Wednesday, January 18, 2023

कड़कड़ाती ठंड की रात और पुआल….

“ आज बड़ी कनकनी बढ़ा देले हsउ हो, पछुवा चलइत हइ तो बुझात हइ की हाड़ में छेद कर देतइ ’’ रात का भोजन कर लेने के बाद बिस्तर को झाड़ते ठण्ड से कुड़कूड़ाते दादा ने कहां।
“ अहो दादा, इ लेदरा-फेदरा से अब जाड़ ना भगतsवा कुछ दोसर उपाय करा हो, तू तो बोरसी ताप के बिहान कर देबा, हम रात भर में जाड़ से कड़कड़ा जाएब। हमरा तो बोरसी तापे के जादे फैदा ना बुझा हsवा; पेट, मुँह, ठेहुना गरम आउ पीठास ठंडा। समाचार में सुsन ह.. न, आज रांची का तापमान अधिकतम २२ डिग्री और न्यूनतम २ डिग्री दर्ज किया गया, उहे लेके बोरसी तपबा तो आपन देह आगे के अधिकतम और पीछे के न्यूनतम तापमान पर चल जतवा उहो एके समय में ’’ बूट के साग-भात नरेटी तक चढ़ा लेने के बाद नींद के आगोश में ख़ुद को शौपने को आतुर पोते ने कहा।
“ अरे रुक बुड़बक…. एतना अकबकाएल काहे ला हे, बsड़नि से ढ़ाबा बहार के रख, जाड़ के जुग़ाड ले के आवइत ही, कातो इ ससुर के नाती सकरातों के बितला पर आउ जवान होएल आवइत बा ’’ कहते हुए दादा खलिहान में लगे पुआल के ढ़ेर के पास चले गए।
“ दूर सार के… ! मर एक पांजा #पोरा (पुआल) ले अनलहुँ हो, का करबहूँ एकर..? ’’ पोते से विस्मय प्रगट करते हुए पूछा
“ हां हो, …. अब पोरा (पुआल) के गलीचा ढ़ाबा में बिछावा, ओकर उपरे लेदरा, बेडशीट हो गेलवा बिछौना; फिर अपने उपर कंबल ओकर उपरे से चद्दर हो गेलवा ओढ़ना अब देखा कइसे दान फेंकsतवा से “ एक के बाद एक बिछौने को लगाते हुए दादा-पोता संवाद कर रहे थे।
“ अहो दादा पहीले चद्दर ओढ़ा फिर कम्बल, काहे की इ गड़ेड़िया वाला करिका कंबलवा बड़ी चुभ हsवा “
“ इहे तो ग़लती नखवा करेला, कंबल कहता है पहले हमको जुड़ाव (प्रोटेक्ट करो) फिर हम तुमको जुड़ाएंगे, अब गुड़मुड़ा के सुता चुपचाप हम दुरा पर के बेड़ास लगा के आवइत हीsवा “ कहते हुए दादा दुरा पर के मुख्य दरवाजा बंद करने चले गए। दरअसल मुख्य दरवाज़ा का कुण्डी काफी जाम था, इस कारण किसी महिला या बच्चें उसे नहीं लगा पाते थे। पूरब की लाली पहचान से पहीले इसे खोलना और रात के भोजनोपरांत तथा घर के आख़री व्यक्ति के आ जाने के पश्चात इस दरवाजे को लगाना इन्ही के जिम्मे था। अब इसे जिम्मा कह लीजिए या फिर डबल लॉक का सुरक्षा कवच एक ही बात हैं। दरवाजा लगा के आने के बाद दादा पुआल के बिस्तर पर बैठ के एक खिल्ली खैनी रगड़े और बाये गाल में दबा के श्री राम-श्री राम कहते हुए लेट गए। अभी थोड़ा ही वक़्त गुजरा था कि बाहर से लड़खड़ाती जबान से आवाज़ सुनाई पड़ी ..
“ अहो चाचा खोला दुहरियाँ हो… “
“ मर इ घरी के बेयाल चलल आवइत बा हो “ बुदबुदाते हुए दादा बिस्तर से न निकलने की इच्छा को दरकिनार करते हुए ये सोच के बैठ गए की शायद एक बार और आवाज़ मिले तो उठ के दरवाजा खोले। लेकिन दुबारा पुकार नहीं मिलने पर फिर से सो गए। सच में आज ठण्ड का एहसास बिल्कुल भी नहीं हो रहा था और थोड़ी ही देर में दादा कच्ची नींद और पोता गहरी नींद में चले गए। ठण्ड तो दूर की बात है शरीर से आज शीतली फेंक रही थी और इस कड़ाके की ठण्ड में भी, सुकून भरी नींद से पूरी रात बीत चुकी थी। फिर भी मैंने उस नींद को एक दो घंटो के लिए और आगे एक्सटेंड कर दिया था। लेकिन दादा … किसान जो ठहरे.....
“ नहीं हुआ है अभी सबेरा, पूरब की लाली पहचान चिड़ियों के जगने से पहले, खाट छोड़ उठ गया किसान। ” कविता तो पढ़े ही होंगे बचपन में;
चल दिए गाय -गोरु के सांही-पानी में, खलिहान में.....और का।
“ पोरवा के तो अइसे बसका देलई…, अइसनो होखहत “ बोलते हुए दादा भस्के पुआल के ढ़ेर को ठीक करने ही वाले थे कि उसमें घुस के सो रहा आदमी दिखा।
“ मर के हा हो .. ? “ बांस के बने अर्खईन से उस आदमी के पीठ को ठोकते दादा ने पूछा।
“ हम हिवा चाचा पचना “ अपना परिचय देते हुए वो झट से पुआल से अलग खड़ा हो गया और अपने कान मे बांधे गमछे को निकाल खुद को झाड़ने लगा।
“ पीयाक हे का हो… तुहीं रात खिन आवाज़ देsवइत हले..?? “
“ हाँ हो चाचा, राते ठेर निशा (नशा) चढ़ गेल हsलवा, आपन घरे जाए के हिम्मते ना होलवा तो हिअई जाड़ से बचेला, पोरवा में घुस गेल हलिवा “
“ दूर बुड़बक... काहे ला ऐतना पीअ हे…, जो जो.. घरे जो…. “ मुस्कुराते हुए दादा, बिखरे पुआल को अर्खईन से ढ़ेर पर चढ़ाने लगे….।
May be an image of outdoors and text that says "ठेठ पलामू कड़कड़ाती ठंड की रात और पुआल..... अवनीश प्रकाश"

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