हाँ एगो बात बा कि पहिलका पढ़ाई-लिखाई आउ अब के पढ़ाई-लिखाई में अकाशे-पताल के अंतर बा। पहिले के पढ़ल हमार माई मिडिल फेल रहे, पर उकर जानकारी के जोड़ आउ प्रश्न के जबाब हमनी भाई लोग के काबिल एम.ए. पास मेहरारूओ के पास नइखे। मने रउरन सब हमनी के मौगी के ज्ञान पर संदेह मत करब, ई त हम बात के उतारू बात बतौले ही।
हमार माई बचपन मे ठंढा में सुबह सुबह कुईआं पर बर्तन मांजत रहतक आउ हम उहंई दत्ती पर बइठल-बइठल घामा तापते-तापते भर में तीस तक पहाड़ा रट लेले रही। साथे-साथे अढैया_डेढ़ा_सवैया भी माई हमरा मुंहजबानी याद करा देले रहे। उ चूल्हा में चिपरी पर खाना बनावइत रहित और हमरा चूल्हा भीर बैठाके प्राथमिक शिक्षा देवईत रहतक। आज ओकरे देवल ज्ञान से हम आपन सुखी जीवन बितावत हिये।
आउ एक तरफ आजकल के मौगीन हथ जे बिना कैलक्यूलेटर के 'चार नावाँ' और 'सत सते' भी बतावे के हालत में नइखन, 'पाव_असेरा_पसेरी_मन' के त गोलीए मारल जाव। आउ त आउ, एक बार सोचली कि आज के मेहरारू सब अंग्रेजी मीडियम के हवा पानी के बड़ीन तो घर के एगो मेहरारू से पुछली कि कइसे जानब कि फलनवा साल में फरवरी केतना दिन के बा? 28 के कि 29 के? त उ माउगो धड़ाक से जबाब देलिन कि- "एकरा में कोउन मेहनत बा! कैलेंडर में देखलेब!" इ सुन के हमार करेजा बाग-बाग हो गइल! इहे बा पढ़ाई लिखाई में बढोत्तरी?
आज के सबे महतारी आपन बच्चा के LKG से ट्यूशन लगा दिहें, काहे कि अपने पढावे के सहूर आउ काबिलियत नइखे। दोसर बात इहो बा कि टीसन पढ़े के नकलची रेसा-रेसी भी मचलबा। सब के शिक्षा और साक्षरता में फर्क नईखे बुझाइत। बेटा-बेटी के महंगा_स्कूल में पढ़ावे ला एगो फैशन बन गेल बा।लेकिन कोई माई आपन लईकन साथे बइठ के जीवन के ज्ञान ना सिखइहें जे कि उ आपन अनुभव से सिखले होईहें। आजकल के सब स्कूल भी तो खाली किताबी-किड़ा बनावे वाला फैक्ट्री हो गइल बा। सोचल जाव एकर बारे में।
आज के जनाना के खाली कान में इयरफ़ोन लगाके खाना बनावे के बा आऊ शॉपिंग चाहे टेलीविजन के सीरियल। लइकन के परवरिस में भी इ फैशन रोड़ा बनल बा। आज के छोट मासूम बच्चवन के तो इहो लागेला कभी-कभी कि उनकर जन्म माई के पेट से नइखे भइल बल्कि उ फ़ोन से डाउनलोड होइल बड़न। काहे कि उ आपन 'मम्मा और डैड' के दिन रात 'व्हाट्सएप्प और फेसबुक' से चिपकल देखले बड़न। (यहां पर मेरा मकसद आज की पढ़ाई व्यवस्था पर टिप्पणी है, न कि महिला शिक्षा पर)
लेकिन आज के लइकन के सामान्य ज्ञान में बेसे बढ़ोतरी भइल बा। ओकर एगो उदाहरण देवत ही। हमार एगो छोट भाई जे हमरा से छह सात साल के छोट बा, उ जब 8वाँ/9वाँ में रहे, ओकरा से पुछल गेल कि गाय के बछड़ा के जन्म कइसे हो ला? तो उ घरी उ बतावत रहे कि गाय के पूंछ के महुआ के पेड़ तर गाड़ देला से गाय के बछड़ा हो जाला! असल में भइल इ रहे कि हमार घर के गइया महुआ के पेड़ तर बियाइल रहे। भाई उहे देखले सुनले रहे तो उहे बात ओकर मन मे बइठ गेलक।
आउर अब के 2रा/3रा क्लास में पढ़े वाला बुतरू तो पूरा 'प्रजननकाल से लेकर शैशवकाल तक' वर्णन कर दिहें! नेट अखबार आउ टीवी के सहारे दिन दुनिया के औसत जानकारी जरुर बढ़ गेल बा उ सब में। लेकिन जीवन खाली जानकारी के सहारे नहीं न चली, ओकर ला संस्कार आउ सहुर के भी ओतने आवश्यकता बा। 'जानकारी' आउ 'बुद्धि' दूनो अलग अलग चीज बा जइसे कि' साक्षरता' आउ' शिक्षा'! एकर बारे में सत्यान्वेषी जी आपन अगला आलेख में विस्तार से बतइहें।
तो हम बतियात रही आज कल के पढाई के बारे में। भले आज के विद्यार्थी आंकड़ा के धनी हथ लेकिन ई शिक्षा व्यवस्था उ सब में संस्कार आउ व्यावहारिक समझदारी नईखे डाले पारइत। उ आपन माई के 'वाइफ ऑफ डैड' और पिताजी के 'हस्बैंड ऑफ मॉम' भी कहअ लन! आउ न जाने का का कहअ लन! लेकिन सबसे खराब बात ई बा कि ओकरे में हमनी माता-पिता अपने आप के गौरवान्वित महसूस करीला कि हमार बच्चवन पूरा अपडेट बड़न। ई सांस्कृतिक_प्रदूषण के प्रथा रुके ला चाही। हम आधुनिकता के विरोधी एकदम नईखी। बस अंधानुकरण के साजिश के रोके के जरूरत बा। आपन जड़ से जे कट जाई ऊ समाज आपन अस्तित्व भी ना बचावे पारी आने वाले समय में। देश के कै गो जनजाति और भाषा लुप्त हो गेलन ईहे कारण।
खैर ई हमार विचार रहे, फिर कुछुओ नया अचेतन मन से चेतन में लावे पर रउआ सब के सामने परोसब। आप सब के कइसन लागल, जरूर टिप्पणी करब।
जोहार!
© Dinesh Kumar Shukla
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