Tuesday, June 12, 2018

पलामू का इतिहास: भाग 1


Divergent theory of evolution यानि मानव विकास के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत को मानने वाले इतिहासकार ये कहते हैं कि बन्दर से इंसान बनने की प्रक्रिया सर्वप्रथम अफ्रीकी घास के मैदानों में हुई थी, जहां एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक जाने के क्रम में चौपाये बन्दरों को शिकारी जानवरों से बचाव के लिए सीधे खड़े होकर चलना सीखना पड़ा. तत्पश्चात बेहतर भोजन, आश्रय और जीवन की तलाश में नित्य विकसित होते मानव झुंड अलग अलग दिशा में फैलते गए. धान के पौधों ने गांव को जन्म दिया और फिर नदी घाटी सभ्यताएं विकसित हुई. भारत में सभ्यता का उद्गम केंद्र सिन्धु नदी के इर्द गिर्द माना गया है.

ये तो हुई किताबी इतिहास की बातें. मगर जैसा कि मेरा मानना है, इतिहास भी एक वैज्ञानिक विषय है. वैज्ञानिक विषय यानि तथ्य, सिद्धांत, प्रयोग, प्रमाण इत्यादि. ना कि सिर्फ कपोल कल्पनाएँ और कहानियां. तो आइये इसी वैज्ञानिक नजरिये से पलामू के इतिहास पर नजर डालते हैं और साथ ही गुजरते हैं कुछ मौलिक सवालों से जो मुझे बचपन से ही परेशान करते रहे हैं. अगर सभ्यता विकास का विकेन्द्रित सिद्धांत सच है तो क्या पलामू में रहने वाले हमारे पूर्वज भी कहीं बाहर से ही भटकते हुए आये होंगे? और क्या उनके पहले यह धरती निर्जन थी?  अगर बाहर से आये तो कहाँ से? सिन्धु घाटी सभ्यता से या कहीं और से? लेकिन आदिवासी तो खुद को यहीं से उत्पन्न मानते हैं? क्या वे भी अफ्रीका से नहीं आए होंगे? कद काठी रूप रंग से तो जाहिर है कि सारे पलामू वासी एक ही कबीले से उत्पन्न नहीं ही हुए होंगे. तो क्या वर्चस्व के लिए अलग अलग समय या स्थान पर इन कबीलों में भी मुठभेड़ होती होगी?  पहली बार कोई इंसानी बस्ती यहाँ कब बनी होगी और कहाँ? कौन था यहाँ का पहला राजा और कैसा था उसका साम्राज्य? वर्तमान पलामू के सारे शहर तो अंग्रेजों या मुगलों के बसाये हुए हैं. तो क्या उनसे पहले घनी आबादी वाले नगर जहाँ व्यापर होते हों, कहीं और भी थे? अगर थे तो लुप्त कैसे हो गए? क्या किसी ने जान बुझ कर तबाह किया या फिर बदलते परिवेश में खुद को सुरक्षित नहीं रख पाए? क्या हड़प्पा के समय में पलामू में भी कोई सभ्यता थी? पलामू की वर्तमान संस्कृति तो मगही से मेल खाती है तो क्या पलामू शुरू से ही मगध साम्राज्य का हिस्सा था या फिर मगध राजाओं ने हमारी मूल पहचान को समाप्त कर दिया, या फिर यहाँ के निवासी मगध के चकाचौंध से इतने प्रभावित हो गए कि अपनी संस्कृति को छोड़ उनके जैसा बनने की होड़ में लग गए? क्या ये भी ठीक वैसे ही हुआ होगा जैसा कि आज के युवा ठेठ पलामू की परम्पराओं को छोड़ पश्चिमी रंग में डूबते जा रहे हैं?

पलामू के राजाओं के बारे में खोजबीन करने पर जो पहली प्रमाणिक जानकारी मिलती है वो है17वीं शताब्दी की. सत्रहवीं सदी के प्रारंभिक दशक को पलामू में चेरो राज का काल माना जाता है. #भगवंतराय (1613-1630) ने मुगलों से क्षेत्र छीनकर चेरो राज स्थापित किया था. उनके बाद अनंत राय (1630-1661) ने. चेरो राजाओं में सबसे लोकप्रिय राजा #मेदिनीराय (1662-1674) ने केवल 13 साल शाषण किया और पुराने पलामू किले का निर्माण करवाया. आखिरी चेरो राजा #प्रतापराय (1675-1681) ने पलामू के दूसरे किले का निर्माण कार्य आरंभ करवाया, लेकिन वह पूरा नहीं हो सका. आज भी किला बनाने के लिए लाए गए पत्थरों का ढेर और अपूर्ण किले के हिस्सों का खंडहर पलामू के जंगलों में विद्यमान है. मेदिनीनगर का इतिहास भी राजा मेदिनी राय और #जॉन_डाल्टन के इर्दगिर्द ही भटक कर धुंधला हो जाता है.

चेरो राजाओं के पहले से ही पलामू के कई हिस्सों में राजपूत राजाओं का साम्राज्य था. 1609 ईस्वी में #नगरउंटारी में राजा अनिरुद्ध राय ने एक साम्राज्य स्थापित किया. #रंका_राज की नींव राजा दुशाषण साह ने 1598 में रखी थी. #चैनपुर_राज भी उन्ही की जागीर थी. 1734 ईस्वी में पूरनमल ने राजा की जगह ठकुराई की उपाधि अपना ली. और 1827 से #ठकुराई_जयनाथ_सिंह अलग से चैनपुर राज की गद्दी पर बैठ गए.  यानि उस समय चैनपुर मुख्य नगर हुआ करता था न कि डाल्टनगंज. जबकि मुगलों के समय में लेस्लीगंज एक बड़ा व्यापारिक केंद्र था जहाँ एक बड़ी सैनिक छावनी थी, अंग्रेजों के समय तक भी लेस्लीगंज ही इस क्षेत्र का मुख्यालय हुआ करता था.

तो सोलहवीं शताब्दी के पहले पलामू में किसका राज था? कोई संगठित साम्राज्य था इस क्षेत्र में या फिर जंगल राज ही था कबीलों का? इस जवाब के लिए आइये हम बिहार के इतिहास पर एक सरसरी नजर डालें. 1556 में मुग़ल साम्राज्य के अंतर्गत बिहार प्रोविंस का निर्माण हुआ लेकिन उसके पहले शेरसाह सूरी (1540-1555) ने शाषण किया. बिहार में इस्लामिक शाषण 1200 इसवी में खिलजी द्वारा नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों के विनाश से आरम्भ होता है. करीब इसी समय मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर भारत से हिन्दू साम्राज्य का अंत किया था. उसके पहले 6ठी शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक सेन और पाल वंश का शाषण था. मगध साम्राज्य का काल 450 BC से 500 ईस्वी तक का था, यह भारत में लौह युग का समय था. मगध के पहले करीब 1500 BC तक का समय उत्तर वैदिक काल का माना जाता है. सिन्धु घाटी सभ्यता भारत में कांस्य युग (3300 BC) का आरम्भ है. उसके पूर्व 'ताम्र युग' 3500 BC तक, 'नव-पाषाण युग' 10,000 BC और सबसे पहले करीब तीन लाख वर्ष से 'पूर्व-पाषाण युग' यानि वह समय जब आदि मानव गुफाओं में रहते थे.

अब फिर से मेरे सवाल पनपने लगते हैं. क्या आदिमानव के समय से ही पलामू में भी सभ्यता का विकास प्रारंभ हुआ था? क्या कोई नदी घाटी सभ्यता इधर भी विकसित हुई थी? क्या पुरातत्व के कुछ अवशेष पलामू में भी विद्यमान हैं जो पाषाण, ताम्र, कांस्य या लौहयुग में इस क्षेत्र में मानव विकास की गाथा कह सकें?

शायद मुझे अपने सवालों के जवाब अब मिल जायेंगे. कैसे? कहाँ?

डाल्टनगंज से करीब 95 km और हुसैनाबाद से 15 km की दुरी पर, सोन और उत्तर कोयल के संगम पर स्थित एक गांव है #कबरा_कला. सोन नदी के दूसरी तरफ करीब 20 km की दुरी पर स्थित है इतिहास प्रसिद्ध रोहतास किला.

क्रमशः ...

© सत्यान्वेषी

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