Monday, November 26, 2018

देवउठान


आज देवठान  है , अगर हम हिन्दू पंचांग के हिसाब से देखें तो शुभ कार्य आज ही के बाद से ही शुरू हो जाता है। वैसे पुराणों की बात करें तो ऐसा वर्णन है कि आषाढ़  शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी  को भगवान विष्णु सो जाते हैं और चार महीने बाद कार्तिक  मास में आज ही के दिन भगवान विष्णु शयन निद्रा से जागते हैं और सृष्टि का कार्यभार देखते हैं, इसीलिए आज के एकादशी तिथि को 'देवउठनी ' एकादशी भी कहा जाता है। ये तो रहा #देवठान पूजा करने का कहानी पर हमलोग के लिए तो थोड़ा अलग ही रहता था।

जैसे ही तुलसी चबूतरा  के आस-पास अँगना लिपाना  शुरू होता तो समझ जाते कि आज देवठान है। अब ठंडा के दिन में घाम कम न निकलता है, इसलिए सुबह-सुबह ही लीपना  पड़ता था काहे कि देर हो जाने से फिर सूखेगा नही तो उसपे विवाह मंडप कैसे बनेगा? जल्दी-जल्दी सब काम कर के दुनो दादी लोग अँगना में बैठ जाती थीं मंडप बनाने। केतारी  के चार डांठ तुलसी जी के चबूतरा पास रख के मंडप बनता था आऊ फिर अंगना में जमीन में चाउर पीस के उसके घोल से बनता था, डिजाइन वाला खड़ाऊ । पहिले भगवान जी के खड़ाऊ बनता उसके बाद घर भर के आदमी के खड़ाऊ बनता। हमलोग पूरा ध्यान से बैठ के आँख गड़ा के देखते रहते कि अपना बनता है कि नहीं। इहे चक्कर में घर भर के आदमी का गिनती आऊ अँगना में बनने वाला खड़ाऊ के जोड़ी का गिनती चलते रहता। पर दादी लोग अपन गिनती पर पूरा कॉन्फिडेंस में टेंशन फ्री हो के बनाती रहतीं। हराम जे केकरो मिस हो जाए। घरे के सब आदमी के बनाने के बाद अलगे एगो कोना में बनता हर-जुआठ आऊ साथ में महतो बाबा  आऊ अजोध (अयोध्या) का डिजाइन भी बनाया जाता था। ई दुनो हमर घर के हरवाहा  थे, तो जब पूरा परिवार के लिए खड़ाऊ बनता था तो उनके लिए भी बनाया जाता था।

इसके बाद का काम था पूरा घर के दीवाल में 'श्री सीता राम' आऊ दरवाजे पर शुभ-लाभ, स्वागतम लिखने का। अब चूँकि गाँव का माटी का घर छोटा तो था नहीं कि एक आदमी से लिखा जाए और ऐसे भी अँगना में मंडप बनाते-बनाते दादी लोग को देर हो जाता था तो ये काम हमलोग को भी मिल जाता था। उसके लिए हमलोग पहिले से दतवन_का_कूची बना के उसके ऊपर सूती कपड़ा बाँध के तैयार रहते थे। जैसे ही दादी कहती कि "लिख दे तो चिंया" बस उसके बाद सब बच्चा लोग में कॉम्पीटिशन स्टार्ट कि के केतना लिखने सकता है।

एक बार तो हमको लिखने मिला तो गलती से पूरा दीवाल पर लिख तो दिए,पर सीता राम के सीता में दिरघी  के जगह हरसी कर दिए। अब लिखा गया उसको कैसे हटाया जाए और दुधी_माटी से लिपाया दीवाली में ही सो दुबारा लिपाता भी नहीं। पूरा साल भर उ ऐसे ही रह गया कोई आए पूछे तो बस सब मेरा नाम बता देता कि उहे गलत लिख दिया है और हम कहते रहते कि गलत कहा है, है तो 'सीता' ही न। खैर बाद में स्कूल में जब कुटाये इसके लिए तब पता चला कि सिता मने चीनी होता है। घर के दीवाल में राम नाम लिखते काहे है? जब दादी से पूछते तो कहती थी कि "जब लंका में आग लगाईले हलथि हनुमानजी तो सब के घर जर गइल हलइ खाली विभीषण के घर छोड़ के, काहे कि विभीषण के घर में राम नाम लिखल हलई, वैसे ही घर में राम नाम लिखला से कोई संकट ना आवे।" अब आफत, विपत, संकट से हमलोग के का दिक्कत जब आवे तब न जाने, लेकिन इहे बहाने दीवाल में अापन कलाकारी देखावे के मौका मिल जाता था, वही बहुत था। शाम में पूजा के बाद पर-पकवान परसादी में मिल जाता था सो अलगे ।

खैर अब हम तो घरे हैं नहीं नई तो देखबे करते कि हमर खड़ाऊ बना कि नहीं। अगर आपलोगों के घर होता है, तो जरूर ध्यान से देखिएगा और हो सके तो फोटो भी भेजिएगा।

Anand keshaw 


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