30 जनवरी 1948। दिन था शुक्रवार।शाम के 5.17 बज रहे थे। जब सफेद धोती पहने गांधीजी शाम की प्रार्थना के लिए जा रहे थे।उसी वक्त उनपर तीन बार गोलियां दागी गईं थी।
किसने मारा, क्यों मारा? उस बुढ़े,कमजोर आदमी की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी? हमारे बापू,जिसके एक हुंकार पर लाखों लोग एकत्रित हो जाते थे। जिसने अहिंसा और सच्चाई की ताकत से दुनिया को परिचित कराया था। जो सबकी खुशी और देश की आजादी के लिए अनगिनत कष्ट सहने के लिए तैयार रहता था। पूरे देश में यह खबर आग की तरह फैल गयी थी। सैकड़ों साल पुरानी गुलामी का अंधेरा खत्म हुए, अभी कुछ ही महीने तो गुजरे थे।
माँ बताती है कि शनिवार को 'हरिनामांड(तिवारीडीह)' के स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गयी थी।गुरुजी ने बताया था कि गांधी बाबा मर गये। वह रोते-रोते घर पहुंची थी।नाना को बताया कि -" गांधी बाबा मर गइलन,अब देश कइसे चली।' पिताजी बता रहे हैं कि डाल्टनगंज से सब्जी खरीदने आने वाले व्यापारियों से उन्हें पता चला कि गांधी बाबा नहीं रहे।खबर मिलने के बाद पूरे गांव में लोग गमगीन हो गये थें। बहुत घरों में खाना नहीं बना था।
गांधी जी के समकालीन 'रसूल मियां' के इस भोजपुरी गीत से लोकव्यथा को समझा जा सकता है कि गांधी शिष्ट समाज ही नहीं बल्कि लोक में निवास करते थे।उस दुखद खबर से सभी आहत थे। दुखी थे। आज, अब उनका शरीर तो नहीं रहा लेकिन उनके विचार अमर हैं।
"के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो
कल्हीये आजादी मिलल, आज चललऽ गोली,
गांधी बाबा मारल गइले देहली के गली हो, धमाधम तीन गो…
पूजा में जात रहले बिरला भवन में,
दुशमनवा बैइठल रहल पाप लिये मन में,
गोलिया चला के बनल बली हो, धमाधम तीन गो…
कहत रसूल, सूल सबका दे के,
कहां गइले मोर अनार के कली हो, धमाधम तीन गो…
के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो…।"
गीत-रसूल मियां
गायन- Chandan Tiwari
प्रस्तुति: अजय शुक्ला
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