मकर संक्रांति होता होगा सब के लिए हमीन ला तो सँकरात ही रहता था। भोरे-भोरे नहाना और लाई-तिलकुट खाना एतने से मतलब रहता था।
अबकी कंपनी के काम से हैदराबाद आना हुआ, तो सोचे जब भी विदेश से आते हैं, कुछ ना कुछ ऑफिस के स्टाफ लोग के लिए लाते ही है, पर अबकी घरे से आ रहे थे तो सोचे काहे ना सब के लिए तिलकूट ही ले लिया जाए। फिर लगभग 3 किलो गुड़-चीनी वाला मिलावा के ले लिए और सब के बांट भी दिए। हमको तो वापस आ जाना था, तो सोचे घरे जा के खाएंगे, पर अफसोस की अटक गए इधर ही। खैर जे भी कहिये #तिलकूट आज कल ही सुलभ होने लगा है सब के घर, नहीं तो पहले ये प्रसादी जैसा ही नसीब होता था। खूब मिला तो एक एक पीस सब के। पर असली अनलिमिटेड खाये के आइटम रहता था #लाई आऊ #तिलवा।
संक्रांत के 1-2 दिन पहिले ही दादी, माई साथ चूल्हा पर #ढकनी चढ़ जाता था। चावल के #मूरही, नौका धान के कूटल #चूड़ा के भूजाता , तिल भुनजाता और दूसर दने फर्स्ट क्लास गुड़ के पाग होईत रहता। दादी बीच-बीच मे एक बूंद पाग दुनों अंगूरी के बीच मे लेके देखती की केतना तार के रेशा बन रहा है। उसी समय पता चला था कि पाग का नापने का तरीका है पाग से, तीन तार वाला पाग से ही लाई बढ़िया बंधता था नहीं तो चाहे तो एकदम भसक जाता था, नहीं तो एकदम पत्थर हो जाता था, बोले तो बजरमार। खैर पाग बनने के बाद गरमा गरम ही मिला के लाई बांधना पड़ता था, इसलिये हमीन लईकन के भी सहयोग लिया जाता था और शाम-शाम तक बन के पहिले सूप मे रखते और सुख जाने पर टीन के डिब्बा मे रखा जाता। अब खाना तो दूसरा दिन रहता था, इसलिए मन मार के सूत जाते थे।
अगला दिन ई ससुरा लाई ही था कि केतना ठंढ़ा बढ़ा दे (कहीयो ठंडा पड़े ना पड़े अवस के ई दिन बढ़िये जाता था), नहाते तिल डाल के पानी मे, फिर जल्दी जल्दी तिल डाल के आग तापते। बीच मे चाऊर भी छुना रहता था दान करने के लिए सवा रुपया, अढ़ाई रुपया डाल के वो भी करते और फिर इत्मिनान से लाई के सेवा मे लाग जाते। फिर तो अगला एक हफ्ता से ऊपर तक तो नास्ता खाना सब यही रहता था। जब तक डिब्बा के नीचे से #चूरकुनी खत्म ना हो जाए तब तक चैन कहाँ। दादी हमेशा ही कुछ-कुछ आइटम लुका के भी रख देती थी, तो जब डिब्बा वाला खत्म हो जाता था तो दादी के तरफ से 1-2 दिन सरप्राइज भी मिल जाता था। अब भले तिलकूट आसानी से उपलब्ध हो जाता है पर घरे के बनवल लाई तो किस्मत वाला के ही ना मिलेगा।
सब लोग कमेंट बॉक्स में आपन-आपन सकरात मनावे के फोटो डालिये।
© आनंद केशव "देहाती"
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