Sunday, February 21, 2021

खईरिका





बदलत परिवेश अउरी अधुनिकता में सबकुछ बदल गेल बा...खान-पान ,रहन-सहन ,पेन्हन-ओढ़न सब कुछ। ई सब बात ओह समय सुनाइल जब एक शादी के पार्टी में खाना खाये के बाद एक साथ बाबा/दादा और उनकर हमउम्र बईठल हलन, काहेकि उनहन के जरूरी रहल खाये के बाद दाँत में फंसल #सँखरी के निकालेके जेकरा खातिर ऊ सब के जरूरत रहल एगो #खईरिका(खरिका) के......लेकिन उनकर ई ज़रूरत के पूरा करे वाला कोई देखाइत न रहे।

आज-कल बुजुर्ग लोग भी समय के साथ समझौता कर लेले हत, काहेकि अब के लईकन के तो उनहन के बोलल बहुते शब्द समझ में ना आवेला आउर साथे-साथे ऊ सब चीज के मिलल भी गाँव-देहात के अलावा आउ कहँउ सम्भव नईखे।

विलुप्त होईत संस्कृति और संस्कार से एकदम से आपन पहचान मिटे के कगार पर बा ,उनहन के ई बात सुनके आपन बचपन याद आ गइल जब घर के ओरिहानी के नीचे खईरिका (नीम की पत्तियों के बीच का पतला डण्ठल, जो अपने समय का सबसे फेवरेट #टूथपिक हुआ करता था और बुजुर्गों को खाना खाने के बाद जरूरी होता था) के #एकमुठ्ठा हमेशा बाँध के टाँगल रहत रहे ,आऊ दादा/बाबा जब भी खाना खा के उठतन ,निकलते के साथ एक लोटा पानी आऊ खईरिका जरूर माँगतन। हालाँकि आज ओकर जगह प्लास्टिक के डब्बा में पैक टूथपिक ले लेले बा ,लेकिन नीम के ऊ खईरिका के आपन अलग ही पहचान अऊर महत्व रहल।

©Rakesh Bharti Goswami
4 Nov 2018, 06:50

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