नया साल आते ही बेसब्री से सरस्वती पूजा का इंतजार होता था। साल शुरू होने के कुछ दिन बाद से ही माता की मूर्ति बनने का काम शुरू हो जाता था। स्कूल आते-जाते कुछ देर रूक कर हम मूर्ति निर्माण प्रक्रिया को देखा करते थे, मानो हर पल के साक्षी बनने की जिम्मेवारी किसी ने सौंप रखी हो। होली-दशहरा में कपड़ा बने चाहे नहीं बने, लेकिन सरस्वती पूजा में पीला फ्रॉक जरूर सिलवाए हैं 'बजरंग टेलर' में।
बड़ी मजा आता जब एकदिन पहिले अमरूद के बगीचा में, माटी के चूल्हा पर, बड़का कड़ाह चढ़ा के, लक्ष्मण काका बुनिया छाने के कार्यक्रम का श्रीगणेश करते थे। हम बचवन के टोली तो उहें अड्डा जमाए रहते थे कि कउन साइंस भिंडा रहे हैं काका। बड़ी उत्सुकता से हर एक चीज देखते आउ आश्चर्य के दुनिया में डुबकी लगाते रहते। हम तो सोच लिए थे कि बड़ा हो के बुनिया का दुकान ही खोलना है हमको। अब दुकान तो नहीं खुला लेकिन तकिया कलाम जरूर जबान पर चढ़ गया "आपन काम करे दुनिया, हम बजाएं हरमुनिया"।
इ सब करते कम-से-कम दस तो बजिए जाता था। तब तक मूर्ति माई आ जाती थी, आऊ हमलोग अगल-बगल आउ माई से मांग के, रंग-बिरंगा साड़ी, सेप्टी पिन ले के रात भर मूर्ति सजाते थे। इतना उमंग रहता था सब बच्चों में की न थकते थे, न ही नींद आती, भूख-प्यास-थकान सब उड़नछू। एक दो घंटे सोकर फिर भोरे-भोरे उठते आउ फिर लग जाते पूजा के तैयारी में। माला बनाते, झंडी काट काट के सगरो चिपकाते सुतरी में, आरती के तैयारी करते, फिर नया कपड़ा मे सज-धज के पूजा में बैठते, कबो घंटी बजावे के जिम्मा लेते तो कबो परसादी बांटे के रोल रहता हमरा।
आपन पंडाल के काम निमारे के बाद शाम के समय निकाल के निकलते अगल-बगल के मूर्ति देखे आऊ परसादी खाए। घरे आवत तक समूचा कपड़ा बुंदिया के रस से चटचट हो जाता।
सरस्वती पूजा के रात भी उतने रंगीन होता था, हर साल सिनियर विद्यार्थी लोग नाटक करते थे स्कूल में। पिताजी प्राचार्य थे और साहित्य प्रेमी भी, इसीलिए नाटक होता कभी 'गोदान', 'कफ़न', तो कभी 'बड़े घर की बेटी' पर। उस समय मालूम भी न था कि इ सब 'प्रेमचंद' का लिखा हुआ है। पापा के हेड मास्टर होने का बड़ी फायदा होता, हम देर से भी आते, तबो नाटक में आगे ही बैठते।
अइसहीं दूसरा दिन मूर्ति विसर्जन के समय आ जाता, आऊ रो-रो के बुरा हाल हो जाता। आखिरी वाला पूजा खातिर लड़का लोग मूर्ति लेकर घरे-घर आता। माई चाची लोग पूजा करतीं आऊ हम आँसू भरकर चुपचाप देखते रहते। थोड़ी ही देर में 'सरस्वती जय जय' के नारा से पूरा स्कूल परिसर गूँजने लगता और ट्रैक्टर पर माता की मूर्ति रखकर विद्यार्थीगण नदी पोखर की तरफ चल देते, भसान के लिए।
अब मूर्ति विसर्जन के मजेदार किस्से अगले दिन फिर किसी की कलम से पढ़ने को मिलेगी, माँ शारदे की कृपा आप सबों पर बनी रहे। इस असहिष्णुता वाले सोशल मीडिया के डरावने वातावरण में ठेठ पलामू परिवार में प्रेम और अध्यात्म की बारिश होती रहे। तो जोर से बोलिये 'सरस्वती माता की' - जय.
तस्वीर और आलेख © @sharmila_shumee
( लेखिका जानी मानी समाजसेविका हैं और गरीबों के कल्याण के लिए सेवारत हैं। शर्मिला जी डाल्टनगंज रेडियो में उद्घोषिका भी हैं, इनकी मीठी जुबान पर मां सरस्वती स्वयं ही विराजमान हैं। )

No comments:
Post a Comment