Friday, January 13, 2023

फेरीवाले

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“रंग बिरंगी चूड़ियाँ ले लो , हरी नीली काँच की चूड़ियाँ ले लो “
“हरेक माल दस रुपए …कंघी, आइना , मग श्रिंगार का सब सामान दस रुपए”
“आ गया मनपसंद क़ुल्फ़ी “
“खट्टे-मीठे चटपटे गोलियाँ ले लो ….”
माँ देखो जल्दी फेरीवाला आया है गली में जल्दी चलो ना दरवाजें के पास है , देखो ना केतना सारा खिलौना है।
भरी गर्मी के आलस भरे दोपहर में बिस्तर पर लेटे हुए फेरीवाले की आवाज़ कानों में बस पड़नी थी की दौड़कर झरोखों के सलाख़ों के बीच नज़रें टिक जाती। रंग बिरंगे खिलौने की बोरी लिए घर के पास की गलियों में उन फेरीवालों को देखते ही अचानक आँखे चमक उठती थी। और फिर ललचाई नज़रों से माँ को ज़िद करते हुए उठाना और चौखट के तरफ़ बार बार नन्हे हाथों से धकेलना शायद हम में से ज़्यादातर लोगों को याद ही होगा ।
घर घर घूम कर क्या कुछ नहीं बेचने आते थे फेरीवाले। लगभग सबकुछ तो मिल जाता था । मिट्टी -लकड़ी खिलौने , चूड़ियाँ , बर्तन , गोलियाँ मिठाइयाँ यहाँ तक कि कुछ सुनार लोग भी पहले घर घर जाके गहने ख़रीदते बेचते थे ।
बचपन में अक्सर हमारे घर डेहरी-सासाराम तरफ़ से चावल बेचने बूढ़ी दादी लोग आती थी । माँ और उनके बीच में सौदे और मोलई की बातचीत बड़ी प्यारी लगती थी। “कतरनी आऊ मंसूरिया हई दीदीजी , पका के देखूँ तब पईसा दिहन, अबकी राउरे ख़ातिर बेस चाउर लईले बानी” कितना मिठास था उन सौदों में भी , कम ज़्यादा किसी ना किसी बार आगे पीछे हो ही जाता मगर वो परस्पर सोन्धापन बना रहता था। ऐसा नहीं था की ये सिर्फ़ ख़रीदना - बेचने तक सीमित था। हर चीज़ के बहुआयामी उपाय लगाना तो उन दिनों की आम बात थी। इन्ही बातों बातों में कभी थककर बरामदे में एक आध पहर की नींद लेती तो कभी घर में पोते पोतियों को तेल मालिश भी कर देती। आज घर के काम करने वाले दाई नौकर को अगर थोड़ा अगर और कुछ करने कह दीजिए तो नाक मुँह बना लेते हैं पर वो सब दादी लोग खुद से पूछकर पूछकर हम लोग को बरामदे में कितना तेल लगाई। “ ला ना बाबू तनी तलवा में तेल सोंट दियूँ” मगर कभी माँ के देने पर भी एक पैसा अलग नहीं लिया। “राउर के लईकन , हमनी के लईकन में फ़रक बा का ? “ कितना प्रेम था, आपसी मिठास थी !
भाभी, दीदी बुआ लोग सब चूड़ीवालों से खूब बतलगी करते। वे भी अपने काम के पूरे पेशेवर , इतना घर घूमते फिर भी सबके कलाई के साइज़ याद रहता।” आपका सवा दु ला दिए हैं ,अबरी पूरा लाठ वाला है” बतलगी -हंसी मज़ाक़ के बीच मजाल हो की कभी चूड़ी पहनाते हुए कभी कोई असहज भी हुआ हो। व्यापार के साथ साथ गरिमा कैसे रखते हैं कोई उनसे सीखें।
कभी फेरीवालों आँगन में सोनपापड़ी - तिलकूट बनाते तो कभी पुराने कपड़ों के बदले नया बरतन दे जाते। कभी ग़ाज़े- बताशे देके जाते तो कभी सीलौट घिस देते। थोड़े ही देर के लिए ही सही पर चौखट पर आए इन लोगों से कितनी आत्मीयता हो जाती थी। सौदे बेचते बचते वे पराए होकर भी अपनापन बाँट जाते और एक आज का वक़्त है की इंसान अपनो में भी अपनापन खोजने को तरस रहा है।
वक़्त की नियत है भागते रहना। उसी भागदौड़ में बचपन निकल गया और साथ ही वे फेरीवाले भी। अब भी दो चार कहीं दिख जाते हैं दहीवाले, फुचकावाले पर वो पुराने चिर परिचित आवाज़ कही दूर खो गए। अब तो पुकारने पर भी नहीं आते।
समय के थपेड़ों में वे कहीं खो गए और हमारा बचपन भी खो गया। आज सब कुछ तो मिल जाता है। शहर में कितना मॉल खुल गया है , एक बटन पर होम डेलिवरी वाला आता है घर पे मनपसंद समान लेके। वो समान दे देता है ऑर्डर कम्प्लीट नोट करके चल जाता है पर उसकी आँखों में वो आत्मीयता वो स्नेह नहीं दिखता जो कभी बपचन में दिखा करता था।
बच्चे सब बाहर चले गए हैं , चौखट आँगन सूना है । फेरीवालों की अब जगह डेलिवेरी बॉय है। सब इंस्टेन्ट है पर भावनायें ऐब्सेंट हैं।
स्कूल में टैगोर साहब का काबुलीवाला पढ़ा था। मिनी की तरह उन काबुलीवाले को अलसाई नज़रें अब भी खोजती हैं। लगता है काश एक बार फिर से आवाज़ देते उनको , दौड़ के झरोखों पर जाते , कहीं किसी परिचित कानों में आवाज़ पड़ जाती तो जवाब मिल जाता। पर अब अपनी वो बचपन की मासूम आवाज़ भी नहीं है और ना ही वे फेरीवाले भी।
आपकी भी कुछ अनमोल यादें हैं फेरीवालों के साथ ? आपने कुछ ना कुछ तो ज़रूर ख़रीदा होगा। तो आज इसी बहाने अपना भी बचपन साझा कीजिए हमारे साथ नीचे कॉमेंट्स में ।
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All reacti

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