Wednesday, June 8, 2022

कुआं किनारे (जेठ स्पेशल)

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इसी कुँएं की भित्ति पर बैठकर
ठहाके मारते
हँसते-खिलखिलाते थे
गाँव-घर के लोग।
वहीं पर बैठकर गप्प हांका करती थी
आस-पड़ोस की औरतें।
उदासी और अकेलेपन के बीच
वहीं पर बैठकर
सभी खोजते थे खुशियां।
इसी कुँएं के पास से
आती थी
आस-पास की खबरें
यहीं पर लड़ते-भिड़ते
और फिर सुलझते थे झगड़े।
कुँएं पर बैठकर
अपनी उमर का हिसाब नहीं
बल्कि गिनते थे रेलगाड़ी के चमकते डिब्बों को
उसकी गति और आती-जाती रोशनी को।
यहीं पर बैठकर
देखते थे
कौन सी बस रुकी?कौन जा रहा..?
और कौन आया अपने गाँव।
टूटते सपनों से बेखबर
देखते थे
शांत चमकती आँखों से
दौड़ती गाड़ी और भागते लोगों को।
शहनाइयों के स्वर
और मंगलगीतों को सुनकर
हँसते-इतराते-लजाते
देखा है इस कुँएं को।
तो अपनों को दूर जाता देखकर
निर्जीव आँसू बहाते हुए भी
देखा है इस कुँएं को।
लेकिन अब...
इसकी घिरनी पर नहीं खेलती रस्सियां
बाल्टियों की खनखनाहट सुनाई नहीं देती
धसक रही ईटें अब इसके दीवारों की
धुंधले पड़ रहे अक्षर अब इसकी पट्टिका के
आवाज आती है तो
बुजुर्ग महिलाओं की फुसफुसाहट
खोजती है जो स्मृतियां
इस कुँएं के पास अब भी।
©Ajay kumar Shukla
No photo description available.

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