Tuesday, August 9, 2022

डाल्टनगंज कि मेदिनीनगर ?

 अगर यही सवाल महाराष्ट्र में पूछ लीजिये कि मुम्बई या बम्बई, तो आपको दिन में तारे दिखते समय नहीं लगेगा। मद्रास भी चेन्नई बहुत आसानी से बन गया। तमिल लोग गलती से भी चेन्नई को मद्रास बोलते नहीं दिखेंगे। तो फिर क्या वजह है कि हम अपने बोलचाल में मेदिनीनगर बोलने में हिचक महसूस करते हैं? लाख कोशिश कर लीजिए डाल्टनगंज है कि जाता ही नहीं है और मेदिनीनगर है कि आता ही नहीं है, जबान बोलने से भी इनकार कर देता है।

डाल्टनगंज है भी तो वैसे औपनिवेशिक शासन की देन। स्कूल में केमिस्ट्री किताब में जॉन डाल्टन पढ़े तो लगा कि 'ओ तो ये हैं डाल्टन साहेब, हमारे शहर के संस्थापक!' बाद में मेडिकल के दोस्त मजाक भी बनाते थे कि डालटोनिज़्म अर्थात कलर ब्लाइंडनेस भी तुम्हारे यहां से ही आया है। बाद में पता चला ढेरे डाल्टन हुए हैं इतिहास में।
कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग डाल्टनगंज का नाम बदलने को लेकर पिल पड़ गए और नाम बदलवा के भी माने। अपनी जगह पर उनका तर्क भी सही ही होगा। नाम में क्या रखा है? बदलते रहता है। उससे वास्तविकता में कोई बदलाव थोड़े आता है। एक पुराना जोक याद आ गया कि कुत्ता का नाम शेरू रख देने से वो कुत्ता ही रहेगा ना, शेर थोड़े हो जाएगा। फिर तो हम लोगों को बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिये थी, मेदिनीनगर नाम को स्वीकार करने में?
लेकिन सच्चाई है इसके बिलकुल उलट। जब से हम लोग होश संभाले हैं, डाल्टनगंज का अस्तित्व था और रहेगा। डाल्टनगंज कोई हाइवे के किनारे का कसबा नहीं था, जो धीरे धीरे हाइवे के चारों ओर बढ़ता चला गया और फिर हाईवे को बाइपास करना पड़ा। डाल्टनगंज देश के सबसे पुराने शहरों में से एक है और जिसका इतिहास एक सदी से भी पुराना जाता है। हर बड़े शहर की तरह इसकी अपनी कॉस्मोपॉलिटन संस्कृति है, जिसमें अवधि, मगही, भोजपुरी, हिंदी, उर्दू, बंगाली, आदिवासी और न जाने कितने संस्कृतियों का मिश्रण देखने को मिल जाता है। डाल्टनगंज तब भी था जब हमारा राज्य बिहार नहीं बंगाल कहलाता था। डाल्टनगंज किसी भी गाँव के सबसे बुजुर्ग इंसान के जन्म के पहले से है, तो कोई ये कहे कि इसका नाम ये था, वो था और अब ये हो गया है, तो भाई हमर ला तो ई डाल्टनगंज ही रहेगा। अगिलका पीढ़ी के शायद मेदिनीनगर बोलने में सहूलियत हो जाये, हमरा से तो नहीं हो पायेगा।
डाल्टनगंज हमारे लिए मेदिनीनगर हो भी नहीं सकता है, उसमें वो फीलिंग्स ही नहीं आती है, वो जुड़ाव ही नहीं महसूस होता, जो डाल्टनगंज के लिए होता है। डाल्टनगंज बाहर के लोगों को बोलो तो एक हिल स्टेशन वाला फीलिंग्स आता है। वैसे भी डाल्टनगंज हमारे लिए सिर्फ एक शहर नहीं है, ये तो लालटनगंज, ढिभरीगंज, डी-गंज और ना जाने कितने रूपों में हमारे अंदर समाया हुआ है। आचार्य श्रीलाल शुक्ल जी के शब्दों में हम सहीं मायने में गंजहा हैं, नगरिया नहीं बनना हमें।
©सन्नी शुक्ला
( ये लेखक के निजी विचार हैं। हम मेदिनीनगर नाम के प्रसंशको से उनके विचार कमेन्ट बॉक्स में आमंत्रित करते हैं। )
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