
हमारा देश कृषि पर निर्भर है और उसकी असली पहचान उसकी ग्रामीण संस्कृति है।कृषि संस्कृति में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पशुधन में सबसे महत्वपूर्ण है - #गाय।जो हमारी ग्रामीण संस्कृति की महत्वपूर्ण अंग है।पलामू के ग्रामीण समाज में उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण लोकपर्व मनाया जाता है।जिसे हम #सोहराई के नाम से जानते हैं।यह पारंपरिक लोक त्योहार है।जिसे हम सब दीपावली के दूसरे दिन मनाते हैं।
हमारे गाँव #सिंगरा में #धनतेरस के दिन से लोग अपनी-अपनी गाय और बैल के सिंग पर घी लगाते हैं। गाँव के
लगभग सभी लोग अपनी गाय को माँ लक्ष्मी का ही रुप मानते हैं।इसीलिए उन्हें नहलाते-धुलाते हैं और उनके सिर पर तिलक लगा कर उनकी पूजा करते हैं।सोहराई के दिन गाय का दूध भी नहीं निकाला जाता है। इस अवसर पर कहीं-कहीं कुछ गाँव में तीन दिनों का मेला भी लगता है।जहाँ जानवरों की खरीदी-बिक्री के साथ मेला भी लगता है।जिसे डाढ़ मेला कहते हैं।
सोहराई के दिन गाँव के सभी लोग #बीरकुंवर_बाबा की प्रतीकात्मक प्रतिमा पर एकत्रित होते हैं।यहाँ पर पूजा का काम #यादव जाति (जिन्हें अहीर कहा जाता है) के द्वारा किया जाता है। इस पूजा कार्य में गाँव के सभी लोग अपने घर से सात दुधौरा, कच्चा दूध, सिंदूर,अक्षत एवं अन्य पूजा सामग्री लेकर आते हैं।साथ ही साथ एक #मिट्टी_का_घोड़ा भी.........। वैसे यह अपनी सामर्थ्य क्षमता के ऊपर आधारित रहती है क्योंकि गाँव के जो लोग आर्थिक रुप से उतने मजबूत नहीं होते हैं वे बीरकुंवर बाबा के लिए प्रसाद के रुप में गुड़,चावल और बताशा आदि भी चढ़ाते हैं।
पूजा के दौरान #अहीर जाति के लोगों के द्वारा बीरकुंवर बाबा की प्रतिमा को #कच्चे दूध से नहलाया जाता है। फिर बकरा और सुअर को वहाँ पर उपस्थित गौ माता के पास आशीर्वाद लेने के लिए बार-बार भेजते हैं। उस समय गांव के हरिजन जाति के लोग मगन होकर ढ़ोल बजाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु अहीर जाति के लोगों के द्वारा नृत्य भी किया जाता है जिसे क्षेत्रीय भाषा में #डाढ़ खेलना भी कहा जाता है।
पूजा के अंतिम चरण में बीरकुंवर बाबा की प्रतिमा के समक्ष #बकरे की बलि चढ़ायी जाती है और उसके रक्त से बाबा का तिलक भी किया जाता है।कभी कभी पूजा करने वाले पुजारी उस रक्तरुपी प्रसाद का सेवन भी करते हैं। झारखण्ड के अधिकांश हिस्सों और विशेषकर पलामू जिले के अधिकांश गाँव में सोहराई पर्व को आस्थापूर्वक मनाया जाता है।
आप सभी को कृषि संस्कृति पर आधारित सोहराई पर्व की ढ़ेर सारी बधाई।
©Sunita Shukla
8 Nov 2018, 13:37
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