Sunday, February 21, 2021

दरहा बाबा






डाल्टनगंज से मात्र पाँच किमी की दूरी पर #पड़वा_मोड़ की तरफ जाने वाली मुख्य मार्ग एन एच 75 पर #सिंगरा गाँव स्थित है।प्रशासनिक दृष्टि से अब यह गाँव नहीं बल्कि डाल्टनगंज नगर निगम का क्षेत्र है। सिंगरा मेरा पैतृक निवास स्थान है। धार्मिक दृष्टि से यहाँ पर स्थित #दरहा_बाबा_का_मंदिर सदैव मेरे जिज्ञासा का केन्द्रबिन्दु रहा है। यह मंदिर मुख्य मार्ग से आधा किमी की दूरी पर स्थित है। वैसे तो यह कच्चा मार्ग है किंतु आप किसी भी मौसम में इस मार्ग पर चार पहिया वाहन से आसानी से जा सकते हैं। #अमानत नदी के किनारे हरे-भरे खेत और खजूर के ढ़ेर सारे सुंदर पेड़ के बीच यहाँ के खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण देखकर कोई भी प्रभावित हो जाएगा।

एक पुराने घने नीम के पेड़ के नीचे #दरहा_बाबा का मंदिर स्थित है। इस मंदिर के बारे में पता करने पर पता चला कि शुरुआत में यहाँ एक छोटी सी झोपड़ी थी और एक औघड़ बैगा के द्वारा पूजा संपन्न करायी जाती थी।जब इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती चली गयी तो श्रद्धालुओं के द्वारा टीनशेड के छत वाली मंदिरनुमा कमरे का निर्माण कराया गया। बाद में एक छायादार बड़े चबुतरे का भी निर्माण भी कराया गया है।-आसपास के निवासी ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक के लोगों में इस मंदिर के प्रति बहुत गहरी आस्था है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर मांगी गयी सभी मन्नतें पूर्ण होती है।इसलिए यहाँ पर हमेशा लोगों की भीड़ दिखलाई पड़ती है। उनमें से कुछ लोग ऐसे होते हैं जो यहाँ पर मन्नत मांगने आते हैं और दूसरे ऐसे लोग होते हैं जो मन्नत पूरी होने के यहाँ पर बाबा को धन्यवाद देने आते हैं।

सामान्य शोध करने के उपरांत यह बात उभरकर सामने आयी कि दरहा बाबा यहाँ के ग्राम देवता हैं। प्राचीन समय में जिस चीज से लोग डरते थे। उसको प्रसन्न करने के लिए उसकी पूजा अर्चना शुरू कर दिया जाता था। परंपरागत तौर से लगभग अधिकांश गाँव में ग्रामदेवता के ऐसे पवित्र स्थान गाँव से बाहर या सीमारेखा पर निर्जन, सुनसान खेतों या वृक्ष के बीच हुआ करते थें। जहाँ पर कम आबादी के कारण शाम ढलते ही भयानक वातावरण हो जाता था। गाँव के लोग प्राकृतिक ,दैविक,भौतिक एवं अन्य आपदा से बचने के लिए अपने ग्रामदेवता की पूजा करते रहते थे और यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

हो सकता है कि टिकुलिया में स्थित यह मंदिर भी उसी परंपरा के अनुसार निर्मित हुआ होगा। यह सामान्य मंदिर की अपेक्षाकृत बहुत अलग है।न तो यह मंदिर जैसी आकृति की है न ही यहाँ मूर्ति है और न ही यहाँ संस्कृत में उच्चारण करने वाले ब्राह्मण पुजारी हैं। यहाँ पर बैगा द्वारा पूजा करने की परंपरा है जो वंशानुगत चली आ रही है। नीम के विशाल वृक्ष के नीचे शाखाओ से बंधे नए लाल-पीले कपड़े,झंडे,सिंदूर पुते पत्थर और हाथी-घोड़े की रहस्यमय मूर्ति देखकर यहाँ के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की इच्छा होती है।

दरहा बाबा मंदिर में पूजा पाठ और चढ़ावे की भी अलग परंपरा है।ऐसी मान्यता है कि दरहा बाबा मस्तमौला हैं। उन्हें औपचारिकता पसंद नहीं है।वह सच्चे मन से श्रद्धाभाव रखने वाले श्रद्धालुओं की परेशानी को समाप्त कर देते हैं और उनकी सभी मन्नतों को पूर्ण कर देते हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि उन्हें शराब के साथ मांस ज्यादा पसंद है इसीलिए सामान्यतः मन्नत पूरी हो जाने पर यहाँ पर मुर्गा,मुर्गी,बकरा,बकरी आदि की बलि चढ़ायी जाती है।साथ ही यहाँ पर शराब चढ़ाने की भी परंपरा है।बदलते दौर में बलि प्रथा में रुचि नहीं होने के कारण या आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोग यहाँ पर अपनी श्रद्धा के मुताबिक मिट्टी के हाथी और घोड़े, नारियल,मिठाई, अगरबत्ती आदि भी चढ़ाते हैं।

मंदिर परिसर के पीछे और सामने ईटों से निर्मित ढ़ेर सारे चूल्हे भी बने हुए हैं।जहाँ पर शाकाहारी लोगों द्वारा पूजा के पश्चात चढ़ाए हुए मांसाहारी प्रसाद को वहाँ उपस्थित लोगों में वितरण कर दिया जाता है।इसके साथ बहुत सारे श्रद्धालु लोगों के द्वारा वहीं पर इस प्रसाद पकाकर खाया भी जाता हैं।#सिंगरा_खुर्द,सिंगरा कला और आसपास के गांव के लोग दरहा बाबा के प्रति बहुत आस्था है।वह अपने सुख-दुख में सबसे पहले दरहा बाबा के पास जाते हैं।

#जय_दरहा_बाबा

©Ajay Shukla
26 Dec 2018, 10:33

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