Thursday, July 5, 2018

रेडियो 103.3


दुकान में कुछ इलेक्ट्रॉनिक आइटम ढूंढ़इत हली। तबे एगो  रेडियो देखायल। बहुत सुंदर रहे, एकदम रंगीन लेकिन देखे में तनी बड़ हलक। कंपनी के  नाम पुछली तो कहलक  "सारेगामा का है।" दाम बतइलक तो हम सोचे लगली कि एतना दाम रेडियो के रहेला! आउ अब आज के टाइम में सुनेला के रेडियो? पर रेडियो के भी अपन टाइम रहे। उ टाइम तो हमार बाबूजी भी रेडियो के पुरा शौकीन हलन। हर 2 साल पर छठ के पूजा के दक्षिणा से एगो नया रेडियो ले लेव हलन। अभी कुछ साल पहिले तक रेडियो बजा के अपन दिनचर्या करत रह हलन। केतना बजे तक दाढ़ी बनाना, केतना बजे तक शंख बजाना, केतना बजे तक खाना खा के घर से कचहरी ला निकल जाना - सब रेडियो के कार्यक्रम से फिक्स रह हलक। आउ जवन दिन देर होइतक समझ लिहुँ उ दिन कार्यक्रम के प्रसारण बन्द। गोसाये के बहाना मिल गेलक आउ का! बिना खइले नौकरी करे पार।
 
खाली उहे नाही, आउर भी बहुत लोग हलन गांव में रेडियो के शौकीन। गांव-घर मे हीरो बने वाले भी बढ़िया कपड़ा पहिन के, गमछा बांध के कपार में,  साथे हाथ मे रेडियो में गाना बजाते गलिये-गलिये  चक्कर लगावत रह हलन। आउ रेडियो के आदत लगतक काहे नही, सब कार्यक्रम भी तो एक से बढ़कर एक रह हलक।

पर हमीन के तो शाम के टाइम FM103.3 पर डालटेनगंज के प्रसारण सुनेला जरूरी रह हलक।      एगो लोक_गीत के कार्यक्रम रह हलक। अब सिंगर के नाम तो ईयाद नईखे लेकिन दु ठो गीत जरूर इयाद बा।

एगो हलक-
'निमिया पतैईया झरि जाला
अँगनवा कैसे बहारूं जी... '

और दूसर हलक-
'साइकिल के टूटल बा चयनवा
गिरल बा सजनवा ए सखी...'

तब उसके बाद शुरू होव हलक 'चल_हो_गांव_में' फुलवा बहन आउ राजू भैया वाला कार्यक्रम। सुने में ओतने ही मजेदार और सीखे वाला बात भी, एकदम जानकारी से भरल। ओकरे में जे नाटक रह हलक   ओकर चलते तो 15 मिनिट तक कहीं उठ के जइबे ना कर हली। नाटक के माध्यम से ही गांव वलन के सिखावल जा हलक। रासन-पानी से जुड़ल जानकारी सब बतावल जा हलक।

आउ ओकर बाद समाचार के टाइम गारजीयन लोग एकदम शांत, जैसे कि मोदी जी के मन के बात चल रहल होखो। कौनो लइकन बोलत पहुंच जाए उधर से तो सब इशारा में ही ओकरा चुप करवा देव हलन। हमरो घर BBC के न्यूज़ सुनल जा हलक। 15 मिनट हिंदी में आउ ओकर बाद 15 मिनिट अंग्रेज़ी में। अब हिंदी घरी सब चुप-चाप होके सुन लेती। पर जब अंग्रेजी शुरू होइतक तबो कोई बन्द ना करतक, काहे कि अब कोई शक ना करे कि अंग्रेजी न आवे।(खैर पहिलका जमाना के पढल आदमी के अंग्रेजी बहुत बढ़िया होव हलक एकर में कउनो दु मत नईखे।) फिर भी एके बतिया के दुबारा सुने में केतना मन लगी समझ सक ही।

हम तो 2003 के पूरा वर्ल्ड_कप रेडियो में कमेंट्री सुन के पार कइले हली। ओकरे नतीजा हलक कि घरे सब क्रिकेट के बात भी जाने लगलन, न तो अइसे क्रिकेट खेले के नाम पर तो बाबा से केतने बार 'लोफर' सुन चुकल  हली। आउ जवन दिन इंडिया पाकिस्तान से मैच होइतक उ दिन तो सब लोग रेडियो के चारो तरफ घेर के एक- एक बाल के खाली सुन के मैच में खो जा हली। पूरा फिल्ड फिल्डिंग सब आँख के सामने दिखाये लग हलक। उ कॉमेंट्री के बीच मे 'ये लगा डाबर च्यवनप्राश चौका' सुन के जे खुशी मिल हलक, ओतना मजा तो कोल्ड ड्रिंक्स का गिलास लेके लाइव मैच देखे में भी नहिये आइल।

बाद में 10 बैंड वाला रेडियो भी आ गेल हलक। शॉर्ट, मिडियम, एफ एम आउ एगो TV। अभी लइकन तो जानतो न होइहें कि ई चारो केकर नाम बा। हाँ तो ओकर में TV हमीन ला सबसे मेन हो गेल रहे। जवन दिन सिनेमा देखते- देखते लाइन कट जईतक, उ दिन बाकि सिनेमा रेडियो पर ही सुन के समझ जा हली। पलामू के लोग समझ हथ कि सिनेमा भी सुने के चीज़ बा! हमर माई तो एगो सीरियल देव हलक 'एहसास-कहानी एक घर की'। ई सिरियल के मुश्किल से 2 से 4 एपिसोड उ TV पर देखले होई। न तो लगभग 2 साल तक रेडियो पर सुनिए के पार कर देले हलक।

आउ  दोपहर मे विविध भारती में 90 के रोमांटिक गाना सुन के तो बचपने मे ही लग हलक कि केतना बड़का मजनू बन गइल  ही। भले प्यार के प भी न पता हो। सबसे मजा तब आइल हलक जब गांव के सब बुढवन के नाम पर पोस्टकार्ड से डालटेनगंज FM में गाना फरमाइश कर के बजवा देले हली। आउ उहो गाना ऐसा कि बूढ़े मारे शरम के पितपीता जाथ, ऊ गाना कवन हलक बताऊ -
'जो बीच बजरिया तूने मेरी पकड़ी बैयाँ
मै सबको बोल दूँगी
रात मा कोई न जागे आइयो सइयां
मै खिड़की खोल दूँगी'

आपलोग भी बचपन के रेडियो से जुड़ल कहानी बताइये और हाँ माई चाची से पूछ के गितवा पूरा पता चले तो जरूर कमेंट करियेगा...

© Anand Keshaw

No comments:

Post a Comment