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यूँ तो इस बार हर तरफ स्वतंत्रता दिवस का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है या मनवाया जा रहा है जिससे घर घर तिरंगा विराजमान हो गया है।मगर हमे आज भी याद है वो बचपन के दिन जब 15 अगस्त या 26 जनवरी हमारे लिए देशभक्ति के प्रदर्शन से ज्यादा एक उत्सव की तरह होता था...
ऐसा नहीं है कि हमारे जमाने में स्वतंत्रता दिवस धूम-धाम से नहीं मनाया जाता था। हमारी तैयारी तो कई हफ्तों से चलती थी, पर आज आपको सिर्फ 15 अगस्त की दिनचर्या बताते हैं। उसी से आपको हमारे वक़्त में स्वतंत्रता दिवस के आयोजन की भव्यता का अंदाजा लग जायेगा। उस वक़्त हर घर में तिरंगा फहराने का परमिशन नहीं था। सिर्फ सरकारी कार्यालयों या विद्यालयों में ही झंडोतोलन हो सकता था। हालांकि तब तिरंगा खरीदना सबके कपैसिटी की बात भी नहीं थी।
हमारे गांव में एक सरकारी स्कूल था और ध्वजारोहण का कार्यक्रम भी सिर्फ वहीं पर होता था। झंडोत्तोलन और ध्वजारोहण मे फर्क़ है, कुछ लोग शायद इससे वाकिफ होंगेl सुबह भीनसारे होने से पहले ही #प्रभातफेरी का आयोजन किया जाता था। प्रभात फेरी बच्चों की वह शानदार रैली होती थी, जो भोरे भोरे आस-पास के समूचे इलाके में घूम कर स्वतंत्रता दिवस का माहौल सेट कर देती थी। इस परंपरा की शुरुआत हम देश को मिली नयी नयी आज़ादी के समय से जोड़ सकते हैं, जब अखबार समाचार इतने सुलभ नहीं थे, दो जून की रोटी में मगन जनता को पता भी नहीं होता था कि 15 अगस्त कब आ गया और क्यों आ गया। तब शायद सरकार की ओर से जागरूकता फैलाने के लिए प्रभात फेरी का आयोजन किया जाने लगा। हालांकि सन 47 के पहले भी बड़े नेताओं की भीड़ जुटाने के लिए या फिर आजादी का अलख जगाने के लिए प्रभात फेरी का आयोजन होता था।
खैर अभी हम अपने #बचपन के प्रभात फेरी में लौटते हैं। फेरी में कौन-कौन से नारे लगने हैं, इसका डिसिशन एक दिन पहले ही बच्चों द्वारा बहुमत से ले लिया जाता था। पता नहीं क्यों लेकिन 'डॉ लोहिया की जय' सबका फेवरेट होता था। खूब लड़ी मर्दानी, वंदे मातरम, सारे जहां से अच्छा आदि गीतों के मुखड़े भी नारों की शृंखला में शामिल रहते थे। चूंकि उस वक़्त रेडीमेड झंडा उपलब्ध नहीं होता था, तो हम सब बच्चे जिस्ता वाले सफेद पन्ने को छड़ी में चिपका कर झंडा बनाते थे, जिसके लिए मोम वाली रंग या वाटर कलर का इस्तेमाल होता था। कोशिश यही रहती थी कि सभी बच्चों के हांथों में तिरंगा झंडा जरूर रहे। कुछ न मिले तो कम से कम डंडा लाठी जरूर रहे, जो कभी जोश भरने के काम आते तो कभी गली से कुत्ते से बचाव के लिए। जिस बच्चे की नींद भोर में सबसे पहले खुलती था, उसकी जिम्मेवारी होती थी कि गांव में सभी बच्चों के घर खटखटा कर अलार्म बजा दिया जाए। हाफ-पैंट में ही, हांथ में डंडा- झंडा लिए भोरे-भोरे हम सभी बच्चे अपने-अपने घरों से प्रभात फेरी में शामिल होने के लिए निकल जाते थे। प्रभात फेरी के रूट का डिस्कशन बहुत डिटेल के साथ होता था। अगर किसी के घर वाले देर तक सोते रहते थे, तो उधर फेरी आखिरी में जाएगी। नारा लगायें तो कोई सुनने वाला भी तो होना चाहिए ना जी। अगर किसी गली में कोई काना कुत्ता दौड़ाता है, तो उधर नहीं जाना है। हमारी कोशिश रहती थी कि उजाला होने के पहले ही फेरी खत्म कर के नारा लगा के लौट आएं। उस वक़्त मोबाइल फ़्लैश लाइट या टोर्च तो होती नहीं थी। और बारिस का मौसम ऊपर से घनाघुप अंधेरा। तो हम लोग घर से माचिस की तिल्ली ले कर आते थे, लकड़ी की छड़ी में आग जला कर मसाल बनाने के लिए। इससे क्रान्तिकारी होने का जबर अहसास होता था। फिर अंधेरे में लाठी पटकते हुए नारा लगाने में जो मज़ा आता था ना कि क्या बताएं। अंदर से जोश भर जाता था। संघ की शक्ति के अहसास से अंदर का भगत सिंह जाग जाता था। कभी कभी ज्यादा क्रांतिकारी होकर हम पड़ोसी गाँव को दुश्मन देश समझ कर बदला लेने की मासूम रणनीति पर भी काम कर लेते थे। प्रभात फेरी में गांव और आस पास के एक दो किलोमीटर तक तो पूरा राउंड में हमलोग कवर कर ही लेते थे, पहली बार मौका जो मिलता था ग्रुप में हल्ला मचाने का इस तरह।
प्रभात फेरी जब लौट कर गाँव के विद्यालय पहुंचती थी, तो हमें जल्दी-जल्दी चबूतरा (झंडोतोलन का स्थान) साफ कर के सजा लेना होता था। किरण फूटते ही यह सब काम कर के घर भी लौटना होता था, नहा धोकर वापस समारोह में शामिल होने के लिए घर घर से फूल तसीलते हुए। कुछ बड़े स्कूल में लाउड स्पीकर से देशभक्ति के गाने बजने लगते थे। वही गाने जो हम कुछ दिन पहले स्कूल मे बेचने आए देशभक्ति गीत की किताब से रट रहे होते थे। उस दिन न जाने क्यों गाने की धुन दिल में सिहरन पैदा कर देती थी। भाषण प्रतियोगिता के लिए रटे गए लाइन जैसे दुगनी ऊर्जा से बाहर निकलने वाले थे।
तब तक सभी शिक्षक और गांव वाले भी स्कूल कैंपस में जमा होने लगते थे। दनादन कुछ बच्चे रंगबिरंगी झंडियां काट कर सुतरी में चिपका कर परिसर को सजाने में लग जाते थे।तो कुछ फूल से चबूतरा पर कुछ-कुछ सुंदर आकृतियां बनाने लगते थे। आटा अबीर से जमीन पर देश का नक्शा बनना भी अलग कौतुहल का विषय होता था। हमारे स्कूल का चपरासी झंडा बांधने में एक्सपर्ट था, तो उस काम को करने का पेटेंट उसी के पास था। झंडा बांधते समय हम सभी बच्चे बहुत भक्तिभाव से उसको देखते रहते थे कि कैसे वो झंडा के बीच में फूल रख, मोड़ रहा है और कैसे रस्सी का फंदा बना रहा है। उसकी कला आज भी मेरे लिए एक अबूझ पहेली है। लेकिन मजाल थी कि झंडा कभी भी जमीन से छू जाए। झंडे की गरिमा हमेशा बनी रहे, इसका बहुत ही खास ध्यान रखा जाता था। तिरंगा झंडे को हमेशा हमलोग बहुत पवित्र मानते थे और झंडे को कभी रखना भी हुआ थोड़ी देर के लिए, तो दीवाल से ओट करके रखते थे, ताकि झंडा पर किसी का गलती से भी पैर ना लगे, नाहीं झंडा जमीन को छू पाये।
स्कूल में हर कोई अपने हैसियत के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ दिख रहा होता था। सभी बच्चे बहुत पहले से ही उस दिन पहनने वाले कपड़ों को आयरन कर के रख लेते थे। हमारे शिक्षकगण भी खादी का कुर्ता और उसपर फबती बंडी जैकेट पहनने को वरीयता देते थे। प्रधानाध्यापक महोदय तो एक कदम और आगे बढ़ कर गांधी टोपी भी धारण करते थे।
तकरीबन 8 बजे प्रधानाध्यापक महोदय झंडोतोलन करते थे और उसके तुरंत साथ में ही राष्ट्रगान शुरू होता था। उसके बाद सांस्कृतिक प्रोग्राम चालू हो जाता था और बजट के हिसाब से हम बच्चों में पंचपईसवा टॉफी (आज के दिन में आपको शॉपिंग मॉल में 'हार्ड बॉयल्ड कैंडी' कह कर चमकदार डब्बे में काफी महंगा मिलेगा) बांटा जाता था। कुछ बच्चे जो प्रभात फेरी के बाद जब घर लौटते थे तो वहीं से उनकी माताजी लुकमा लेकर खेत में भेज देती थी। बेचारे बहुत बार हफ्तों भाषण की तैयारी करते थे पर पारिवारिक व्यस्तता के कारण वक्त पर भाषण नहीं दे पाते थे।
तकरीबन 11 बजे के आस-पास झंडोतोलन कार्यक्रम खत्म हो चुका होता था। शिक्षकगण भी अपने-अपने घरों को लौटने लागते थे। लेकिन तिरंगा झंडा शान से शाम तक लहराता रहता था और अंधेरा होने के पहले उसे उतारने की जिम्मेवारी 7वां क्लास का मॉनिटर को दिया जाता था। उसके पहले दूरदर्शन पर हम रोजा फिल्म का रिवीजन कर चुके होते थे। कोई दोस्त किसी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार लेकर ख़ुश हो चुका होता था, कोई अगली बार की रणनीति बना रहा होता था।
आज जब शिक्षा का पूर्णतः व्यवसायीकरण हो चुका है और 15 अगस्त अर्थात छुट्टी का दिन हो चुका है। बहुत तकलीफ होती है जब आज के अंग्रेज़ी कल्चर वाले स्कूलों में नई रिवाज देखता हूँ। प्रभात फेरी की इतनी शानदार परंपरा तो अब यादों के झरोखे में ही कैद है।
आप सबों को स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ पर #ठेठ_पलामू की ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
© रोहित, राकेश, गोविंद, शिवांगी, स्वामी, मुकेश
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