के। लेकिन एह बार माई धीरा दी थी कि ना अउले न बाबू, तो ओनहीं दूसर माई ढूंढ लिहे।
पुरान दिन में डूब के औ-पौ होइये रहे थे कि गली में साइकिल पर झोला लटकउले छठू साव का चीर-परिचित राग सूनाई दिया-
"चिनीयाऽऽऽऽ बादाऽऽमऽऽ..."
अरे! चाचा जिंदे हैं अभी तक? एगो रिसर्च पेपर लिखे ला पड़ेगा इनकर चिरयौवन पर।
तभी पूरा टिप-टाप में संजयइया आ गया घरे, साथ में नंदूवा आऊ कमेसरो था।
"चलs-चलs मरदे! पान-पतई के नेवान करल जाव। दशहरा के इंतजार तs बस पाने खाये ला रहबे करता है।"
मुँह पजाते हुए नंदुवा बोलबे किया कि चचा टोक दिए- "आप लोगों को घूमता पर वाला पुलवा पर बईठ के, बादाम फोड़ते हुए, बतकही करने का मन नहीं हो रहा है का? जाइए जाइए... लौकडाउन खतम न हो गया हो " पूरा दांत निपोरते हुए चचा धंधा चमकाने में सफल रहे।
जल्द ही हमारे पुराने अड्डे पर मित्र मंडली जम चुकी थी। बरसों बाद नहर के पुल पर ठिठोली-ठहाके गूंज रहे थे, पूरे नमक-मिर्च के साथ। कट-किट, रट-रिट, पट-पिट बादाम फुट रहा था और नॉन-स्टॉप गप्पों का बाजार सजने लगा था। कोई चटनी के साथ बादाम के स्वाद का वर्णन कर रहा था, तो कोई बालू में भूंजल घानी में से निकले बादाम की सोंधी खुशबु मे लीन होने लगता। कोई ट्रेन में टाइम पास के बेस्ट आइटम की उपाधि से इसे नवाज रहा था, तो कोई पौरूष वर्धक दवाई के रूप में इसका गुणगान कर रहा था। लेकिन अव्वल तो मेरा दिल्ली वाला 'तेरे को/मेरे को' फ्रेंड था, "एकरा बादाम नहीं कहते हैं, तोहीन जिंदगी भर गंवारे रहोगे।" बीच-बीच में सड़े हुए पीस को अपने खास मित्र को परोसने का रिवाज़ भी निर्विरोध रूप से जारी था।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि कितने किस्मत वाले होते हैं वो, जो आज भी अपने गांव में अपनों के बीच में रह पा रहे हैं। समाज की सेवा करने में समाज से ही दूर होता चला गया मैं तो। अब और दूर नहीं रह सकता इन सब बंधुओं से। खुद से वादा किया कि जो भी हो जाये अब मैं हर त्योहार में अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराऊंगा।
आप सबों को ठेठ पलामू की ओर से दशहरा की ढेरों शुभकामनाएं। माता रानी का आशीर्वाद आप सबों पर सदा बना रहे।
खुश रहिये, स्वस्थ रहिये।
© ठेठ पलामू टीम

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