#खरई या #खरिहान वह भी क्या दिन थे? दीवाली, छठ की छुट्टियों में शाम को खरई में बिखरे हुए धान के पोरा में हम सब बच्चों की फौज लॉक एंड की, करंट पानी आदि खेला करते थे। दम तक पोरा में #अखरने के बाद जो #खुजली होती थी, आज भी याद आती है।
आज का बचपन ऐसा नही है। बच्चों से #पोरा के बारे में पूछिएगा तो वे कहेंगे ये क्या होता है? आजकल गाँवों में जाएँ तो किसान दो ही काम करते मिलेगा या तो दीवाली, छठ पूजा के लिए लिपाई-पुताई में लगा होगा या फिर धान की फसल को अंतिम पानी देकर खरई तैयार कर रहा होगा। कंपनी जैसे अपने प्रोडक्ट तैयार करने के लिए बड़े-बड़े प्लांट लगाती है, उसी तरह खरिहान किसानों के लिए प्रोसेसिंग कम स्टोरेज प्लांट से कम थोड़े ही है। खरई किसानों के लिए सब कुछ है। वह अपने ट्रैक्टर, मशीनों को भी यहीं रखता है, जरूरत पड़ने पर अपने गाय,भैंस को भी यही बाँधता है। फसल अवशेषों का ढेर(गाँज) भी यही रहता है। खेती-बाड़ी के अलावा इसके अनेकों इस्तेमाल हैं।
#मेदिनीनगर में कोई कार्यक्रम करने के लिए होटल, मैरिज हॉल बुक करने पड़ते हैं। गाँव में सारे कार्यक्रम या तो #अंगना में या तो खरई में ही हो जाता है। शादी बियाह है? कोई बात नहीं, खाने-पीने टेंट की व्यवस्था आराम से खरिहान में कर दो। मरनी (श्राद्ध कर्म) है? कोई बात नहीं। भोज-भात की व्यवस्था आराम से खरई में ही कर दिया जाता है, नो टेंशन। शहर में ऐसे कार्यक्रम करने के लिए बहुत सोचना पड़ता है। हमर दीदी का जयमाला भी खरई में ही हुआ था और हमारे दादाजी का 'काम'(श्राद्ध कर्म) भी यहीं हुआ था। कोई टेंशन नही 300 आदमी भी आ जाये तो कोई दिक्कत नहीं।
अब आते हैं असली काम पे, जिसके लिए ये बनाया जाता है। हमर दुनो खरई बखार के पास है। घर के पास वाला खरई एकदम गोबर माटी से लिपा के तैयार हो गया है और दूसरा रोड पर वाला खरई के अभी #घास_छोले में लगल है। कुछ दिन में धान की कटाई शुरू हो जाएगी और उसके बाद उसे खरई में लाया जाएगा। उसके बाद राइस थ्रेशर या ट्रेक्टर से #दवाहीं(रिवर्स रेवोलुशन ऑफ ट्रैक्टर इन खरई) होगी। शहरी लोगों को ट्रैक्टर से दवाहीं देखने में बड़ा मजा आता है। ट्रैक्टर से दवाहीं करना कोई खतरनाक #स्टंट से कम नहीं होता है। अभी ट्रैक्टर आ गया है पर पहले यह काम भी बैलों से होता था। अब किसी-किसी के घर भले 1 से 2 जोड़ी बैल हो जाएँ, पर सबके घर तो उतने बैल होते नहीं थे कि अकेले सिर्फ अपना घर के बैल से दवाहीं हो जाए इसलिए बैलों का एडवांस बुकिंग होता था कि "आज हमर घर दवाहीं बा न बैल केकरो मत दिह"। सच कहिए तो बैल का दवाहीं देखना और मजेदार होता था। देखने में दवाहीं खेदना भले आसान लगे पर होता बहुत कड़ा था। ख़ासकर जब बैल गोबर देने लगे और दवाहीं खेदते-खेदते देख कर उसके नीचे गिरने से पहले पोरा लेकर छान लेने की कला आसान नहीं थी। बढ़िया-बढ़िया एक्सपर्ट लोग ही कर पाते थे।
खरई को एक वाक्य में कहा जाए तो एक allrounder फील्ड है, जहाँ अनेकों प्रकार के काम एक ही जगह पर किए जा सकते हैं। चाहे वह खेती-बाड़ी हो, शादी-विवाह हो, पशु को रखना हो धान गेहूँ को सुखाना हो, इसे प्लेग्राउंड के रूप में भी उपयोग में लाया जाता है। अगर खरिहान घर से थोड़ा दूर हो तो रखवाली के लिए वहाँ पुआल से ही एक झोपड़ी बनाया जाता है, जिसको हमलोग #कुरहा कहते हैं। जो भी आदमी रात में रखवाली के लिए रुके,वो उसी में सोता है। लुका-छिपी खेलते टाइम ये बड़ा सॉलिड जगह होता था, छुपने के लिए।
बस इतना ही, खरई पे बहुत कुछ लिखा जा सकता है। खरिहान पे मेरी लेखनी पसंद की गई तो, अगली लेखनी #गाँव के अन्य चीजों पर जरूर लिखूँगा। ठेठ पलामू के मंच पर यह मेरी पहली रचना है। मैं मिसिरदोहर, सेलारी, तरहसी कर रहने वाला हूँ। जन्म पढ़ाई-लिखाई सब कुछ मेदिनीनगर शहर में ही हुआ है, लेकिन आज भी मैं खांटी देहाती हूँ।
©Satya Prakash
28 Nov 2018, 07:28

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