आने वाले त्योहारों की चर्चा करते ही आज लीलावती की आँखों से आँसू अनायास
ही झरने लगे। उसने कहा "हमनी खातिर का हई परब आउ तयोहार दारू आ पईंचा से त जीअल हराम होइल बा।"
उसके आँसू देखकर मेरा भी मन रूआंँसा हो गया और यह सोचने पर मजबूर हो गई कि इतनी तरक्की के बावजूद भी आम जीवन कितना हलकान और परेशान है। खासकर एक स्त्री का जीवन, जो कई मोर्चों पर एक साथ जद्दोजहद करती है।
दरअसल लीलावती के पति ने अपनी बहन की शादी के लिए महाजन से 25000रुपए कर्ज ले रखा था, जिसे पलामू की भाषा में 'पईंचा' बोलते हैं। इस 'पईंचा' में मूल रकम के अलावे हर माह ब्याज भी देना होता है। रकम न चुका पाने की स्थिति में 'पईंचा' लेने वाला व्यक्ति ब्याज के बोझ तले दबता चला जाता है। कई बार तो मरते दम तक वह इससे मुक्त नहीं हो पाता और यह बोझ अगली पीढ़ी पर लद जाता है। कई बार इससे तंग आकर लोग अपनी जान तक गँवा बैठते हैं।
गाँव के पैसे वाले लोग महाजन मजबूर लोगों को समय पर पैसे देकर मदद कर तो देते हैं, पर बेचारा वह व्यक्ति इसके चंगुल में बुरी तरह फँस जाता है और 100 के बदले 150 देता है।
कुछ ऐसे ही चंगुल में फँस चुकी है कामवाली लीलावती। महीने भर जूठन धोकर चंद रूपये जुटाने वाली लीलावती इन पैसों से बच्चों की जरूरतें पूरी करे कि पति के 'पईंचे' की रकम अदा करे। इस बात को लेकर आए दिन पति-पत्नी में झड़प और तीखी नोंक-झोंक होती रहती है और कई बार दिन भर की थकी-हारी लीलावती बिना खाए-पीए डबडबाई हुई सो जाती है। पति रोज मजदूरी के लिए जाए न जाए, पर लीलावती को हर रोज घर से निकलना होता है चंद पैसों की खातिर, ताकि वह बच्चों की फरमाइशें पूरी कर सके। अपने लिए तो उसने कभी कुछ सोचा ही नहीं।
होली-दशहरा में तो मालिक के घर से मिली दो साड़ी ही उसके लिए काफी है। अपनी बाकी की इच्छाओं का वह गला घोंट चुकी है। मुझे तो उसकी सयानी हो रही दो बेटियों की चिंता खाए जाती है कि जो अभी अपनी ननद की शादी पर हुए 'पईंचे' से मुक्त नहीं हुई वो औरत अपनी दो-दो बेटियों की शादी कैसे कर पाएगी? क्या दहेज लोभी इसकी व्यथा समझेंगे? क्या 'पईंचा' देनेवाला ब्याज की रकम माफ करेगा?आखिर बेटी की शादी की बात है। फिर से 'पईंचा' के चंगुल में फँसा परिवार आखिर कब और कैसे इससे मुक्त हो पाएगा?
Sharmila shumee
उसके आँसू देखकर मेरा भी मन रूआंँसा हो गया और यह सोचने पर मजबूर हो गई कि इतनी तरक्की के बावजूद भी आम जीवन कितना हलकान और परेशान है। खासकर एक स्त्री का जीवन, जो कई मोर्चों पर एक साथ जद्दोजहद करती है।
दरअसल लीलावती के पति ने अपनी बहन की शादी के लिए महाजन से 25000रुपए कर्ज ले रखा था, जिसे पलामू की भाषा में 'पईंचा' बोलते हैं। इस 'पईंचा' में मूल रकम के अलावे हर माह ब्याज भी देना होता है। रकम न चुका पाने की स्थिति में 'पईंचा' लेने वाला व्यक्ति ब्याज के बोझ तले दबता चला जाता है। कई बार तो मरते दम तक वह इससे मुक्त नहीं हो पाता और यह बोझ अगली पीढ़ी पर लद जाता है। कई बार इससे तंग आकर लोग अपनी जान तक गँवा बैठते हैं।
गाँव के पैसे वाले लोग महाजन मजबूर लोगों को समय पर पैसे देकर मदद कर तो देते हैं, पर बेचारा वह व्यक्ति इसके चंगुल में बुरी तरह फँस जाता है और 100 के बदले 150 देता है।
कुछ ऐसे ही चंगुल में फँस चुकी है कामवाली लीलावती। महीने भर जूठन धोकर चंद रूपये जुटाने वाली लीलावती इन पैसों से बच्चों की जरूरतें पूरी करे कि पति के 'पईंचे' की रकम अदा करे। इस बात को लेकर आए दिन पति-पत्नी में झड़प और तीखी नोंक-झोंक होती रहती है और कई बार दिन भर की थकी-हारी लीलावती बिना खाए-पीए डबडबाई हुई सो जाती है। पति रोज मजदूरी के लिए जाए न जाए, पर लीलावती को हर रोज घर से निकलना होता है चंद पैसों की खातिर, ताकि वह बच्चों की फरमाइशें पूरी कर सके। अपने लिए तो उसने कभी कुछ सोचा ही नहीं।
होली-दशहरा में तो मालिक के घर से मिली दो साड़ी ही उसके लिए काफी है। अपनी बाकी की इच्छाओं का वह गला घोंट चुकी है। मुझे तो उसकी सयानी हो रही दो बेटियों की चिंता खाए जाती है कि जो अभी अपनी ननद की शादी पर हुए 'पईंचे' से मुक्त नहीं हुई वो औरत अपनी दो-दो बेटियों की शादी कैसे कर पाएगी? क्या दहेज लोभी इसकी व्यथा समझेंगे? क्या 'पईंचा' देनेवाला ब्याज की रकम माफ करेगा?आखिर बेटी की शादी की बात है। फिर से 'पईंचा' के चंगुल में फँसा परिवार आखिर कब और कैसे इससे मुक्त हो पाएगा?
Sharmila shumee

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