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मां के बहुत चिल्लाने पर, मैने भी इस बार अपने रूम की सफाई की, तो छज्जा पर एक पेटी में मुझे जैसे खजाना मिल गया। सोचा की आप लोगों से भी अपने दिल की बात शेयर कर ली जाए। पेटी खोलते ही जैसे किसी दूसरी दुनियां में पहुंच गया, पूरा का पूरा पेटी ही पुरानी-पुरानी कॉमिक्सों से भरा पड़ा था।
अब क्या कहें, इस कॉमिक्स के चक्कर में हम पापाजी से कितनी बार 'बाटा और चाटा' खाये हैं। मैं था भी तो एक नंबर का शैतान, कॉमिक्स की लत ऐसी कि पढ़ते समय भी किताब में कॉमिक्स छुपा कर पढ़ने लगता था। पकड़े जाने पर मार खाने से उतना डर नहीं लगता था, जितना पापाजी के कॉमिक्स फाड़ देने से लगता था। फिर तो दंड भी बड़ा भारी भरना पड़ता था। आज के बैंक के लोन से भी ज्यादा डरावना लगता था, वो कॉमिक्स को चुकाने का दंड।
अब कमाई-धमाइ तो उस वक़्त एक रुपया थी नहीं, तो रोज-रोज नया-नया कॉमिक्स कहाँ से आये? कॉमिक्स की दुनिया की एक अलग ही अर्थव्यवस्था थी, जो बार्टर सिस्टम से चलती थी। बोले तो अदल-बदल कर पढ़ने की जुगाड़ की टेक्नोलॉजी। एक बढ़िया कॉमिक्स खरीद लेने पर, उससे बदल-बदल कर ढेरों कॉमिक्स पढ़ लेते थे। फिर भी कोई जुगाड़ नहीं लगा, तो भाड़ा पर कॉमिक्स तो मिलता ही था। उस वक़्त बाजार में अधिकतर श्रृंगार स्टोर और किराना दुकान में भाड़ा पर कॉमिक्स चलाया जाता था, लेकिन पहले कॉमिक्स का पूरा दाम सिक्युरिटी मनी के रूप में जमा करा लिया जाता था।
उस वक़्त हम बच्चों में कॉमिक्स ढांपना एक कला के रूप में प्रसिद्धि पा चुकी थी। बोले तो किसी का कॉमिक्स लेकर अगले दिन सफेद झूठ बोल देना कि पापा ने कॉमिक्स फाड़ दी या फिर माँ ने कॉमिक्स जला डाली। अब अगर सामने वाला आपसे ज्यादा बाहुबली है, तो गए आपके पैसे पानी में। कुछ लड़कों का तो काम ही था मांग कर पढ़ना और कभी नहीं लौटाना।
जो लड़का कॉमिक्स नहीं पढ़ता था, उसको हमलोग मंदबुद्धि मानते थे, बोले तो इसको कुछ समझ नहीं आता दिन दुनिया के बारे में। दोस्तों के बीच ज्यादातर बातें कॉमिक्स के प्लाट, उसके हीरो, एक्शन और सस्पेंस पर ही होती थी। 'नागराज' और 'सुपर कमांडो' ध्रुव सबसे ज्यादा पसंदीदा हीरो थे। फैंटेसी पसंद करने वालों को नागराज पसंद था, तो खुद को बुद्धिमान मानने वाले ध्रुव के फैन थे। दोनों की लड़ाई में कौन जीतेगा ये एक भारी विवाद का विषय था। कॉमिक्स में हरेक पाठक वर्ग को ध्यान में रखा जाता था। हिंसा पसंद करने वालों के लिए 'डोगा' और 'भेड़िया' थे, तो कॉमेडी ऑडियंस के लिए 'बांकेलाल' और 'हवलदार बहादुर'। आज जो एपिक कहानी जैसे 'गेम ऑफ थ्रोन्स' और 'लार्ड ऑफ द रिंग्स' देखते हैं, उस वक़्त भोकाल, योध्दा और अश्वराज पढ़ते थे। जो आज 'शरलॉक होम्स' और 'जेम्स बांड' पसंद करते हैं, उनके लिए हमारा देशी ब्रांड चाचा चौधरी था।
जिस बच्चे के पास जितनी ज्यादा कॉमिक्स होती थी, वो उतना ही पॉपुलर था। ज्यादा कॉमिक्स का कलेक्शन रखने वाला खुद को ग्रुप का लीडर समझता था और बाकी बच्चे भी उसकी बातों को काफी तवज्जो देते थे। कहने का आशय ये है कि बच्चों में अमीरी नापने का पैमाना कॉमिक्स ही था। अगर आप कोई नया कॉमिक्स नहीं पढ़े हैं, तो आपको बाल समाज में आउटडेटेड माना जाता।
कॉमिक्स के साथ मिलने वाला मैग्नेट स्टीकर और पोस्टर में तो हम बच्चों की जैसे जान बसती थी। उस वक़्त दोस्ती भी अधिकतर कॉमिक्स के लेन-देन के कारण ही होती थी। आज भी मेरे आधे से ज्यादा दोस्त बचपन में कॉमिक्स ग्रुप वाले ही हैं। नंदन-चम्पक को हमलोग बच्चों को ठगने वाला साहित्य मानते थे, वो बड़ा ही नीरस लगता था पढ़ने में। कभी-कभी आने वाला मल्टी स्टारर विशेषांक, जो थोड़ा महंगा भी आता था, बहुत डिमांड में रहता था। कोई भी कॉमिक्स खरीदने के पहले लास्ट में 'क्रमशः' जरूर देखते थे, वरना आधी कहानी पर पैसे क्यूँ बर्बाद करना।
कुछ कलाकार बच्चे कॉमिक्स के हीरो-हीरोइन का स्केचिंग और ड्राइंग बनाते थे। अब स्कूल की मैडम को ये बात तो पता थी नहीं कि डोगा का चेहरा कुत्ते जैसा दिखता है, तो बेचारे डांट भी खूब खाते थे।
जैसे शराब और सिगरेट का नशा पहले मुफ्त में चखा कर लगाया जाता है, वैसे ही कॉमिक्स की लत भी यार दोस्तों को पहले मुफ्त में पढ़ा कर ही लगाई जाती थी। एक बार बच्चे को कॉमिक्स की लत लग गयी, तो फिर वो अपने ग्रुप का रेगुलर सदस्य बन जाता था।
ओह रे बचपन!!! एक अलग ही मायावी दुनियां थी इसकी। अब तो मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने में भी वो रोमांच और सुकून नहीं आता है।
अगर आप भी इस दौर से वाकिफ हैं, तो अपने अनुभव कॉमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें। साथ ही अपने पसंदीदा हीरो और कॉमिक्स का नाम लिखना ना भूलें।
© सन्नी शुक्ला

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